'रोज़गार' की हक़ीक़त

"..अब अगर आंकड़ों की हालत जानना चाहते हैं तो सुनिए, आंकड़े आपको थोड़ा बोझिल कर सकते हैं मगर दो मिनट लगेंगे पढ़िए...! इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011-12 में काम करने वाले पुरुषों की संख्या 30.4 करोड़ थी जो साल 2017-18 में गिरकर 28.6 करोड़ हो गई है। 1993-94 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि पुरुषों के रोज़गार में इतनी बड़ी कमी आई है। ये आंकड़े नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस (NSSO) के हैं। नौकरियों में ये गिरावट गांवों और शहरों दोनों जगह आई। गांवों में जहां गिरावट 6.4% है, तो शहरी इलाकों में 4.7% की गिरावट आई है।.."
-मो. असगर


इस तस्वीर को गौर से देखिए। थोड़ा ठहरकर देखिए...। एक शख्स है, जो प्रेस की गई पैंट शर्ट पहने है। बेल्ट कसे हुए है। बालों को संवारे है। पैरों में बूट हैं, जो आप नहीं देख पा रहे हैं। देखने से पहली नज़र में ही लगता है, ये शख्स पढ़ा लिखा है। 

अब इसके हाथ के सामान को देखिए। हाथ में बटुए हैं। चाबी के छल्ले है। डेबिट और क्रेडिट कार्ड्स रखने वाले बॉक्स हैं...। ये शख्स उस बस में चढ़ा है, जो दिल्ली से संभल (यूपी) जा रही है। 
आवाज़ लगानी शुरू की, पर्स, की-रिंग्स, टॉर्च चाहिए? हां भइया बोलो 10-10 रुपए में की-रिंग्स। अच्छे पर्स लीजिए सस्ते में..! आवाज़ें लगाता हुआ कभी आगे गया, कभी पीछे। मगर बिकना तो छोड़िए किसी ने सामान उसका देखा भी नहीं...। आखिरकार इस शख्स को बस से उतरना पड़ा, इस उम्मीद के साथ कि शायद किसी और बस में इसको खरीदार मिलेगा। ये इसका रोज़गार है। सोच रहा हूं 10-10 या 20-25 रुपए की कीमत का सामान हाथ में लेकर कितना कमा लेता होगा। कैसे परिवार को चलाता होगा, सॉरी चलाना शायद कुछ भारी भरकम शब्द है, इसके लिए कहना चाहिए कैसे अपनी जरूरतों को मैनेज करता होगा, किस चीज़ के लिए दिल को मारता होगा और क्या ज़रूरत पूरी करता होगा। बच्चे होंगे तो उनकी ज़िद को कैसे टालता होगा, क्योंकि इतने पैसे में तो घर के खाने पीने का इंतजाम हो जाए तो बड़ी बात है।
अब आप अपने आसपास के लोगों पर नजर दौड़ाएं, क्योंकि ये हालत इसकी अकेले की नहीं। बहुत से लोग आपको ऐसे मिलेंगे। बस थोड़े बहुत ऊपर नीचे के हिसाब से। उन लोगों की संख्या बहुत ही कम है, जिनके यहां अमीरी के शजर हैं। अगर आप ईमानदारी से देखें तो ये शख्स तो काम करता हुआ मिल भी गया, लेकिन उन युवाओं की तादाद ज़्यादा नज़र आएगी जो पढ़ लिखकर ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुके हैं। मगर अब काम क्या करें, पढ़ाई की शर्म उन्हें मजदूरी करने से रोकती है, नौकरी मिलती नहीं है। इसलिए इधर उधर बैठकर टाइम गुज़ार रहे हैं। संघर्ष, चिंता, तनाव उनकी ज़िन्दगी को जोंक तरह चूस रहा है।
अब अगर आंकड़ों की हालत जानना चाहते हैं तो सुनिए, आंकड़े आपको थोड़ा बोझिल कर सकते हैं मगर दो मिनट लगेंगे पढ़िए...! इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011-12 में काम करने वाले पुरुषों की संख्या 30.4 करोड़ थी जो साल 2017-18 में गिरकर 28.6 करोड़ हो गई है। 1993-94 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि पुरुषों के रोज़गार में इतनी बड़ी कमी आई है। ये आंकड़े नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस (NSSO) के हैं। नौकरियों में ये गिरावट गांवों और शहरों दोनों जगह आई। गांवों में जहां गिरावट 6.4% है, तो शहरी इलाकों में 4.7% की गिरावट आई है।
दूसरा आंकड़ा भिखारियों का भी देखिए, पिछले साल केंद्र सरकार ने देश में भिखारियों की संख्या का आंकड़ा जारी किया। लोकसभा में पेश रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल 4,13,760 भिखारी हैं जिनमें 2,21,673 भिखारी पुरुष और 1,91, 997 महिलाएं हैं। भिखारियों की संख्या में पश्चिम बंगाल पहले पायदान पर है। दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश और बिहार तीसरे नंबर पर है।
तीसरा आंकड़ा अब क्राइम का देखिए, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक नेशनल लेवल पर क्राइम रेट बढ़ा। साल 2014 में जहां राष्ट्रीय अपराध दर 229.2 थी, वहीं 2015 में ये बढ़कर 234.2 हो गई। मोदी सरकार आए एक साल हुआ था। उम्मीद थी, कि मोदी सरकार कंट्रोल करेगी। लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने फिर रिपोर्ट जारी कि अब 2015 की तुलना में 2016 में रेप केस 12.4 फीसदी बढ़ गए। सबसे ज्यादा रेप केस (38,947) मध्य प्रदेश में दर्ज हुए । दूसरे नंबर पर 4,816 रेप केस उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए, तीसरे स्थान पर 4,189 मामलों के साथ महाराष्ट्र रहा। ये तो वो केस थे जो दर्ज हुए। बाकी तुम अच्छे से जानते हो पुलिस कितनी मुश्किल से केस दर्ज करती है।
ये बताना इसलिए जरूरी है कि रोज़गार कम हो रहे हैं, नौकरी मिल नहीं रही क्राइम बढ़ रहा है...। कहीं ना कहीं क्राइम रेट का बढ़ना रोज़गार के घटने से ताल्लुक रखता है। वो क्या है न कि ये तो सुना ही होगा, खाली दिमाग शैतान का घर होता है।
ये आंकड़े ऐसा नहीं है कि मेरे पास थे। आप गूगल करिए, जानिए, पढ़िए सच सामने आएगा। टीवी डिबेट में इन आंकड़ों पर बहस इसलिए नहीं होती, क्योंकि शो की रेटिंग अच्छी नहीं आती, जितनी अच्छी हिन्दू मुस्लिम वाले मुद्दे पर अा जाती है। अखबारों में छपते हैं, लेकिन बोझिल होने की वजह से आप पढ़ नहीं पाते। अब यहां तक पढ़ते हुए भी कुछ ही लोग आएंगे, और ये पोस्ट फिर नीचे दब जाएगा, ये ही कुछ उल्टा सीधा लिखा हो तो वायरल हो जाएगा।
सवाल करिए, क्योंकि चुनाव का दौर है, फिर आपको झांसे दिए जाएंगे। किसी एक के नाम पर वोट लूटने की कोशिश होगी। जबकि आपको पता है कि वो एक अकेला जिसके नाम पर आपसे वोट मांगे जा रहे हैं वो आपकी सुनने नहीं आयेगा। आपकी दिक्कतें जानने नहीं आएगा, क्योंकि इस काम के लिए आपके प्रतिनिधि सांसद होते हैं, वो अकेला तो सिर्फ चिल्लाएगा पाकिस्तान- पाकिस्तान, सीमा पर जवान, नेहरू नेहरू नेहरू...। 
आपको वोट करना है, तो देखिए आपका सांसद आपके इलाके में कितनी बार आपकी परेशानी जानने आया? आपके सांसद ने कितनी बार लोकसभा में आपकी परेशानी के सवाल उठाए? देखिए कि आप अपने सांसद से मिल भी पाते थे या नहीं? आपके सांसद ने अपने चहीतों के अलावा आम लोगों को कितना फायदा पहुंचाया। ये सवाल इसलिए जरूरी है, अगर आप नहीं देखेंगे तो सिर्फ चंद लोग अमीर बनेंगे। और आप कहीं पकौड़े तलेंगे, कहीं इस शख्स की तरह बटुए बेचने को मजबूर होंगे।
मैं फिर कह रहा हूं, सवाल करिए। सीमा पर खड़े जवान के खौफ में सरकार से नहीं कर पा रहे हैं तो खुद से करिए। देशद्रोही साबित होने का डर है, तो मन ही मन सवाल करिए। और फिर तय करिए क्या सचमुच आपके सांसद ने आपके इलाके का विकास किया या फिर पांच साल राष्ट्रीय बहसों में उलझाए रखा।

-मो. असगर पत्रकार हैं.