समीक्षा: जितने लोग उतने प्रेम

हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी को उनके काव्य संग्रह 'जितने लोग उतने प्रेम' पर व्यास सम्मान दिया जा रहा है। इस संग्रह पर पांच साल पहले मैंने एक टिप्पणी की थी जो संभवतः 'आलोचना' में प्रकाशित हुई थी। शायद तब भी उसे यहां साझा किया हो। जब यह टिप्पणी लिखी गई थी तब विष्णु खरे हमारे बीच थे और सक्रिय थे। इसमें उनका भी ज़िक्र है। चाहता तो हटा सकता था, लेकिन रहने दे रहा हूं। यह रही टिप्पणी।
- प्रिय दर्शन 


बहुत से ठिकाने थे जहां सबको खला मैं

हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी धूमिल के समकालीन हैं और विष्णु खरे के बिल्कुल समवयस्क। धूमिल हिंदी कविता के संसार में प्रतिभा के धूमकेतु की तरह उभरे, और आधुनिक हिंदी कविता को उसकी कुछ बेहतरीन और सबसे ज़्यादा उद्धृत की जाने वाली कविताएं और पंक्तियां देकर 38 साल में गुज़र गए। लेकिन विष्णु खरे और लीलाधर जगूड़ी दोनों अब भी रचनारत हैं और इन तीनों कवियों के एक-दूसरे से नितांत भिन्न काव्य विन्यास और आस्वाद के बीच सहसा खयाल आता है कि हिंदी कविता से दुहरावों और एकरसता की शिकायत करने वाले आलोचकों को ये तीन कवि कितने अलहदा ढंग से गलत साबित करते रहे हैं।


लीलाधर जगूड़ी का बारहवां कविता संग्रह जितने लोग उतने प्रेम नए सिरे से याद दिलाता है कि समकालीन हिंदी कविता के जाने-पहचाने, लगभग रूढ़ से हो गए शिल्प के बीच, उनका अपना एक अलग मुहावरा है। जगूड़ी, किसी युक्ति की तरह नहीं, बल्कि अपने अभ्यास से, जैसे बार-बार समकालीन का अतिक्रमण करते हैं, अभिव्यक्त को अतिव्यक्त करने की जगह किसी नए चौखटे में, बल्कि चौखटाविहीन करके, उसे देखना चाहते हैं। संग्रह की पहली ही कविता में वे कहते हैं, ‘सोने-चांदी से भरी पृथ्वी पर लोहा लेता फिरता हूं / सांचा तोड़ कोई ढांचा ढालना चाहता हूं / बहुत कुछ पिंजड़ा तोड़ बाहर आया है मेरे बहाने’। (मेरे बहाने)

दरअसल यह बने-बनाए यथार्थ का सांचा-खांचा है जिसे तोड़कर वे पूरे दृश्य को देखने-समझने की कोशिश करते हैं, कुछ इस तरह कि दृश्य के भीतर छुपा कोई नया परिदृश्य सामने आ जाए। इस देखने में एक तरफ व्यंग्य को छूती तल्खी होती है तो दूसरी तरफ करुणा को छूती संवेदनशीलता- और इन दोनों के बीच उनकी कविता जैसे एक तनी हुई विडंबना को संभव करती है- संग्रह की दूसरी कविता में वे लिखते हैं, ‘एक काली चट्टान दिन-रात हमारा पीछा कर रही है / ….अविद्या की विद्या से भरा यह संसार महान / वर्तमान जितना ही अतीत को भी जगह दिए हुए है भविष्य में / …संतानों, ईश्वरों और युद्धों के अटूट माहौल में फैला / विद्वतापूर्ण मूर्खताओं और मूर्खतापूर्ण विद्वताओं से भरा यह संसार / अद्वितीय और महान है जो खुशहाली के लिए युद्ध लड़ता है।‘ (हमारा पीछा)।

यह पहचानना मुश्किल नहीं है कि लीलाधर जगूड़ी की काव्य-दृष्टि एक विराट फलक को समेटती है- यह इसलिए संभव होता है कि वे दृश्यों के कोलाहल में फंसने की जगह सूक्ष्मताओं को देखते हैं और उनके बीच बनते मंतव्यों को समझने में चूक नहीं करते। कई बार वे असंगत से लगते दृश्यों, चरित्रों या स्थितियों को एक साथ देखने का जोखिम उठाते हैं और उनकी संगतियों को खोजने के क्रम में बिल्कुल एक नई दुनिया खोज निकालते हैं। एक तरह की रचनात्मक सुंदरता उनकी कविता में बिल्कुल अनपेक्षित जगहों से झरती और मन मोह लेती है। ‘गिलहरी और गाय’ जैसी जटिल कविता में वे गिलहरी के नृत्य की चर्चा करते हैं- ‘इस विश्वमंच पर उससे निपुण कोई नर्तकी नहीं हवा के अलावा / दोनों के नाच में पैर नहीं दिखते, उनके लिए कोई आंगन टेढ़ा नहीं / गिलहरी के तो रोएं-रोएं से तरंगित होती है, दिल-दिमाग / की थिरकन-फुरकन, टेढ़े-मेढ़े पेड़ को अगर आंगन मान लें तो / गिलहरी दुनिया के सारे तिर्यक को लयबद्ध कर देती है’। (गिलहरी और गाय)

ऐसी ही पंक्तियों के बीच लीलाधर जगूड़ी को पढ़ते हुए नए सिरे से यह बात खुलती है कि बड़ी कविता तभी बनती है जब वह आंख को एक नई दुनिया और दुनिया को एक नई आंख मुहैया कराती है। इस क्रम में वह हमेशा अभिनव-अनूठा देखने की जिद पाले बैठे हों, ऐसा नहीं है, बल्कि कई बार समय के छुपाए जा रहे रहे यथार्थ का परदा उनकी कविता इतने बेलौस ढंग से हटा देती है कि हम बस देखते रह जाते हैं। उनके एक पूरे संग्रह का ही शीर्षक है, ‘खबर का मुंह विज्ञापन से ढंका है’। आज के माध्यमों को लेकर इतनी सटीक और सारगर्भित अभिव्यक्ति क्या किसी और दूसरे ढंग से संभव है? 

शायद इस विकट-विलक्षण यथार्थबोध का ही नतीजा है कि जगूड़ी कविताओं में आम तौर पर दिखने वाली कोरी भावुकता के जाल में नहीं फंसते, न ही सरल-तरल संवेदनशील पंक्तियां लिखकर अपने काव्य कर्म की इतिश्री मान लेते हैं। वे बड़ी तटस्थता से- कभी निर्मल निर्ममता और कभी कुटिल कौतुकता के साथ- अपनी कविता का वह संसार बुनते है जिसमें इस संसार के सार-असार अपने वास्तविक तत्वों के साथ दिखाई देने लगते हैं। उनका काव्य विश्वास संभव और संभावनाओं दोनों को बड़ी सहजता से सिरजता है। जगूड़ी जैसा कवि ही कह सकता है, ‘पत्थर को भी काटो-छांटो तो फूल की तरह / खिलाया जा सकता है’। (अपनी यादों में) 

एक बार लगता है, जैसे कवि भाषा से खेल रहा है, या भाषा के ज़रिए दिए हुए यथार्थ से खेल रहा है। लेकिन अंततः यह खेल कविता का ही है- दुनिया को उसके खोल से बाहर लाने का, समय को उसकी सीवन से निकाल कर पहचानने का- जिसके पीछे यह बहुत साफ़ समझ है कि ‘लिखे में भी न खिले मेरी उदासी तो फिर लिखना बेकार है / होने के रोने-हंसने को लिखने में खिलने दो अकेले पेड़ की तरह’। (लिखे में भी न खिले मेरी उदासी तो)

जगूड़ी क्रीड़ा और पीड़ा के बीच जैसे एक निस्संग-निरंतर आवाजाही करते हैं। यह काम आसान नहीं है। इससे उनकी कविता दुरूह होती है, कहीं-कहीं अनगढ़ भी लगती है और कभी-कभी बनावटी होने का आरोप भी झेलती है। लेकिन अंततः लिखने और खिलने के बीच जो दिखता और दुखता है, जो जन्म लेता और मुरझाता है, जो प्रेम करता और पस्त पड़ता है, जो काल के आरपार आता-जाता है, या जो किसी क्षण में ठिठका रहता है, वे उन सबकी ख़बर लेते हैं। 

‘जितने लोग उतने प्रेम’ संग्रह में प्रेम को लेकर ढेर सारी कविताएं हैं, लेकिन यहां प्रेम विकल कामनाओं का मारा नहीं है, आध्यात्मिक और रूहानी रंग लेता जज़्बा नहीं है, वह बिल्कुल दैनिक-दैहिक प्रेम है, जिसमें कुछ अभ्यास भी है, कुछ मजबूरी भी, कुछ छल भी है, कुछ छिनाली भी, और प्रेम तो अंततः है ही। इस ठेठ दुनियावी प्रेम की माया-काया को कवि कई तरह से पहचानता है- इस कोमल से एहसास के साथ भी कि “जब लगता है प्रेम-व्रेम सब ख़त्म हो गया / अपनी कटी-छंटी नगण्यता / फिर से प्रेम की पहचान कराने आ जाती है / अपने बंजर में फिर ज़रूरी सा कुछ उगने लगता है/ जिसे न चाकू से काट कर बांटा जा सकता है / न दांतों से.....।‘(प्रेम के फेरे)

लेकिन आखिर लीलाधर जगूड़ी के यहां इतनी तरह के प्रेम क्यों है? और क्यों वे इस प्रेम को दुनियावी सरहदों से जैसे न निकलने देने पर आमादा हैं? शायद इसलिए कि प्रेम चाहे जितना भी मूल्यवान हो, वह कवि के लिए उस अनुभव से ज़्यादा मूल्यवान नहीं है जो ज़िंदगी को जीते-जीते, उसे अपने ढंग से समझते और सिरजते कवि ने हासिल किया है। पूरे कविता संग्रह में यह ज़िंदगी जैसे ढीठ की तरह पंक्तियों से झांकती रहती है और याद दिलाती है कि इस कविता से वह पुरानी जानी-पहचानी या घिसी-पिटी शक्लों में मिलने वाली नहीं है- यहां इसे नई रोशनी में, नए अनुभव में देखना और पहचानना होगा।

लीलाधर जगूड़ी की कविता का मोल यही है। वे बहुत ठोक-बजाकर किसी अनुभव को रचते हैं, पत्थर में छुपे फूलों के बीजों को पहचानते हैं और अपनी कौतुकता के साथ दुनिया को उलटते-पुलटते हुए कुछ हृदयवेधी रच देते हैं। ‘राजस्थानी लुहारिन’ को संबोधित करते हुए वे कहते हैं, ‘तुम्हारी लुगड़ी से पुराने दिन छेद बनाकर रिस आते हैं / सुनाती देती हैं तुम्हारे घन की वजनदार चोटें / तुमने ज़िंदगी का सारा लोहा पीट डाला / लहराती फसलों में दिखता है तुम्हारा अल्हड़ नाच / चलना तुम्हारा फिरना अपने पैरों / चारों ओर घन की वजनदार चोटें ताल सी / बहुत सारी दैनिक चोटों के साथ / चोट पर चोट जैसे एक कथा के साथ दूसरी कथा / और नाच के भीतर अवाक एक दूसरा नाच’ (राजस्थानी लुहारिन)

इसी तरह एक पेड़ से झूल कर आत्महत्या कर लेने वाली ‘पुरुषोत्तम की जनानी’ की कहानी वे एक पेड़ से शुरू करते हैं और फिर उसकी नामालूम मजबूरी पर लौटते हैं, पेड़ के पछतावे, और शर्मिंदगी को छूते हैं और इन सबके बीच अचानक कह उठते हैं, ‘मकानों में जो घर होते हैं और घरों में जो लोग रहते हैं / और लोगों में जो दिल होते हैं और दिलों में जो रिश्ते होते हैं / और रिश्तों में जो दर्द होते हैं / और दर्द में जो करुणा और साहस रहते हैं / और उसमें मनुष्य होने के जो दुस्साहस पैदा होते हैं / वे सब मिलकर उस टीले वाले पेड़ तक आए थे रात / पुरुषोत्तम की अकेली बीवी का साथ निभाने या उसका साथ छोड़ने’। किसी लोककथा की स्मृति जगाती हुई सी, किसी सामूहिक विलाप तक पहुंचती हुई सी, यह जो कविता है, वह पाठ के बीच अचानक प्रगट होती है और जगूड़ी जी की रचना का मर्म और मोल बताती है। हालांकि लीलाधर जगूड़ी आम तौर पर विलाप या विगलित करुणा के कवि नहीं हैं- वे दुख और उसकी अभिव्यक्ति की बहुत बारीक तहों को पहचानते हैं, और बताते हैं, ‘सुखद, दुखद या मनहूस, जितने भी अर्थ होते हों / जीवन में हंसने-रोने के / सबसे ज़्यादा विचलन पैदा करता है सुबकना/ सुबकना निजी दुख का रोना-गाना / नहीं बनने देता / विलाप का कोई आरोह-अवरोह भी नहीं / जो उसे प्रलाप बना दे / दुख को वजन और नमी सहित / धीमे भूकंप की तरह हिला रहा होता है सुबकना। (सुबकना)
किसी कवि से यह उचित या अनुचित अपेक्षा इन दिनों- या शायद हमेशा से- एक यह रहती है कि उसकी कविता जीवन के बारे में, सभ्यता के बारे में नया या पुराना क्या कुछ बताती है। इस कसौटी पर जगूड़ी के बारे में कुछ बातें कही जा सकती हैं। एक स्तर पर वे आधुनिकता की मुश्किलों की शिनाख्त और उसके विकल्पों की खोज करते कवि हैं। उनकी कविता में जैसे यह एक मूल प्रश्न है कि हम कैसे देखें चीज़ों को- ‘रोमांचित पृथ्वी की हजारों आंखें, उसके हजारों ताल, हज़ारों कमल दल / समय द्वारा रचे गए समय के अलावा कभी अपने द्वारा रचे गए समय में भी / देखें उन्हें?’ (रोमांच की भाषा)। यह सवाल भी वे किसी कवि या विचारक या विद्वान से नहीं, पृथ्वी से पूछते हैं जो बताती है कि चींटी की चाल चलो, बीज की तरह कोख में आओ और अपने बहुत पुराने शब्दों से धरती को नई आंख से देखो। अंत में यही पृथ्वी कवि से कहती है, ‘चाहती हूं मेरे लोमहर्षक जंगल बलात्कार और मौत की तरह खूंख्वार न हों, आपदाओं में कुछ अच्छे गुण वाली आपदाएं भी होती हैं / जिन्हें खोना नहीं बोना चाहती हूं सब में जैसे कि भूख / भूख मिट जाए भले ही पर मरे न कभी, वरना मेरे-तुम्हारे रोमांच मिट जाएंगे।‘(रोमांच की भाषा)

भूख के मरने और मिटने के बीच का बारीक फर्क पहचानती लीलाधर जगूड़ी की कविता प्रकृति और अपने पर्यावरण के प्रति जितनी संवेदनशील है, उतनी ही सामूहिकता के प्रति सचेत भी। इस सामूहिकता के लिए स्मृति का दबाव भी है और आने वाले कल के सवाल भी- साथ ही ये एहसास कि बीता हुआ कल हो या आने वाला कल- कई सवाल, कई द्वंद्व ऐसे होते हैं जो लगातार बने रहते हैं। एक जगह वे कहते हैं, ‘फिर भी सांझ के चूल्हे पर पक रही है सबकी इकट्ठी भूख / फैली है सबकी इकट्ठी थकान और उदासी / रक्ताधारा में विचारधारा को उबालती हुई’ (जितने लोग उतने प्रेम) तो दूसरी जगह कुछ परिहास भाव से पूछते हैं, ‘सात सौ साल बाद जो आठ सौ साल की / सांस्कृतिक मिलावट वाला समय और समाज होगा / जो फिर कहीं और ज़्यादा आधुनिक होने की दौड़ में होगा / उस समय अगर मौजूद हों / तब आपके क्या विचार होंगे मिश्र जी?’

समय के आरपार जाती, उनको प्रश्नांकित करती, लीलाधर जगूड़ी की कविता अपनी राजनीतिक अवस्थिति की वजह से नहीं, बल्कि अपने सतत चौकस विवेक की वजह से वर्चस्ववाद की कई सरणियों को आईना और अंगूठा दिखाती है, यहां तक कि धरती पर मनुष्य के वर्चस्व को भी- ‘(मछलियों, कछुओं, व्हेलों और मगरमच्छों को जिनकी ज़रूरत नहीं / उन परमिटों, पासपोर्टों और वीज़ा पद्धतियों से भरी हुई पृथ्वी पर / यह दोहराने वाला कोई नहीं कि पृथ्वी भी एक परिवार है। / बिना जलचरों को पूछे, बिना उनके बारे में सोचे, समुद्र को / युद्ध में शामिल कर लिया या है।)...थोड़ी सी श्रद्धा। थोड़ी सी मातृभूमि। थोड़ी सी राष्ट्रभक्ति से भरे / जो मनुष्य मिलते हैं, हमेशा मुझे संशय में डाल देते हैं / बहुत सी श्रद्धा। बहुत सी मातृभूमि। बहुत सी राष्ट्रभक्ति वाले भी / मुझे कहीं न कहीं क़ैद कर देना चाहते हैं।‘ (मिलाप)। उन जैसा कवि ही लिख सकता है, ‘संस्कृति शब्द की छाया से बहा चला आ रहा है / गुमी हुई आदमीयत का खून / वैदिक काल से प्रतीक्षारत गुणाढ्यों ने सोमरस के अभाव में / चाय-समोसे शुरू कर दिए हैं।‘ (जितने लोग उतने प्रेम)। 

विडंबना शायद हमारे समय का बीज शब्द है- घर से बेघर होने की विडंबना, दुख और सुख- दोनों को एक तरह की अनुभवशून्यता के बीच पाने की कोशिश और इसमें नाकामी से पैदा होने वाली विडंबना, बहुत सारे दृश्यों के बीच कुछ न देख पाने की, शोर और कोलहल के बीच कुछ न सुन पाने की और बहुत सारे शब्दों के बीच कुछ न कह पाने की विडंबना। हमारे समय में लीलाधर जगूड़ी की कविता का एक मोल यह भी है कि वह अपने शिल्प और आशयों में भी इस विडंबना को रखने-रचने वाली कविता है। ‘वैतरणी का पुल’ इस विडंबना को व्यक्त करने वाली एक बहुत अच्छी कविता है। ‘पानी का प्लांट’ और ‘नए जूते’ को भी इस क्रम में याद किया जा सकता है।

लेकिन जितनी महत्वपूर्ण इस विडंबना की पहचान है, उतनी ही अर्थपूर्ण इसके पार जाने की कोशिश है। प्रेम, रिश्तों और स्त्रियों को लेकर लिखी गई कुछ बेहद संवेदनशील कविताएं इस संग्रह को एक अलग आस्वाद और आयाम देती हैं। ऐसी ही एक कविता में वे लिखते हैः ‘स्त्रियां हैं तभी जन्मदिन हैं / स्त्रियों का न होना जन्म का न होना है / जन्म और जीवन का न होना मृत्यु का न होना है / जो पैदा नहीं हो सकती उस अमरता का क्या करें / स्त्रियों का न होना ही अमर नरक है / जहां स्त्रियां होती हैं वहीं पुनर्जन्म होते हैं’। (जहां स्त्रियां होती है)
जगुड़ी उपमानों और प्रतीकों का सहारा कम लेते हैं- बात को सीधे-सीधे कहते हैं, प्रतीकों की उंगली थामते भी हैं तो किसी संकेतात्मक अभिव्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि कविता से संभव हो सकने वाले बहुत सारे अर्थों को रोशन करने के लिए। लेकिन यह काव्य युक्ति भर नहीं है, कवि का स्वभाव है, उसके इस विश्वास से उपजा कि अंतत: वह अर्थ है जो सबको सार्थक करता है। लेकिन यह अर्थ आता कहां से है? अगर सिर्फ बाहर से आता, किसी खोजे हुए उत्तर की तरह मिलता तो शायद व्यर्थ हो जाता- वह लीलाधर जगूड़ी के अपने अनुभव और संवेदन-संसार से आता है। अपने होने को, अपने भीतर की छूटती हुई चीज़ों को भी वे पहचानते हैं और उस संपूर्णता को भी जो उनको सबसे जोड़ती और बनाती है। एक जगह वे कहते हैं, ‘कुछ भी नहीं हूं मैं यहां का और वहां का भी कुछ नहीं है मेरे पास / मुझ कुछ भी नहीं को आपने कैसे पहचान लिया? / ..बहुत कुछ तो अखरोट के पास ही छूट गया था / बहुत कुछ सेब के पेड़ के पास / बहुत कुछ आड़ू और चुलू के पेड़ के पास / बहुत कुछ नारंगी के पास छूट गया था / छोड़े हुए घर में बहुत से जन्म-मरण छूट गए / यादें तक छूट गईं / चलकर पहाड़ पार किए, डांडे लांघे / बांहों में था जो अब बादलों के पास है वह आकाश’ (मैं कुछ नहीं हूं यहां)

जब इतना सबकुछ छूट जाता है तो फिर बचा क्या रहता है? क्या है जो जुड़ता है और जोड़ता है? इन सबकी स्मृति, इन सबसे बनने वाला साझा जो कवि को जैसी बहुत सादगी के साथ यह लिखने को मजबूर करता है- ‘मेरी आत्मा लोहार है / ज़िंदगी से हर रोज़ लोहा लेती है / मेरी आत्मा धोबी है / मन का मैल आंसुओं से धोती है / मेरी आत्मा कुम्हार है / सपनों की मिट्टी से आकार बनाती है / मेरी आत्मा बढ़ई है / रोज़ कोई न कोई विचार खराद देती है’। (एकोSहम बहुष्याम:)

सपनों की मिट्टी को आकार देती, विचार को तराशती ये आत्माएं हैं जो लीलाधर जगूड़ी की कविता के रेशे बुनती हैं। यह एक अलग तरह की कविता है जो संवेदनशील है मगर भावुक नहीं, बौद्धिक है, मगर रुक्ष नहीं, तर्कशील है, मगर तर्काश्रित नहीं। उसमें कल्पना के लिए भी बहुत जगह है और स्मृति के लिए भी। वे बीते हुए, जिए जा रहे और आने वाले समयों को जैसे अपनी कविता के सूक्ष्मदर्शी से देखते है। इस क्रम में वे कभी 1957 में किसी समय ‘जान बूझ कर खिंचाया हुआ अनजान सा फोटो’ अपनी कविता में ले आते हैं और एक थिर स्मृति की सजीवता से जैसे स्पंदित कर डालते हैं और कभी बड़ी तटस्थता से ‘मां से आख़िरी मुलाकात’ जैसी मार्मिक कविता लिख डालते हैं। दुनिया को किसी और तरह से देखने की, सिरजे हुए को किसी और ढंग से सिरजने की, नई स्थितियों से पैदा होने वाले नए शब्द गढ़ने और बरतने की, और सोचे हुए को किसी और ढंग से सोचने की ढेर सारी हिक़मतें खोजते हुए लीलाधर जगूड़ी की कविता बनती है और अपने लिए एक नई आलोचना दृष्टि की भी मांग करती है: ‘बहुत हिले-मिले जो अनजाने बने फिरते थे / सबके बीच जैसे अनजान भीड़ में हिला मैं / किसी को नहीं जानता यह विश्वास दिला मैं / सबको जिस तरह जानता था उस क्रूरता में / चला कुछ अपनी करुणा दिखाने / बहुत से ऐसे ठिकाने थे जहां सबको खला मैं’ । (चला मैं)

जितने लोग उतने प्रेमः लीलाधर जगूड़ी; राजकमल प्रकाशन; 295 रुपये

प्रिय दर्शन वरिष्ठ पत्रकार हैं. NDTV से जुड़े हैं.

यह आलेख उनकी वॉल से साभार.