चुनाव के वक़्त आए एक प्रोपेगेंडा फ़िल्म के ट्रेलर की समीक्षा

"..एक डायलॉग है- 'एक प्रधानमंत्री को जहर दे दिया जाता है, पार्लियामेंट पर अटैक हो जाता है, बॉम्बे में ब्लास्ट....शशशश..कुछ मत बोलो..सेक्युलरिज़्म.' 
शायद इसे कहते हैं- कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा. विवेक को सेक्युलरिज़्म से चिढ़ है तो उन्होंने उसे लाल बहादुर शास्त्री की मौत के मामले में भी घसीट लिया? ये चल क्या रहा है? वैसे भी सेक्युलरिज्म बेचारा पिछले 5 सालों में ऐसा बदनाम हुआ है कि अब किसी को सेक्युलर बोल दो तो जनेऊ दिखाने लगता है.."


-अवनीश पाठक


"..ये सत्य और अहिंसा का देश. ये गांधी और ये नेहरू का देश.ये देश शास्त्रीजी का क्यों नहीं?.."

ये विवेक अग्निहोत्री की नई फ़िल्म 'दी ताशकंद फाइल्स' का डायलॉग है. वही विवेक अग्निहोत्री, जिन्होंने 'बुद्धा इन ट्रैफिक जाम' बनाई है, अर्बन नक्सल लिखी है, ट्विटर पर विरोधियों को गाली देने से हिचकते नहीं. एक एक्ट्रेस को प्रॉस्टिट्यूट तक बोल चुके हैं.
वही साहब प्रोपेगेंडा फिल्मों की श्रृंखला में नई फ़िल्म लेकर आ रहे हैं- दी ताशकंद फाइल्स. विषय है- लाल बहादुर शास्त्री की मौत कैसे हुई? ट्रेलर आज ही आया है. फ़िल्म 12 अप्रैल को आ रही है.
'दी ताशकंद फाइल्स' का ट्रेलर देखिए, उसके डायलॉग आपको सिर के बाल नोंचने पर मजबूर कर देंगे.
एक डायलॉग है- एक प्रधानमंत्री को जहर दे दिया जाता है, पार्लियामेंट पर अटैक हो जाता है, बॉम्बे में ब्लास्ट....शशशश..कुछ मत बोलो..सेक्युलरिज़्म.
शायद इसे कहते हैं- कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा. विवेक को सेक्युलरिज़्म से चिढ़ है तो उन्होंने उसे लाल बहादुर शास्त्री की मौत के मामले में भी घसीट लिया? ये चल क्या रहा है? वैसे भी सेक्युलरिज्म बेचारा पिछले 5 सालों में ऐसा बदनाम हुआ है कि अब किसी को सेक्युलर बोल दो तो जनेऊ दिखाने लगता है.

गांधी-नेहरू वाला डायलॉग, जिसका जिक्र ऊपर किया है, वो तो नए किस्म का जुमला है. देखिएगा, ये लाइन चुनाव में खूब बिकेगी. जैसे कहा जाता है कि अगर पटेल प्रधानमंत्री होते तो..ब्ला. ब्ला. ब्ला. वैसे ही पूछा जाएगा कि ये देश शास्त्री का क्यों नहीं? बेचारे नेहरूजी!! अब तक पटेल को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था, अब इस देश को शास्त्रीजी का नहीं बनने दिया. नेहरू के अपराध कम ही नहीं हो रहे!
अगर गंभीर होकर सोचें तो शास्त्रीजी की मौत वाकई रहस्य है. कोल्ड वॉर के दौर में कई राजनीतिक हत्याएं हुईं, सबकी अपनी- अपनी कॉन्सपिरेसी थियरीज़ हैं. शास्त्री पर हिंदुस्तान में खामोशी ही रही है. विवेक अग्निहोत्री की फ़िल्म में इस सवाल का ईमानदार उत्तर होगा, संभव नहीं लगता. फ़िल्म के ट्रेलर को देखकर भी नहीं लगता. ट्रेलर में अधिकांश वही बातें हैं, जो बीजेपी नेता राजनीतिक लाभ के लिए अपने भाषणों में कहते रहे हैं. विवेक ने बीजेपी के उस प्रिय नैरेटिव कि आजादी के बाद नेहरू-गांधी परिवार ने अन्य नेताओं को दरकिनार कर ख़ुद को ही इस्टेब्लिस किया, को बखूबी गढ़ने कि कोशिश की है. जबकि देखा जाए तो लाल बहादुर शास्त्री का परिवार भी वंशवादी राजनीति के भरोसे फलता फूलता रहा है. शास्त्री जी के बेटे कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही दलों में रहे हैं. उनके बड़े बेटे हरि कृष्ण शास्त्री तीन बार लोकसभा सदस्य और राजीव गांधी की सरकार में मंत्री रहे हैं. दूसरे बेटे सुनील शास्त्री कांग्रेस-बीजेपी में आते-जाते रहे, उत्तर प्रदेश से विधायक और मंत्री भी रहे. अनिल शास्त्री भी जनता दल के टिकट पर लोकसभा सदस्य रह चुके हैं, फिलहाल शायद कांग्रेस में हैं. परपोते सिद्धार्थनाथ सिंह बीजेपी से विधायक और यूपी में मंत्री हैं. आदर्श शास्त्री आप से विधायक हैं. ये लंबी-चौड़ी लिस्ट वंशवाद का उदाहरण नहीं लगेगी, क्योंकि इससे बीजेपी को वोट नहीं मिलते. रही बात लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर बनें संस्थानों, स्मारकों, हवाई अड्डों या सड़कों की तो गूगल करिए उसकी भी लिस्ट आपको मिल जाएगी.
फिर भी देखिएगा, दी ताशकंद फाइल्स रिलीज़ होने के बाद बीजेपी की मशीनरी चीख-चीख कर पूछेगी- ये देश शास्त्री का क्यों नहीं? ये प्रोपगंडा सिनेमा का स्वर्ण युग है, खुश होइए कि आप इसके गवाह हैं.