राम मनोहर लोहिया: समाजवाद की भारतीय दृष्टि

"..लोहिया के 'इतिहास चक्र'और 'अर्थशास्त्र मार्क्स से आगे 'जैसे प्रबंध बहुत आकर्षक हैं, लेकिन कई मायनों में अधूरे भी. कुछ बेहद असहज सवाल जो आज भी अनुत्तरित हैं के अलावा ये शास्त्र और प्रणाली के बतौर मार्क्सवादी दर्शन के सामने टिकने वाले नहीं हैं. इतिहास में शायद टिक भी जाये लेकिन अर्थशास्त्र मे बिलकुल नहीं.
लेकिन एक आदर्शवादी समाजवादी फेमिनिस्ट के बतौर एक मौलिक विचारक और जीवन भर समझौता रहित संघर्ष करने वाले जनता के नायक के बतौर लोहिया को कभी नहीं भुलाया जा सकता है.."
-डॉ मोहन आर्या



आज प्रखर समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया जी का जन्मदिन 
है, 'जिंन्दा कौमे पांच साल इंतज़ार नहीं करती ' व ' पिछड़े पाये सौ में साठ' जैसे नारे देने वाले इस आदर्शवादी नेता और विचारक की कई बातें मुझे बहुत आकर्षित करती हैं, जैसे लोहिया ने अपने आदर्शों के कारण अंतिम समय में अपना प्रोस्टेट का आपरेशन भारत से बाहर कराने से स्पष्ट मना कर दिया था, नतीजतन सरकारी अस्पताल में आपरेशन के बाद  इन्फेक्शन के कारण उनकी मृत्यु हुई, पाकिस्तान के निर्माण को उन्होंने अनैसर्गिक कहा था और उन्हें उम्मीद थी कि दोनों देश फिर एक हो जाएंगे. आधुनिक काल में भारत के समाजवादी दर्शन की उन्होंने नींव रखी, 'इतिहास चक्र'और ' अर्थशास्त्र मार्क्स से आगे 'जैसी उनकी किताबें उस दौर में मार्क्सवाद को चुनौती देती हैं जब समाजवादी बौद्धिक होने का मतलब मार्क्सवादी होना ही माना जाता था उनकी इतिहास दृष्टि हीगेल से प्रभावित जरूर है, लेकिन उनका अपना मौलिक समाजवादी दर्शन अद्वितीय है. 

उनके मार्क्सवाद विरोध के कारण मार्क्सवादियों द्वारा अक्सर यही कहा गया कि उन्हें जर्मनी के जिस स्कूल ने दीक्षित किया है उसका उद्देश्य ही विश्व में मार्क्सवाद का विरोध करना था. स्पष्ट कर दूँ कि मुझे लोहिया या भारतीय समाजवाद के किसी भी संस्करण की तुलना में द्वन्द्ववादी मार्क्सवाद ही ज्यादा उपयोगी और तार्किक लगता है,लेकिन मार्क्सवादियों द्वारा लोहिया के सवालों का वैचारिक जवाब देने की बजाय उन्हें प्रकृति और उद्देश्य से ही मार्क्सवाद के खिलाफ बताकर पल्ला झाड़ लेना एक ऐसा रवैया था और आज भी मौजूद है. जो भारत में समाजवाद का स्वप्न देखने वाले नौजवानों को गैरमार्क्सवादी समाजवादियों की तरफ आकर्षित करता है. हिंदी बेल्ट में यही बात मार्क्सवादियों के कैडर की कमी का भी एक बड़ा कारण है. 

'भारत विभाजन के गुनाहगार 'किताब में उन्होंने नेहरू को अच्छी तरह बेनकाब किया है और चौंका देने वाले खुलासे किये हैं. उन्होंने अपने अनुकरणीय गांधी पर भी सवाल उठाये हैं. इस किताब की सबसे उद्वेलित करने वाली बात है, जब लोहिया लिखते हैं "विभाजन आखिर है क्या यह जनता के हिस्सों और अलग अलग जातियों के आपस में सम्पर्क की कमी का नतीजा है". ऐसी कई बातों के अलावा लोहिया की अपनी कुछ सीमाएं भी हैं, जो मुझे लगता है बाद के दौर में बड़े संकटों का कारण भी बनी. जैसे गांधी के प्रति उनका नज़रिया कमोबेश अनालोचनात्मक ही रहा है वो कुजात गांधीवादी कहलाते हैं इसलिए वो जाति के ख़िलाफ़ बहुत कटु होने के बावजूद गांधी की प्रेरणा से, नास्तिक और अधार्मिक होते हुए भी निचली जातियों को जनेऊ पहनाने के आयोजन में शामिल होते थे. 

ऐसे ही एक आयोजन में वो 1937में मेरे गृह नगर गंगोलीहाट (उत्तराखंड) के पास आये थे और तब गैरहिंदू मानी जाने वाले कुथलिया बोरा समुदाय को जनेऊ में टांग कर गए थे. इसके अलावा नास्तिक होने के बावजूद वो सांस्कृतिक रूप से भारतीय संस्कृति और राम, कृष्ण और शिव जैसे मिथकीय पात्रों के प्रसंशक थे. 

मुझे लगता है कि उनके इस नज़रिये के कारण ही बाद के दौर के कई लोहियावादी समाजवादी, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करने वालों के सहयोगी हुए. ये भारतीय समाजवादियों की वो वैचारिक कमी है जिसके चलते ही फासिस्ट ताकतें जय प्रकाश नारायण को भी अपने झांसे मे ले पाई थीं और जार्ज फर्नांडिस को भी. विचार और वैचारिक अस्पष्टता से कितना गहरा असर पड़ता है इसे यहां समझा जा सकता है. 

लोहिया के 'इतिहास चक्र'और 'अर्थशास्त्र मार्क्स से आगे 'जैसे प्रबंध बहुत आकर्षक हैं, लेकिन कई मायनों में अधूरे भी. कुछ बेहद असहज सवाल जो आज भी अनुत्तरित हैं के अलावा ये शास्त्र और प्रणाली के बतौर मार्क्सवादी दर्शन के सामने टिकने वाले नहीं हैं. इतिहास में शायद टिक भी जाये लेकिन अर्थशास्त्र मे बिलकुल नहीं.

लेकिन एक आदर्शवादी समाजवादी फेमिनिस्ट के बतौर एक मौलिक विचारक और जीवन भर समझौता रहित संघर्ष करने वाले जनता के नायक के बतौर लोहिया को कभी नहीं भुलाया जा सकता है.