मसूद अज़हर पर चीन का वीटो, मोदी की कूट​नीतिक हार

"..अपनी कूटनीतिक विफलता को ढंकने के लिए मोदी हर बार नेहरू को आगे कर देते हैं. नेहरू की अंतरराष्ट्रीय नीतियों के सामने मोदी हाफ़ पायडल मारकर साइकिल सीख रहे बच्चे के बराबर हैं.."
-दिलीप ख़ान


ये लगभग उसी दिन साफ़ हो गया था कि चीन मसूद अज़हर पर पाबंदी का फिर से विरोध करेगा, जिस दिन सुषमा स्वराज को चीन के विदेश मंत्री ने दो टूक जवाब दिया था. इसके बाद भारत दुनिया भर में गोलबंदी में जुटा रहा. विजय गोखले चिरौरी के लिए अमेरिका पहुंच गए. माइक पोम्पियो की खुशामद करने की क्या ज़रूरत थी?

प्रस्ताव लाने वाले तीन देशों में एक देश ख़ुद अमेरिका था. प्रस्ताव गिरना अमेरिका की भी सांकेतिक हार है. मोदी सरकार की कूटनीति दिखावे वाली कूटनीति है. चीन से उसके बाद कोई बातचीत हुई भी या नहीं, ये कोई नहीं जानता. रोज़ाना बीस अपडेट देने वाली विदेश मंत्रालय की वेबसाइट इस पर चुप है.

पोम्पियो की मार्फ़त चीन को फुसला रहे थे! ख़ुद ही खुशामद कर लेते. सिर्फ़ शी जिनपिंग को झूला झुलाने अहमदाबाद बुलाएंगे मोदी जी?

मैंने कुछ रोज़ पहले इस मामले पर दो लेख लिखे. उसमें साफ़ इशारा था कि चीन फिर से अड़ंगा डालेगा. इस परिघटना का लब्बोलुआब क्या रहा और क्या सवाल उभरते हैं इन प्वाइंट्स में समझें-

  1. कूटनीति विफल रही तो देश के ग़ुस्से को वोट में बदलने की कोशिश शुरू हो गई. चीन ने मसूद अज़हर पर ‘तकनीकी रोक’ लगाई और इधर ट्वीटर पर फिर से चीनी माल के बहिष्कार की नारेबाज़ी बुलंद होने लगी है. चीनी गुलाल नहीं ख़रीदने से मसूद अज़हर की सेहत पर क्या फर्क पड़ेगा? चीन की सेहत पर क्या फर्क पड़ेगा?
  2. मोदी जी को बताना चाहिए कि 14 फ़रवरी के बाद से अब तक चीन के साथ कितनी बार बातचीत हुई? 26 फ़रवरी को बालाकोट हमले से नाराज चीन को मनाने के लिए क्या-क्या किया गया? जब चीन में सुषमा स्वराज को वहां के विदेश मंत्री ने साफ़ लफ़्ज़ों में अपना स्टैंड बताया था, तो भारत ने उसके बाद क्या किया?
  3. सुषमा स्वराज को चीन ने मसूद अज़हर पर समर्थन देने से इनकार किया और यहां का मीडिया ‘सफल कूटनीति’ का ढोल पीट रहा था. बीजेपी वाले सुषमा स्वराज को सुपर कमांडो ध्रुव बता रहे थे. क्या जमा हासिल हुआ?
  4. विजय गोखले खुशामद करने ऐसे देश के पास पहुंचे जिसने ख़ुद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव रखा था. मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव भारत ने तो रखा नहीं था! प्रस्ताव अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन का था. और भारत अमेरिका को ही मनाने पहुंच गया. प्रायोरिटी देखिए!!
  5. अपनी कूटनीतिक विफलता को ढंकने के लिए मोदी हर बार नेहरू को आगे कर देते हैं. नेहरू की अंतरराष्ट्रीय नीतियों के सामने मोदी हाफ़ पायडल मारकर साइकिल सीख रहे बच्चे के बराबर हैं.
दिलीप ख़ान चर्चित पत्रकार हैं. 
आलेख में उनकी दो फ़ेसबुक पोस्ट्स को कंपाइल किया गया है.