ज़रा इस 'दर्द' को भी महसूस करो सरकार!

बहरहाल मुद्दा यह है कि अगर सिस्टम में थोड़ी भी संवेदना होती, तो 18 साल में पहली बार तैयार हो रही मानव विकास सूचकांक की रिपोर्ट को बजट का मुख्य आधार बनाया जाता । लेकिन सच तो यह है कि बजट का मुख्य आधार न इस तरह की रिपोर्टों को बनाया जाता है और न भविष्य की चिंताओं को। बजट का आधार वोटों का समीकरण होता है या फिर राजनेता,नौकरशाहों और ठेकेदारों में नोटों की बंदरबांट का गणित ।
- योगेश भट्ट



यह महज इत्तेफाक था कि उत्तराखंड में एक ओर बजट की तैयारियां चल रही थी और दूसरी ओर मानव विकास सूचकांक तैयार हो रहा था। प्रदेश में मानव विकास सूचकांक तैयार करने की यह कवायद पहली बार हो रही थी। कायदे से दोनो में तालमेल के स्तर पर गहरा संबंध होना चाहिए, लेकिन ऐसा कुछ नहीं रहा।

सालाना बजट से पहले मानव विकास सूचकांक के आंकड़े भी सामने आ चुके थे, राज्य के 13 जिलों में से 10 पर्वतीय जिलों की हालत बेहद चिंताजनक बनी हुई थी। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंहनगर ज़िले एक तरफ और बाकी दस ज़िले विकास सूचकांक में दूसरी ओर हैं। सोचनीय पहलू यह है कि विकास के पैमाने पर दोनों के बीच अंतर लगातार गहराता जा रहा है। अंतर को इस बानिगी से आसानी से समझा जा सकता है कि मानव विकास सूचकांक में देहरादून पहले पायेदान पर तो उससे सटा हुआ टिहरी जिला अंतिम पायेदन पर है।

सोचिये, यह हाल तब है जब विकास के नाम पर राज्य हजारों करोड़ रुपए खर्च चुका है। पचास हज़ार करोड़ से ऊपर का तो राज्य अब तक कर्जदार ही हो चुका है। कुल मिलाकर राज्य में मानव विकास सूचकांक की प्रारंभिक रिपोर्ट चीख रही थी कि राज्य के पर्वतीय जिलों में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। मगर अफसोस सरकार को यह चीख सुनाई नहीं दी। राज्य का सालाना बजट भी पचास हजार करोड़ के आंकड़े छूने जा रहा है, लेकिन राज्य हाशिये पर है।

अब यह आश्चर्य नही, बल्कि नियति ही है। उत्तराखंड में सरकार कोई भी हो, वह सिर्फ अपने एजेंडे पर काम करती है। यहां नौकरशाहों और राजनेताओं की संवेदनाएं मर चुकी हैं, हर कोई सिर्फ उल्लू सीधा करने में लगा  है। फिक्र राज्य के भविष्य की किसी को नहीं, फिक्र है सिर्फ अपने साम्राज्य और सत्ता की। इन्हें फिक्र होती है अपने विश्वविद्यालय और कालेज खड़े करने की, निजी होटल, रिजार्ट, बाग बगीचों और फार्मों की। चिंता होती है तो अपनी उन फैक्ट्रियों और परियोजनाओं की जिनमें उनकी कोई हिस्सेदारी होती है । यहां सरकारी नीतियां बनती भी इसी चिंता के इर्द-गिर्द हैं। परियोजना चाहे कृषि, बागवानी की हो या सड़क, बिजली, पानी की हर जगह पैमाना एक ही है।

नीति भांग की खेती करने की हो या फिर चकबंदी या बागवानी की, योजना पर्यटन या शहरीकरण की हो या फिर राजस्व बढ़ाने के लिए शराब और खनन के कारोबार की, सब पर राजनेताओं और नौकरशाहों का एकाधिकार है। सरकार को फिक्र होती ही उन खास परियोजनाओं की है जिसमें किसी राजनेता या नौकरशाह विशेष की व्यक्तिगत दिलचस्पी होती है। ऐसे में नीतियों का आधार और विकास का माडल क्या होगा इससे अंदाजा लगाइये कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष आधे से अधिक माननीय खुद पेशागत ठेकेदार हैं।

बहरहाल मुद्दा यह है कि अगर सिस्टम में थोड़ी भी संवेदना होती, तो 18 साल में पहली बार तैयार हो रही मानव विकास सूचकांक की रिपोर्ट को बजट का मुख्य आधार बनाया जाता । लेकिन सच तो यह है कि बजट का मुख्य आधार न इस तरह की रिपोर्टों को बनाया जाता है और न भविष्य की चिंताओं को। बजट का आधार वोटों का समीकरण होता है या फिर राजनेता, नौकरशाहों और ठेकेदारों में नोटों की बंदरबांट का गणित।

बजट के नाम पर संवाद और सुझाव के लिए सरकार फेस बुक लाइव और दूसरे आयोजन तो जरूर करती है, लेकिन इसका मकसद नब्ज पकड़ना नहीं सिर्फ अपना चेहरा चमकाना और यह दिखाना होता है कि सरकार संजीदा है । काश, सरकार ऐसा कुछ करने के बजाय मानव विकास सूचकांक के आंकड़ों को ही गंभीरता से    लेती । मगर यहां तो सरकार इस बात पर पीठ थपथपाती है कि पहली बार मानव विकास सूचकांक तैयार कराया जा रहा है । सरकार इस पर वाहवाही लूटना चाहती है कि राज्य की प्रति व्यक्ति आय तीन साल में तीस हजार रुपए सालाना बढ़ी है । इस पर शाबासी चाहती है कि प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से आगे निकलकर 1 लाख 77 हजार 356 रुपए हो चुकी है ।

दोष अकेले सिर्फ त्रिवेंद्र सरकार का ही नहीं, सत्ता में आने वाली हर सरकार का यही रवैया रहा है। सरकार यह नहीं बताती कि जिनकी कमाई से प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा निरंतर बढ़ रहा है, एक करोड़ से अधिक की आबादी में उनकी संख्या राज्य में सिर्फ चंद हजार ही है । जबकि बड़ा सच तो यह है कि देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंहनगर और नैनीताल को छोड़कर एक भी जिला ऐसा नहीं है, जिसकी प्रति व्यक्ति आय एक लाख रुपए तो क्या उसके आसपास भी हो । उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ जिले तो ऐसे हैं, जिनकी प्रति व्यक्ति आय 25 हजार भी नहीं है । एक अन्य सच्चाई यह भी है कि राज्य की विकास दर तेजी से घट रही है । राज्य में आर्थिक विकास की जो दर 2015- 16 में 7.52 थी, वह घटकर 6.77 रह गयी है । लेकिन इन आंकड़ों का जिक्र सरकार कभी नहीं करेगी, क्योंकि इनका जिक्र हुआ तो विकास के उस माडल पर सवाल उठ खड़े होंगे जो सरकारों ने अब तक अपनाया है ।

सरकारें भले ही यह मानने को तैयार न हो, लेकिन यह साबित हो चुका है कि विकास का जो माडल राज्य ने अपनाया है वह सही नहीं है । दरअसल सरकार की नीतियों में भविष्य की चिंता और राज्य के प्रति सदइच्छा का अभाव है । राज्य के विकास का माडल उसकी विषम भौगोलिक परिस्थतियों व सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताओं के अनुरूप तैयार नहीं किया गया । सरकारी नीतियां अंतत: पलायन को बढ़ावा देने वाली ही रही है। जबकि जरूरत यह थी कि सरकारी नीतियां यह सुनिश्चित करने वाली होती। विविधतापूर्ण राज्य में शहरीकरण के साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत किया जाता। शहरों का विकास गांवों की कीमत पर न होकर बल्कि गांवों के साथ जोड़कर किया जाता। कृषि, बागवानी, पशुपालन और पर्यटन पर आधारित विकास का माडल तैयार किया जाता। नीति ऐसी होती कि जो जहां बसा है उसका भविष्य वहीं सुरक्षित होता। राज्य के अपने संसाधनों में बढ़ोतरी होती और रोजगार की संभावनाओं को बढ़ाया जाता।

दुर्भाग्यपूर्ण यही है कि उत्तराखंड में सरकारों का यह दृष्टिकोण कभी रहा ही नहीं । यहां तो सरकारें कर्ज लेती रही और घी पीती रहीं। भविष्य की परवाह किसी को होती तो आज कर्ज का आंकड़ा पचास हजार करोड़ के पार नहीं पहुंचता । नतीजा साफ दिखायी दे रहा है । सरकार ने हाल में 48 हजार करोड़ से ऊपर का जो बजट पास कराया, उसमें से 25 हजार करोड़ से ऊपर तो सिर्फ वेतन, पेंशन, मजदूरी और कर्ज के ब्याज में खर्च होने हैं । हाल यह है कि राज्य की अपने संसाधनों से कुल आमदनी इतनी भी नहीं है। ऐसे में सरकार को एकमात्र सहारा कर्ज का है । अभी तक औसतन 500 करोड़ रुपया महीना कर्ज लेना पड़ता था, लेकिन अब 800 रुपए महीना कर्ज उठाने से भी काम नहीं चल पा रहा है । हाल यह है कि आगामी वित्तीय वर्ष के अंत तक कर्ज की रकम 53 हजार करोड़ का आंकड़ा पार जाएगी ।

कर्ज लगातार बढ़ रहा है यह बड़ी चिंता या सवाल नहीं है । कर्ज गलत नहीं ठहराया जा सकता, बशर्ते उसका इस्तेमाल सही किया जा रहा हो । कर्ज की व्यवस्था तो वह विशेष सुविधा है जिससे राज्य खुद को आत्मनिर्भर बना सकते हैं । उत्तराखंड के संदर्भ में चिंता इस बात की है कि कर्ज की मोटी रकम चढ़ने के बाद भी प्रदेश का मानव विकास सूचकांक गिर रहा है । कर्ज की रकम का इस्तेमाल आय के संसाधन विकसित करने के बजाय तनख्वाह, भत्ते, बांटने और राजकाज चलाने वाले नेता और अफसरों की ऐशो आराम पर लुटाने में खर्च हो रहा है। सवाल राज्य के वित्तीय प्रबंधन का है, बढ़ते कर्ज से सरकार के पार पाने का है।

हकीकत यह है कि उत्तराखंड नए अपने नए संसाधन जुटाने और आमदनी बढ़ाने में भले ही नाकाम रहा हो, लेकिन विधायक निधि से बढ़ाने लेकर वेतन और सुविधाएं बढ़ाने के मामले में नंबर वन बना हुआ है । सरकारी खर्च में ऐश काटना तो मानो यहां की कार्य संस्कृति में शामिल हो चुका है । बहरहाल,जब जब सरकारें बजट पेश करती हैं तो आम आदमी बहुत उम्मीदें लगा बैठता है।



यह सही है कि राज्य के बजट में संभावनाएं सीमित होती हैं, केंद्र पर निर्भरता अधिक होती है । फिर भी कुछ नयेपन या पिछले अनुभवों से सबक की उम्मीदें तो की ही जा सकती है, क्योंकि राज्य का बजट सरकार की सोच, उसकी प्राथमिकताओं, प्लानिंग और प्रबंधन को प्रतिविम्बित करता है । संसाधन चाहे कितने ही सीमित क्यों न हों फिर भी सरकार राज्य की जरूरत के मुताबिक प्राथमिकताएं तय कर विकास का माडल तो तैयार कर ही सकती है। फिलहाल तो सरकार सिर्फ इधर की टोपी उधर कर बजट में सिर्फ आमदनी और खर्च के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश भर करती नजर आती है, लेकिन उम्मीद की जाती है कि वो सुबह कभी तो आएगी।