अमोल पालेकर प्रकरण पर हुसैन हैदरी ने लिखी नज़्म : "हमें कहा जा रहा है अब के"

नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट के एक कार्यक्रम में अमोल पालेकर को बोलने से रोक देने के मामले पर मशहूर शायर हुसैन हैदरी ने ​एक नज़्म लिखी है. 
हुसैन अपनी नज़्म 'हिंदुस्तानी मुसलमां' से चर्चा में आए थे. वह हिंदी सिनेमा के लिरिसिस्ट हैं. हैदरी ने अपनी फ़ेसबुक वॉल पर यह नज़्म साझा की है. वहीं से इस नज़्म को प्रैक्सिस में शेयर किया जा रहा है. 
- सं.

हमें कहा जा रहा है अब के

“कहीं भी महफ़िल अगर सजेगीतो हम बताएँगे कौन उसमें शरीक होगा  
वो कौनसा दिन, क्या वक़्त होगा वहाँ प’ शम’अ अगर रखी तोवो किसके इकराम में जलेगी 
कोई भी मौज़ू परिंद जैसे न उड़ सकेगा
क़फ़स में ही फड़फड़ाना होगा 
हर एक गर्दन प’ होगा पोशीदा इक शिकंजा
जो आह करते ही सख़्त होगा  
हमारे हाथों में एक मीज़ान होगी जिस पर
सभी के लफ़्ज़ों का वज़’न होगा 
हर एक आवाज़ एक ही राग गाएगी और
किसी की भी दस्तरस में बर्बत
कभी न होगा” 
हमें कहा जा रहा है अब के 
“अभी सहूलत है, ख़ुश रहो तुम
अभी तो आवाज़ और लफ़्ज़ों
तलक ही पहुँचा है हक़ हमारा  
अभी तो ये ही ज़रर किए है
अभी ख़यालों की आग जो बस  
बिला वजह जल रही है तुम में
अभी तो उसको है सर्द करना  
अभी तसव्वुर की एक बस्ती
जो दिल में तुमने बसा रखी है
उसे है बर्बाद हमको करना  
अभी तो आँख़ों के दो दरीचे
तुम्हारे ख़्वाबों के पासबाँ है
अभी तो उनका है क़त्ल होना 
अभी बहुत कुछ है और बाक़ी
अभी ज़रा इंतज़ार करना” 
हमें कहा जा रहा है अब के