ओले, ओले, इतने ओले!

हिंदी के मशहूर विज्ञान लेखक देवेन मेवाड़ी से समझें ओले हैं क्या और ये बनते कैसे हैं?


- देवेन मेवाड़ी

बिजली कड़की, बादल बरसे, झमाझम बारिश हुई और बेशुमार ओले गिरे आज। आखिर कहां से ले आते हैं बादल वर्षा और ओले? 


वैज्ञानिकों कहते हैं कि जब नम हवा धरती की सतह से ऊपर और ऊपर उठती जाती है तो वह ठंडी होती जाती है। आसमान में ऊपर हवा का दवाब कम होता है। इसलिए नम हवा वहां पहुंच कर फैल जाती है। नीचे से गर्म और नम हवा के आते रहने के कारण फैलती हुई हवा में नमी बढ़ती जाती है। यह नमी धूल या धुएं के सूक्ष्म कणों पर जम जाती है। उन पर नमी जमने से वर्षा की नन्हीं बूंदे बन जाती हैं और बादल का जन्म होता है। 

अरे, बाबा नागार्जुन आप को कैसे पता लगा? आपने भी लिखा है ना... ‘बादल को घिरते देखा है/ छोटे-छोटे मोती जैसे/उसके शीतल तुहिन कणों को’...। ऐसी ही असंख्य बूंदें तो जन्म देती हैं बादल को। जब ये बूंदें आपस में मिलती हैं तो बड़ी बूंदें बन जाती हैं। वे भारी होती जाती हैं और नीचे टपक पड़ती हैं। यही वर्षा है।

और, ओले? वर्षा की बूंदों से ही ओले भी बन जाते हैं, जो आज जमकर बरसे थे। ऊंचे आसमान में जब पानी की बूंदों पर हिमकण चिपक जाते हैं तो वे नीचे टपक पड़ती हैं। तब उन पर पानी की और बूंदें चिपक जाती हैं। नीचे से ऊपर दौड़ती हवा उन्हें ऊपर उछाल देती है। वहां वे ठंड से जम कर कड़ी हो जाती हैं। उन पर बर्फ की परत जम जाती है। 

भारी होकर वे फिर नीचे गिरती हैं और हवा उन्हें फिर ऊपर धकेल देती है। उन पर फिर बर्फ की परत जम जाती है। इस तरह वे उछलती-गिरती बूंदें बर्फ की परतों से गोलियों की तरह बड़ी होती जाती हैं और फिर कंचों की तरह बरस पड़ती हैं। बर्फ के वे कंचे ही ओले हैं। बस, यों समझ लीजिए कि ओले क्या गिरे, बादलों ने कंचे खेले!


देवेन मेवाड़ी हिंदी के मशहूर विज्ञान लेखक हैं.
आलेख उनकी फ़ेसबुक से साभार.