पहाड़ों में नहीं आते 'लोकतंत्र के सिग्नल'

".. असल में पहाड़ों की आबादी बहुत नहीं, और वे भी बहुत छितरी हुई है. इसके चलते टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए पहाड़ों में अच्छी सर्विस देना कॉस्ट इफैक्टिव नहीं. जितने कम एफर्टस् में वे मैदानी इलाक़ों में ग़जब मुनाफ़े का बिजनस कर सकते हैं, पहाड़ों में नहीं. मूल वजह यही है कि पहाड़ के कई गांवों और क़स्बों में दूरसंचार सुविधाएं एकदम ख़स्ता हाल हैं..

यह आलम सिर्फ दूरसंचार सेवाओं का ही नहीं बल्कि हर एक सेक्टर का है. इसी वजह से यहां ना स्वास्थ सेवाएं दुरूस्त हैं, ना ही शिक्षा, ना ही यातायात. रोजगार में भी यही अड़चन बनता है और फ़िर यही पलायन की वजह भी.."
-रोहित जोशी


यूं तो कहने को मैं नैनीताल में रहता हूं लेकिन सच में ऐसा हो बहुत कम पाता है. डेढ़ दो महीने में दो चार दिन के लिए ही नैनीताल में रह पाता हूं. ज्यादातर इधर-उधर, पहाड़ के अलग-अलग ​इलाक़ों में रिपोर्टिंग के सिलसिले में.. इधर परसों शाम नैनीताल पहुंचा हूं और आज फिर निकल जाना है.

अब दो साल होने को हैं, नैनीताल/पहाड़ लौटे. जब भी इधर रहता हूं इंटरनेट की कनैक्टिविटी से परेशान रहता हूं. 2 जी ज़माने में भी इससे बेहतर इंटरनेट स्पीड हुआ करती थी. नेट में कोई भी काम करने का मतलब है सिर पीट लेना. इतनी बुरी कनैक्टिविटी कि आप इतना फ्रस्ट्रेट हो जाएंगे कि आप जो काम कर रहे हैं उसमें क्रिएटिविटी ​की फिर कल्पना भी नहीं कर सकते. कल भी यही आलम था, कनैक्टिविटी की तलाश में भीषण ठंड में बाहर सड़क में बैठकर किसी तरह स्टोरी फाइल कर पाया.

यहां किसी भी नेटवर्क में आपको सही कनैक्टिविटी नहीं मिल पाती. मेरे पास एक वोडाफोन का सिम था पोर्ट करके एयरटेल करा लिया, लेकिन हाल वही.. जबकि बीएसएनएल की भी एक सिम है.. यहां तक कि जियो का भी एक डॉंगल लिया लेकिन उससे भी पीड़ित ही रहा.. फिर बीएसएनएल का ब्रॉडबैंड भी लगवा लिया.. और सिर्फ हर महीने बिल भर रहा हूं.. लेकिन कोई राहत नहीं..

यह 21वीं सदी में उस मुल्क़ में ही हो रहा है, जिसे पिछले 5 सालों से प्रधानसेवक डिजिटल बनाने/बताने पर तुले हुए हैं. और मैं उत्तराखंड के सबसे मशहूर शहर नैनीताल की बात कर रहा हूं. उसी उत्तराखंड के, जहां मौजूदा सत्तारूढ़ डबल इंजन की भाजपा सरकार है. यह आलम अकेले नैनीताल का नहीं जबकि मेरे गृहनगर गंगोलीहाट, और तकरीबन पूरे पहाड़ में एक सा है.

मेरे जैसे फ्रीलांसर के लिए इंटरनेट बेहद महत्वपूर्ण है. मैं दिल्ली छोड़ पहाड़ों की ओर लौट तो आया हूं लेकिन इंटरनेट के बिना मेरी रोजी-रोटी नहीं चल सकती.

मैं तो पत्रकार हूं, लेकिन मेरे कई सॉफ्टवेयर इंजीनियर दोस्त भी कई बार इसी तरह वापस लौटने की बात करते हैं. उनका आर्ग्यूमेंट रहता है कि पहाड़ों में प्रोडक्शन प्लांट्स और फैक्ट्रियां लगाने में दिक्कत है लेकिन आईटी इंडस्ट्री को तो इस सब की ज़रूरत नहीं तो उत्तराखंड के पहाड़ों में इसकी गुंजाइश क्यों नहीं तलाशी जा रही? बात तो उनकी एकदम सही है लेकिन ये इनिसिएटिव ले कौन और कैसे? मैं सोचता हूं अगर सच में ये लोग वापस यहां लौट आएं और फ्रीलांसिंग ही करने की भी सोचें, लेकिन ये लोग काम करेंगे कैसे?

आख़िर ऐसा क्यों कर होता है? पहाड़ों कनैक्टिविटी क्यों नहीं आती?

असल में पहाड़ों की आबादी बहुत नहीं, और वे भी बहुत छितरी हुई है. इसके चलते टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए पहाड़ों में अच्छी सर्विस देना कॉस्ट इफैक्टिव नहीं. जितने कम एफर्टस् में वे मैदानी इलाक़ों में ग़जब मुनाफ़े का बिजनस कर सकते हैं, पहाड़ों में नहीं. मूल वजह यही है.

यह आलम सिर्फ दूरसंचार सेवाओं का ही नहीं बल्कि हर एक सेक्टर का है. इसी वजह से यहां ना स्वास्थ सेवाएं दुरूस्त हैं, ना ही शिक्षा, ना ही यातायात. रोजगार में भी यही अड़चन बनता है और फ़िर यही पलायन की वजह भी.

उत्तराखंड को एक पहाड़ी राज्य बनाने के पीछे जो सबसे अधिक वाज़िब तर्क था वह यही था कि इसके पहाड़ी भूगोल के अनुरूप इसके विकास के रास्ते खोले जा सकें. लेकिन यहां भी पिछले 18 सालों में वही मॉडल अपना लिया गया, जो उत्तरप्रदेश में था और जो पूरे देश में चल रहा है. केंद्रीकृत विकास का मॉडल.

इस मॉडल के तहत आपको पूरे देश को दिल्ली और दूसरे महानगरों या बड़े शहरों में ला पटकना है. चाहे ये शहर ख़ुद सांस लेने लायक बचे हों या नहीं.

सारी सुविधाएं इन्हीं ​के इर्द-गिर्द होंगी. इसके बाहर के इलाक़े कंपनियों के मुनाफ़े के लिए इफैक्टिव नहीं रहेंगे और अगर आप इन नगरों महानगरों में नहीं रहेंगे तो अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक बन जाएंगे.

लोकतंत्र में अवसरों की समानता एक अनिवार्य मूल्य है और यह उपलब्ध कराना राज्य की ज़िम्मेदारी.

लेकिन यह देश इन कंपनियों की मनमानी और इनके हितों के हवाले है.

यह व्यवस्था ऐसे ही रची गई है..