समीक्षा: कुछ अधूरा है 'अंधेरा कोना'

बहुत सारे लोगों को ये सब अपनी जमीन के जाने-पहचाने किरदार लगेंगे, उनकी कहानियां जानी-पहचानी कहानियां लगेंगी।लेकिन फिर भी एक फांस बची रहती है। विकास या लोकतंत्र की जिन विडंबनाओं की कथा उपन्यास में है, उनका और विस्तार अपेक्षित रह जाता है। विकास को लेकर चल रही बहस अधूरी जान पड़ती है। यह उपन्यास विचार या अनुभव के स्तर पर ऐसा कुछ नया नहीं दे जाता जिससे हम परिचित नहीं हैं।
- प्रिय दर्शन




इस हफ्ते किताबों की नई खेप आई तो मन‌ प्रसन्न हो उठा। शुरुआत उमाशंकर चौधरी के उपन्यास 'अंधेरा कोना' से की। फेसबुक पर कई लेखकों-पाठकों ने इस उपन्यास की तारीफ़ की है। उमाशंकर वैसे भी मुझे संभावनाओं से भरे लेखक लगते हैं। उनके पास कहने लायक बातें भी हैं और कहने का तरीक़ा भी।‌ कविता, कहानी और आलोचना में भी वे सहज भाव से हाथ आजमाते रहे हैं।‌

उनका यह उपन्यास मैं शनिवार-रविवार की फुरसत में पढ़ गया। उपन्यास के तीन सिरे मुझे खुलते दिखे। एक सिरा विकास की विडंबना से जुड़ता है। चुनाव से पहले गांव में चिकनी सड़क बनी है और सब ख़ुश हैं। टमटम चलाने वाला और अपने घोड़े सूरज को बिल्कुल भाई और सखा‌ मानने वाला नागो लेकिन पाता है कि इस चिकनी सड़क ने उसका रोजगार छीन लिया है। अब इस सड़क पर ई रिक्शे दौड़ते हैं। गांव के इस विकास में मोबाइल वह नई चीज है जो गांव के बेरोजगार नवयुवकों को व्यस्त रहने के बहाने भी दे रही है और विकृतियां भी। 


उपन्यास का दूसरा सिरा लोकतंत्र की विडंबना से जुड़ता है। यह चिकनी सड़क घुटर यादव ने बनवाई है जिसकी पत्नी इस क्षेत्र की विधायक है। घुटर यादव भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में बढ़ रहे पाखंड और उसकी विरूपताओं का लगभग प्रतीक पुरुष है। चुनाव जीतने के लिए जरूरी सारे छल-कपट उसे आते हैं। गांव में रह रहे विदो बाबू बेहद ईमानदार आदमी हैं और उन्होंने बिल्कुल अपने दम पर घुटर यादव के विरुद्ध मुहिम छेड़ रखी है। पूरा गांव विदो बाबू की ईमानदारी का कायल है और उन्हें देवता मानता है, लेकिन वह उनका साथ नहीं देता। उनकी ईमानदारी परास्त होती है और पाखंड जीतता है। 

उपन्यास का तीसरा सिरा एक अनकही सी प्रेम कहानी में खुलता है। नागो और चिड़िया इंतजार करते रह जाते हैं कि वे एक-दूसरे से मन की बात कहें, लेकिन उनके निजी हालात और गांव का बदलता माहौल उन्हें ऐसा कोई समय नहीं देते।

उपन्यास में कुछ और भी उपकथाएं हैं- अपनी ही धमन भट्टी में गल और जल गए नागो के लोहार पिता की, ज़िंदगी जिनके लिए घिसटता अभिशाप है, उसकी बहनों की और गांव के कुछ और किरदारों की। बहुत सारे लोगों को ये सब अपनी जमीन के जाने-पहचाने किरदार लगेंगे, उनकी कहानियां जानी-पहचानी कहानियां लगेंगी।

लेकिन फिर भी एक फांस बची रहती है। विकास या लोकतंत्र की जिन विडंबनाओं की कथा उपन्यास में है, उनका और विस्तार अपेक्षित रह जाता है। विकास को लेकर चल रही बहस अधूरी जान पड़ती है। यह उपन्यास विचार या अनुभव के स्तर पर ऐसा कुछ नया नहीं दे जाता जिससे हम परिचित नहीं हैं। यही बात इसकी अधूरी रह गई प्रेम कहानी के बारे में कही जा सकती है। कोई टीस, कोई हूक, कोई उदासी इतनी गहरी नहीं गड़ती कि उसके निशान हमारे वजूद पर देर तक रहें।

उपन्यास का अंत आने से पहले उमाशंकर इसे एक प्रतीकात्मक अर्थ देने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह बहुत कारगर होती नहीं दिखती।

बेशक उपन्यास में कई मार्मिक और सजीव ब्योरे हैं। कहीं कहीं लेखक का प्रखर यथार्थ बोध भी प्रभावित करता है। लेकिन हिंदी के संसार को उमाशंकर चौधरी से और प्रखर और बेहतर कृतियों की अपेक्षा है। हालांकि यह जोड़ना जरूरी है कि हिंदी में अमूमन जो लेखन हो रहा है, उसके परिप्रेक्ष्य में उमाशंकर का कृतित्व कहीं बेहतर है।


प्रिय दर्शन वरिष्ठ पत्रकार हैं. NDTV से जुड़े हैं.
यह आलेख उनकी वॉल से साभार.