जेब ख़ाली और जर्मनी की यात्रा!

तो कुल मिलाकर हुआ यूं कि अपनी पहली विदेश यात्रा में मेरी जेब में एक यूरो भी नहीं था. दिमाग आशंकाओं में घिरा था कि आख़िर वहां पहुंच कर करूंगा क्या? वहां तो फ़ोन भी नहीं काम करेगा. क्या यहां का डेबिट कार्ड वहां काम करता होगा? मालूम नहीं था. मेरी फ्लाइट म्यूनिख़ की थी, क्या वहां एयरपोर्ट में करंसी एक्सचेंज हो जाएगी? शायद.. ! पर मेरी तो म्यूनिख़ से कोलोन की कनैक्टिंग फ्लाइट थी और वो भी म्यूनिख़ पहुंचने के अगले आधे घंटे में, जहां से मुझे भी ​बॉन जाना था. म्यूनिख़ के एयरपोर्ट में भी एक्सचेंज काउंटर्स बेशक बाहर ही होंगे. मुझे तो बाहर जाने का मौका मिलेगा ही नहीं. तो क्या कोलोन में करंसी एक्सचेंज काउंटर्स होंगे क्योंकि वो तो छोटा एयरपोर्ट है?
-रोहित जोशी
Munich Airport

तीन साल पहले आज मैं जर्मनी पहुंचा था. मेरी यह पहली विदेश यात्रा थी और इंदिरा गांधी इंटरनेश्नल एयरपोर्ट में लगेज चैकइन, इमीग्रेशन और चकाचौंध की गजबज में मैं बिना करंसी एक्सचेंज किए ही इमिग्रेशन से भीतर दाखिल हो गया, यह सोच कर कि अंदर भी करंसी एक्सचेंज काउंटर्स होते ही होंगे. लेकिन पता चला कि करंसी तो बाहर ही एक्सचेंज करानी होती है। अब कोई चारा ही नहीं बचा. फिर अपने कज़िन महेश को फ़ोन किया, वह यहीं एयरपोर्ट में क़तर एयरलाइंस में काम करता है. लेकिन वो घर पर था. उसने अपने कुछ दोस्तों को फ़ोन किया कि वे जाकर करंसी एक्सचेंज करवा दें, लेकिन बात नहीं बन सकी.

तो कुल मिलाकर हुआ यूं कि अपनी पहली विदेश यात्रा में मेरी जेब में एक यूरो भी नहीं था. दिमाग आशंकाओं में घिरा था कि आख़िर वहां पहुंच कर करूंगा क्या? वहां तो फ़ोन भी नहीं काम करेगा. क्या यहां का डेबिट कार्ड वहां काम करता होगा? मालूम नहीं था. मेरी फ्लाइट म्यूनिख़ की थी, क्या वहां एयरपोर्ट में करंसी एक्सचेंज हो जाएगी? शायद.. ! पर मेरी तो म्यूनिख़ से कोलोन की कनैक्टिंग फ्लाइट थी और वो भी म्यूनिख़ पहुंचने के अगले आधे घंटे में, जहां से मुझे भी ​बॉन जाना था. म्यूनिख़ के एयरपोर्ट में भी एक्सचेंज काउंटर्स बेशक बाहर ही होंगे. मुझे तो बाहर जाने का मौका मिलेगा ही नहीं. तो क्या कोलोन में करंसी एक्सचेंज काउंटर्स होंगे क्योंकि वो तो छोटा एयरपोर्ट है?

ये सारे सवाल दिमाग़ में कौंधते रहे. यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी कोई अंदाज़ा ही नहीं था कि आगे क्या होगा. लेकिन अपनी पहली विदेश यात्रा के उत्साह से लबरेज़ मैं बार-बार बेपरवाही से ख़ुद ही को समझाता रहता कि क्यों परेशान होना, ''कुछ ना होगा तो तज़रुबा होगा.''

उस साल फ़रवरी के उस पहले दिन जब लुफ़्थांसा की वह फ्लाइट मुझे लेकर म्यूनिख़ में उतरी तो म्यूनिख़ रिमझिम बरसात में भीग रहा था. इस फ्लाइट से उतरते ही मुझे कोलोन की फ्लाइट में सवार होना था. उसके लिए जिस कोरिडोर से होते मैं दूसरे प्लेन की ओर जा रहा ​था, बाहर शीशे के पार भीगे जर्मनी से मेरी पहली मुलाक़ात हो रही थी. मेरी नज़र लगातार एक्सचेंज काउंटर को तलाश रही थी, क्योंकि दुनिया के सबसे अमीर देशों में शुमार एक अनजान मुल्क़ में मेरी जेब एकदम ख़ाली थी.

लेकिन कोई एक्सचेंज काउंटर नहीं नज़र आया और मैं कुछ देर में कोलोन की फ्लाइट में सवार था. यह लोकल फ्लाइट कुछ ऐसी थी मानो कोई दफ़्तर होता हो. सूटेड-बूटेड महिला-पुरूष में से अधिकतर अपने लैपटॉप्स के की-बोर्ड खटखटा रहे थे, मानो कोलोन पहुंचते ही अपने अपने दफ्तरों में उन्हें प्रैजेंटेशंस देने हों और वे उससे पहले इसे आख़िरी बार दुरुस्त कर लें. शायद ये लोग नौकरी पेशा लोग थे ​जो कि हर रोज़ इसी तरह एक घंटे की इस फ़्लाइट से दफ्तर जाया करते होंगे. मेरे दोनों ओर ऐसी ही महिलाएं बैठी हुई थी. जैसे ही फ़्लाइट ने टेक-ऑफ़ किया उन्होंने अपने लैपटॉप्स के हेड्स डाउन ​कर लिए और जब प्लेन हवा में जा कर स्थिर हुआ इनमें से कई फिर उसी काम में जुट गए.

ख़ैर! अगले एक-सवा घंटे में मैं कोलोन में लगेज़ बैल्ट से अपना लगेज़ उठा रहा था. मुझे नहीं मालूम था कि मुझे अब क्या करना है. हालांकि मेल पर मेरे जर्मन एम्प्लॉयर दफ्तर डॉयचे वेले से जो बात हुई थी उसमें डॉयचे वेले की हिंदी सर्विस के हेड महेश झा को मुझे रिसीव करना था. लेकिन कहां और कैसे यह मुझे नहीं समझ आ रहा था. एयरपोर्ट से बाहर पहुंचते ही मैंने कोशिश की कि कहीं एक्सचेंज काउंटर तलाश पाउं लेकिन यहां कोई एक्सचेंज काउंटर नहीं था. एक्ज़िट का जो रास्ता था मैं उसे ही फॉलो करता रहा. बाहर निकला तो कोलोन भी उस रोज़ भीग रहा था. यह छोटा एयरपोर्ट था. यह एयरपोर्ट बॉन और कोलोन शहर के बीचों बीच पड़ता है.

जैसे ही मैं बाहर निकला मेरे दिमाग़ की सारी कशमकश जाती रही. सामने मुझे महेश जी दिख गए जिनसे मैं दिल्ली में एक बार मुलाक़ात कर चुका था. महेश जी का घर एयरपोर्ट के पास ही था जहां से वह हर रोज़ दफ़्तर जाते थे. उन्होंने तय किया था कि वे मुझे अपने साथ ही दफ़्तर लेते चलेंगे ताकि मुझे दिक़्कत ना हो.

महेश जी के इस फ़ैसले ने मुझे कितनी राहत दी थी यह मैं ही जानता हूं. क्योंकि मैंने सात समंदर पार पहली बार जब विदेशी धरती पर क़दम रखा तो मेरी जेब एकदम खाली थी. मेरे पास एक यूरो भी नहीं था.

..यात्रा के क़िस्से जारी रहेंगे.