ढोलक बस्ती के सुर-ताल

ढोलक बस्ती के अधिकतर बच्चे अ​पनी ज़िंदगी के सबसे शुरूआती दिनों से ही अपना पेट पालने लगते हैं. कहीं आपको वे रेलवे फाटकों, शहर भर के चौराहों और दूसरी जगहों पर गाड़ीवानों, राहगीरों आदि से, अलग-अलग क़रतब करते हुए भीख मांगते दिख जाएंगे, या फिर शहर भर का कूड़ा बीनते. ज़िंदगी शुरुआत से ही उन्हें उनका हुनर सिखा देगी है. ज्यों-ज्यों ये बड़े होते हैं, और बड़ी ज़िम्मेदारियां इनके कंधों पर चढ़ बैठती हैं. ऐसे में ये ढोलक थाम लेते हैं और ढोलक इन्हें. इनके हुनर के हाथों कसी ये ढोलकें अक्सर हमारी ज़िंदगी में ख़ुशियों की सरगम से ताल मिलाती हैं, लेकिन ढोलक बस्ती से उठती तालों में इन ख़ुशियों की सरगम को सुन पाना बेहद मुश्किल नज़र आता है.
-याशी गुप्ता


उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर की चकाचौंध से दूर गरीबी की चादर को ओढ़े बसी ढोलक बनाने वालों की ये एक छोटी सी 'ढोलक बस्ती'. कीचड़ और मलबे के बीच बसी इस बस्ती में, बाँस के डंडों पर टिकी पन्नी की चादर को ओढ़े हुए कई झोपड़ियाँ हैं. इन झोपड़ियों में 2000 से भी अधिक लोग अपना जीवन बसर कर रहे हैं. ढोलक बनाना, उन्हें बेचना या कूड़ा बीनना और उसे बेचना यही यहां जीवन का आधार है. सुनहरे भविष्य का सपना अगर यहां किसी के ज़ेहन में कौंधता होगा तो उसकी तस्वीर क्या होती होगी यह जिज्ञासा मेरे भीतर जागती है. 

बदबू और गन्दगी से भरी इस बस्ती में ना तो ठीक से चलने की जगह है और ना ही शौचालय की कोई सुविधा. ऐसे में इन लोगों ने शौच के लिए नजदीक ही बिछी ट्रेन की पटरियों को ही विकल्प बना लिया है. दो वक़्त की रोटी के लिए रोज़ मेहनत करने वाले इन लोगों ने भूखे पेट सोना और गन्दे पानी को पी कर गुजरा करना सीख लिया है. शिक्षा के नाम पर बस्ती के मासूम बच्चों ने आँगनबाड़ी से बस राशन लाना ही सीखा है.

पूर्व प्रधान : शेर दिल
बस्ती के पूर्व प्रधान 50 वर्षी शेर दिल बताते हैं कि अक्सर भूखे और खाली पेट सो जाने वाले इन बस्ती के लोगों को साल भर होली के त्योहार का बेसब्री से इंतज़ार रहता है, क्योंकि होली के दौरान इनकी ढोलकों की ख़ूब बिक्री होती है. स्वाभाविक है कि साल भर काम की तलाश में भटकने वाले ये लोग होली से पहले क़ाफ़ी व्यस्त हो जाते हैं. ढोलकों की मांग के चलते ये लोग देश के सभी राज्यों में ढोलक बेचने के लिए निकल जाते हैं. पर दुःख इस बात का है कि इस कमाई से इनके कुछ महीनों के लिए दो वक़्त की रोटी का इन्तज़ाम तो हो जाता है, पर बाक़ी साल इनका ग़रीबी की चादर तले ही गुजरता है.

इसी बस्ती के 13 साल के राकेश ने बताया कि उसने दूसरी कक्षा तक पढ़ाई की है. लेकिन उसे क, ख, ग लिखना भी ठीक से नहीं आता, गणित में भी उसे चंद गिनतियों का ही ज्ञान है. राकेश के बताया कि वह स्कूल इसलिए जाता था कि आँगनबाड़ी से राशन ले आए और कुछ खाना खा सके. बस्ती के अधिकतर बच्चों का यही हाल है. ग़रीबी के चलते उनके माँ-बाप भी उन्हें काम पर भेज देते हैं. आज राकेश पढ़ाई छोड़, छोटे-मोटे काम करता है. जैसे शादी बारातों में लैम्प उठाना, चाय की दुकान पर जूठे बर्तन धोना आदि.

इक्कीसवीं सदी जगमगाहटों के बीच यह सब देखना हैरान कर देता है और निराश भी.

अमृत मिशन की योजना का क्या हुआ? घर-घर पानी के कनेक्शन देने के वादों का क्या हुआ? हाउसिंग फॉर ऑल योजना के चलते इन बस्ती वालों के लिए घरों का इंतज़ाम अब तक ​क्यों ना हो सका? शौचालय और शिक्षा जिन पर सबका अधिकार है, फिर इनके अधिकारों का क्या हुआ? इन लोगों का जीवन इस तरह क्यूँ बेहाल है? 

नेेताओं के वादे तो हज़ार हैं लेकिन उन्हें ज़मीन पर उतरते किसी ने नहीं देखा. यह बस्ती कथित तौर पर रेलवे की ज़मीन पर अवैध कब्ज़े से बनी है. इन लोगों को सुविधाएं देने के लिए आधिकारिक संस्थाएं इस बस्ती को अवैध निर्माण मान कर अपना पल्ला झाड़ देती हैं.  


ढोलक बस्ती के अधिकतर बच्चे अ​पनी ज़िंदगी के सबसे शुरूआती दिनों से ही अपना पेट पालने लगते हैं. कहीं आपको वे रेलवे फाटकों, शहर भर के चौराहों और दूसरी जगहों पर गाड़ीवानों, राहगीरों आदि से, अलग अलग क़रतब करते हुए भीख मांगते दिख जाएंगे, या फिर शहर भर का कूड़ा बीनते. ज़िंदगी शुरुआत से ही उन्हें उनका हुनर सिखा देगी है. ज्यों-ज्यों ये बड़े होते हैं और बड़ी ज़िम्मेदारियां इनके कंधों पर चढ़ बैठती हैं. ऐसे में ये ढोलक थाम लेते हैं और ढोलक इन्हें. इनके हुनर के हाथों कसी ये ढोलकें अक्सर हमारी ज़िंदगी में ख़ुशियों की सरगम से ताल मिलाती हैं, लेकिन ढोलक बस्ती से उठती तालों में इन ख़ुशियों की सरगम को देख पाना बेहद मुश्किल नज़र आता है.

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. 
देहरादून में एक पर्यावरण और सामाजिक क्षेत्र में 
काम करने वाली संस्था के साथ काम करती हैं.