सोशल मीडिया के जाल में

"..हम-आप इण्टरनेट में फँसे सुख से झूल रहे हैं। नेट को बन्धन न दिखने के लिए झूला बनना पड़ता है। इतने ढीले रहो कि व्यक्ति को जकड़न न जान पड़े। उसे हिलाओ-डुलाओ, उठाओ-गिराओ, गति का मद्धिम प्रबोध कराओ। वह प्रसन्न रहेगा। आँखें खुली रखकर भी चेतना बन्द झपकी लेने लगेगी और सम्भवतः सो भी जाए।.."
-डॉ स्कन्द शुक्ल



सर्वभोजी होने से सर्वदा पुष्टि नहीं मिलती।

जब होशियार भीड़ बहुत होगी , तो रास्ते खाली मिलेंगे।

आदमी अकेला है और सेलफ़ोन में गड़ा है। चूँकि वह गड़कर भी सबसे जुड़ा हुआ है , इसलिए वह पहले के लोगों से एकदम अलग है। पहले के मनुष्य गड़कर नहीं जुड़े होते थे। वे या तो गड़कर अकेले हो जाते थे और या फिर उखड़ कर संसार-भर के हो जाते थे। 

तकनीकी ने यह द्विवर्गीय विभेद भंग कर दिया। उसने पुरानी परिभाषाएँ मेट दीं। उसने हर व्यक्ति के अकेले रहने पर पहरा लगा दिया। यह सर्वथा विचित्र बात है। पहले पहरे अकेले रखने के लिए लगते थे। अब यह नया पहरा भीड़ में बनाये रखने के लिए लगाया जाता है। पहले का कारागार भी अन्धकारमय था, उसमें अलग-थलग रहकर आदमी सब से कट जाता था। आज का नया कारागार इतना प्रकाशवान् है कि जुड़े-जकड़े हुए व्यक्ति की आँखें चुँधिया जाती हैं। पहले विच्युति दण्ड थी, आज उसकी भूमिका संलग्नता निभा रही है। 

हम जुड़े हुए हैं। हम जोड़ दिये गये हैं। हमें एक बड़े जाल में फाँस लिया गया है। जाल को अँगरेज़ी में ‘नेट’ कहते हैं। उसमें 'इण्टर' उपसर्ग बन्धन-बोध कम करने के लिए लगाया गया है। ‘नेट’ की परतन्त्रता हर वस्तु-व्यक्ति के लिए एक ही है। लेकिन 'इण्टर' से उसे ढाँप देने से स्वेच्छा की चादर पड़ जाती है।

हम-आप इण्टरनेट में फँसे सुख से झूल रहे हैं। नेट को बन्धन न दिखने के लिए झूला बनना पड़ता है। इतने ढीले रहो कि व्यक्ति को जकड़न न जान पड़े। उसे हिलाओ-डुलाओ, उठाओ-गिराओ, गति का मद्धिम प्रबोध कराओ। वह प्रसन्न रहेगा। आँखें खुली रखकर भी चेतना बन्द झपकी लेने लगेगी और सम्भवतः सो भी जाए।

समाज से जुड़े रहने के लिए चेतना का न सोना परम आवश्यक शर्त है। इण्टरनेट में लोरी-थपकी का अजब इन्द्रजाल है : वह आँखें इतनी फाड़ देता है कि आदमी जागता रहता है, उसके भीतर बहुत-कुछ सुप्त हो जाता है। 

सोना और जगना साधारण क्रियाएँ-भर नहीं हैं। लोग आँखें बन्द करके तो सोते ही हैं, आँखें खोलकर सोने वालों की तादाद तकनीकी-युग में बहुत बढ़ी है। इसी तरह जागृति जगने और काम करने को तो कहा ही जाता है , लेकिन केवल इतनी मूल जैविक क्रियाओं-भर से जागरण नहीं माना जा सकता।

प्राचीन और मध्यकाल में लोग जितना बहिर्गमन करते थे, उससे कहीं अधिक उनका अन्तर्गमन होता था। वे जंगल में जाते थे और वहाँ पहुँच कर अपने ही भीतर पहुँच जाते थे।अब लोग बहिर्गमन बहुत करते हैं : पहले से अधिक, बेहतर और दूर-दूर तक। यह इतना बड़ा उद्यम हो चुका है कि अन्तर्गमन का समय ही अब नहीं मिलता। 

फिर यह बहिर्गमन भी अब पहले जैसा नहीं रहा। पहले बाहर जाना बाहर उठकर जाना होता था। वह प्रत्यक्ष था , उसमें अपने अच्छे-बुरे अनुभव थे। अब बहिर्गमन प्रत्यक्ष-परोक्ष दोनों होता है। फ़्रांस या मिस्र का अनुभव आपको दोनों प्रकार से , दो अलग-अलग रूपों में मिल सकता है। ख़तरे और जोख़िम पहले से कम हो गये हैं , लेकिन उनका प्रकार बदल भी गया है।

तकनीकी हर मनुष्य पर सूचना की अनवरत मूसलधार वृष्टि करती है। यह उसके सबसे महत्त्वपूर्ण गुणों में शामिल है। मशीन में उपजी गति प्रकृति से ही होड़ लगाने के लिए है। हर वह वस्तु जो प्राकृतिक है, उससे बेहतर मानवनिर्मित कैसे बनाया जाए। हर सर्जना, हर वर्जना में आदमी के हाथ में नियन्त्रण हो। हर सुघटना, हर दुर्घटना यों ही न हो : उसमें व्यक्ति की संस्तुति का समावेश हो। 

लेकिन हर मनुष्य एक-सा कहाँ है ? हर मनुष्य का चिन्तन और मनन एक समान कैसे हो सकते हैं ? अलग-अलग ध्येय , अलग-अलग धारणा। अलग-अलग साध्य , अलग-अलग साधन। अलग-अलग गतियाँ , अलग-अलग गन्तव्य। अलग-अलग मतियाँ, अलग-अलग मन्तव्य। 

तकनीकी विज्ञान की सक्षमा पुत्री है। यूनानी भाषा में ‘टेखने’ का अर्थ कला-हुनर ही होता है। लेकिन ऐसे भावप्रवण जन्म के बाद भी आज टेक्नोलॉजी सुनते ही लोगों के मन में एकदम किसी मशीन की कर्कश आवाज़ गूँजने लगती है। जो आज प्रसन्न हैं, वे मशीन के उपयोग से आनन्दित हैं। शोर को वे कानों में रुई डालकर झेल जाते हैं। लेकिन जो बेचैन हैं, वे किसी भी इन्द्रिय को बन्द करने और रखने के पक्षधर नहीं। वे मशीन से महज़ स्वार्थ नहीं लेना चाहते, वे उसे पूरा-का-पूरा ग्राह्य-अग्राह्य स्वरूप में झेलते हैं।

मशीनें आवाज़ करती हैं, क्योंकि वे यन्त्र हैं। उनका काम गतिमत्ता के साथ लक्ष्यों की प्राप्ति है। कुछ के लिए उनमें विद्रूप घर्षण है, कुछ अन्य के लिए सुरूप आकर्षण है। मशीनें अन्तिम पर त्वरित जाने की युक्ति हैं , वे समय को संरक्षित करने व्यक्तियों के लिए उत्पादों की भुक्ति हैं। 

मगर वे कौन लोग हैं जो मशीनों में मगन हैं ? वे कौन हैं जो रफ़्तार के लिए हर पल बेक़रार हैं ? कौन हैं वे जिन्हें जीवन का चरम पा सकने का भरम इतना गहरा भा रहा है ? किनको मंज़िल पर तुरन्त पहुँचना है , जिन्हें रास्ता बहुत बोझिल करता है ?
संसार में दो तरह के लोग हमेशा रहे हैं : मार्गप्रेमी और लक्ष्यप्रेमी। ये दो विभेद थे तो पहले भी , लेकिन पिछले कई सौ वर्षों में इधर इनमें एक बड़ा बदलाव हुआ है। मार्गप्रेमियों की जनसंख्या किसी विलुप्त होती जीव-प्रजाति सरीखी हो गयी है और लक्ष्यप्रेमी बहुत-बहुत बढ़ गये हैं। तकनीकी-मशीन-विज्ञान के जिस स्वरूप के खिलाफ़ विरोध और कभी-कभी विलाप सुनायी देता है , वह इसी लक्ष्यप्रेमिता के कारण है।

विज्ञान में ‘वि’ उपसर्ग है , विक्रय में भी है। क्रय में ‘वि’ लगने से उसका अर्थ पलट जाता है। क्रय खरीदने को कहते हैं , विक्रय बेचना हो जाता है। ज्ञान में ‘वि’ लगने से उसका अर्थ पलटना नहीं चाहिए , लेकिन पलट रहा है। लोग विज्ञान पढ़कर भी अज्ञानी हो रहे हैं। उन्होंने विज्ञान की तमाम सूचनाओं को शब्द-समूह-सा रट लिया है , उसका मूल तत्त्व लेना ही भूल गये। 
रास्ता सफ़र का मंज़िल से छोटा सच नहीं है ; उसके होने से ही मंज़िल तक का सफ़र पूरा जान पड़ता है। लेकिन जब सूचनाओं की बाढ़ हो , और हर व्यक्ति उसमें ऊपर-नीचे हो रहा हो , तो जान का भय और बढ़ जाता है। 

इसके लिए आपसे एक सवाल पूछता हूँ। डूबने का भय अकेले अधिक होता है कि समूह में ? मान लीजिए : किसी विशाल जलराशि में एक आदमी अकेला डूब-उतरा रहा है। और किसी दूसरी में ढेर सारे लोग। किसमें जल-भय के कारण प्राण अधिक संकट में हैं ? पहले-पहल सोचने पर अकेले मनुष्य में निस्सहायता का बोध अधिक लगता है , लेकिन अकेलापन उसे हाथ-पैर चलाने का अवसर भी प्रदान करता है। वह पानी से लड़ता है , उसके सामने भ्रमपूर्वक समर्पण नहीं करता। लेकिन समूह में आलम्ब का छद्म प्रबोध है। और लोग भी तो हैं , किसी को पकड़ लेंगे। हम ही कौन से यहाँ अकेले हैं ? इसी और-और के चक्कर में सब-एक दूसरे को पकड़ लेते हैं और सामूहिक जलसमाधि लग जाती है।

विज्ञान की विशिष्टता मनुष्यों को सूचनाएँ चुभाने-भर में नहीं है। सूचनाएँ लगातार चुभ रही हैं , चुभायी जा रही हैं। लोग इस क़दर उन्हें सह रहे हैं कि उनके आदी हो चले हैं। उन्हें अब आत्मकष्ट नहीं होता , न परपीड़ा उन्हें विचलित करती है। रक्त की लालिमा आँखों में इतनी बस चुकी है कि भय जम गया है। लोग भयभीत नहीं हैं , भय से उनका ध्यान हटाने के लिए भी कई तरीक़े तलाश लिये गये हैं। 

विज्ञान का वस्तुनिष्ठ मूल्य अधिक है अथवा समाजनिष्ठ ? तकनीकी और मशीन आदमी के लिए किस तरह हैं और समूह के लिए किस तरह ? नयी-नयी सूचनाओं को लेकर उनसे कैसे चुभते रहा जाए , लेकिन आहों का लोप न हो ? कैसे यह हो कि लालिमा और चौंध बारी-बारी से आती-जाती रहें , लेकिन पुरानी का प्रभाव बिसरे नहीं ?

तकनीकी से मिलने वाली हर सूचना से उसका स्रोत और उसके सामाजिक अनुदान को न भूलना ही विज्ञान के पठन-पाठन के सबसे महत्त्वपूर्ण विन्दु हैं। स्रोत का महत्त्व यों तो हर सूचना में है , लेकिन विज्ञान-सम्बन्धी जानकारी में उसकी भूमिका और बढ़ जाती है। लोग चाहे-अनचाहे विज्ञान का लोहा मानने लगे हैं। उसकी शैली और हवाले से कही हर बात ढेरों लोगों को समसामयिक और तार्किक जान पड़ती है। यह सच ही होगा , क्योंकि विज्ञान ऐसा कहता है। इस बात में जान है , यह विज्ञान का मत जो है। 

लेकिन विज्ञान की हर बात का स्रोत अतिशय महत्त्व का है। वह बात कह कौन रहा है ? किस हवाले से कह रहा है ? उसकी योग्यता क्या है ? उसकी बात में तर्क कितना है और तथ्य कितना ? क्या उसका कथन उसकी व्यक्तिगत अनुभूति-भर तो नहीं है ?

विज्ञान की जानकारियाँ सर्वजन के लिए उपलब्ध हैं। विज्ञान के किसी प्रयोग के नतीजे किसी प्रकार की आन्तरिक अर्हता की अलग से माँग नहीं करते। मात्र ज्ञानेन्द्रियों और बुद्धि के दुरुस्त होने-भर से काम चल जाता है। आप , मैं या कोई भी इन प्रयोगों को कर सकता है और नतीजों की सच्चाई स्वयं जाँच सकता है। लेकिन हर प्रयोग को स्वयं कर पाना सम्भव हो नहीं पाता। सो वैज्ञानिकों की घोषणाओं पर विश्वास करना पड़ता है। लेकिन एक वैज्ञानिक की जाँच के लिए दूसरा वैज्ञानिक है और दूसरे के लिए तीसरा। विज्ञान किसी एक व्यक्ति की विचारधारा का अन्धहितैषी नहीं है। वह केवल यथासम्भव निरपेक्ष सत्य का पक्षधर है। वह श्रद्धालु नहीं है , वह शंकालु है। 

श्रद्धा और शंका दोनों गड़ने में अभ्यस्त हैं। दोनों तालव्य 'श्' से आरम्भ होती हैं : दोनों में श्श्श्श-युक्त शमन-भाव निहित है। लेकिन श्रद्धा जहाँ एक ओर प्रश्नों और प्रयोगों को शमित करती है , वहीं शंका हर प्रश्न और प्रयोग के मूल को सिंचित करती है। श्रद्धा-शंका दोनों मौनवासिनियाँ हैं। लेकिन पहली के चेहरे पर आने से जहाँ सुखद शान्ति का वातावरण बन जाता है , वहीं शंका के पनपने पर चेहरे पर उद्विग्नता की तरंगें उठने लगती हैं। 

यह शान्ति आपत्तिजनक है , यह सुख भयकारी है। यह इस बात को मानकर चलना है कि जितना जाना जा सकता है , वह जाना जा चुका है अथवा और जानना अब किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। सो हर बार वैज्ञानिक असफलता में वह प्राचीनता का उल्लास मनाता है , पुरातनी उत्सव की उसे पुष्टि जान-मानकर खिल उठता है। और ऐसा करने वाले केवल आमजन नहीं , बहुत-से वैज्ञानिक भी हैं।

वैज्ञानिक होने और विज्ञानी होने में वैसे ही भेद है , जैसे संगीतकार और संगीतिमय होने में। ‘कार’ करता है और करने के बाद ‘मय’ नहीं रहता , उससे अलग हो जाता है। अलग होने के बाद वह साधारण है। जब तक वह गा रहा था , वह सुर में था। अब वह सामान्य मनुष्य है , इसलिए अब वह बेसुरा है। अब उसे गला साध कर स्वर नहीं निकालने , अब उसे आरोह-अवरोह , लय-ताल का ध्यान नहीं रखना। 

मगर संगीतिमय व्यक्ति संगीतकारिता-भर नहीं करता , वह संगीत में सदा-सर्वदा आप्लावित रहता है। वह संगीत ही खाता है , संगीत ही पीता है। संगीत के निर्देश पर चलता है , संगीत के इशारों पर सोता है। उसके लिए गाना सायास कर्म नहीं है , अनायास मर्म है।

वैज्ञानिक भी विज्ञानी हो , कोई आवश्यक नहीं। वह बहुत बड़ी खोज करने के बाद भी श्रद्धालु बना रह सकता है , शंकालुता को हाशिये पर धरे। बड़ी वैज्ञानिक खोज बड़ी विज्ञानी चेतना से एकदम अलग बात है। उसमें उस वैज्ञानिक व्यक्ति की निजता का समावेश है : वह मान्यता या विश्वास जो उसे लगता आया है। किसी प्रयोग से वह उसे सिद्ध नहीं कर सकेगा। 

लेकिन विज्ञान की बड़ी खोज आपको विज्ञानमूर्ति बना देती है , जिस तरह बड़ा कवि और संगीतकार स्वयं कवितामूर्ति या संगीतमूर्ति कहलाने लगता है। यह मूर्तिरूपेण प्रतिष्ठ होना ही विज्ञान में भक्ति की घुसपैठ है , जो उसे कमज़ोर करती है। यह वह क्षण है , जब किसी बड़े बहुमान्य वैज्ञानिक के चारों ओर एक कल्ट बन जाता है और उसकी आस्थाओं-मान्यताओं-अन्धविश्वासों को विज्ञान की धारा में ठेल कर बहा दिया जाता है। आप भगवान् को नहीं मानते ! अरे न्यूटन मानते थे , आइंस्टीन मानते थे !

वैज्ञानिक का विज्ञानमूर्ति बनना विज्ञान के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। कोई न्यूटन , कोई आइंस्टीन विज्ञान से बड़ा नहीं। विज्ञान की निष्पक्ष दृष्टि में उनका महत्त्व बहुत अदना है। हाँ , वे जिस खोज-आविष्कार के लिए जाने जाते हैं , वह बहुत प्रासंगिक और उपयोगी है। 

तकनीकी के माध्यम से विज्ञान की बातें जन-जन तक पहुँच पा रही हैं , लेकिन विज्ञान को तथ्यात्मक रूप से पढ़कर भी हम समाज में कोई चेतना पैदा नहीं कर पाएँगे। विज्ञान तथ्य नहीं है , उसके पीछे का चिन्तन और मार्ग है। विज्ञान मन्तव्य-गन्तव्य की तरह पढ़ा-पढ़ाया जाता है , लेकिन उसे मनन-गमन की तरह जानना-समझना होगा। 

'प्रयोग जो सफल हुए और कुछ दे गये' से अधिक आवश्यक है यह जानना कि प्रयोग जो असफल हुए , उनमें चूक कहाँ हुई। प्रयोग की संरचना और उनकी विफलता में जो विज्ञान है , वह लगभग कहीं न तो पढ़ाया जाता है और न उसकी चर्चा होती है।
विज्ञान से प्राप्ति को जानना उसके उत्पादीकरण और पाठक के उपभोक्ताकरण के सबसे बड़े कारणों में से एक है। आप वह पढ़ें जो ढूँढ़ा गया , जिसने ढूँढ़ा और हद-से-हद जैसे ढूँढ़ा। बस , उसके बारे में न जानें जो ढूँढ़ में नष्ट हुआ और असफलता ओढ़कर गुमनामी में ओझल हो गया। मुट्ठी-भर वैज्ञानिक हैं , गिनती के उनके आविष्कार हैं। फिर उन आविष्कारों के पेटेंट हैं , फिर उन पेटेंटों के पीछे खड़ा उद्योग है। यही विज्ञान का बाज़ार की रैम्प पर कैटवॉक है , जिसे देखकर विद्यार्थी-आमजन स्तब्ध-मुग्ध हुए जाते हैं।

विज्ञान के मार्ग को समझना और उस पर बार-बार विचरना , वापस हमें मार्गप्रेमी बना देता है। वस्तुतः हमें विज्ञान के और उस विज्ञान से संसार के भले के लिए मार्गप्रेमी बन ही जाना चाहिए। मार्ग में नाना प्रयोग हैं, उन प्रयोगों में विषमताएँ-कठिनाइयाँ हैं। लेकिन उन्हें समझना ही वास्तविक विज्ञानी होने की अति आवश्यक शर्त है। प्रयोग में निष्पक्षता है , उसी में तर्क का शुद्ध परीक्षण है।

सोशल मीडिया तकनीकी का नवीनतम चेहरा है। अन्य तमाम तथ्यों के साथ इस पर विज्ञान भी अपने तथ्यों के साथ प्रकट है। धर्म है , राजनीति है , अर्थ है , मनोरंजन है , वहीं बगल में विज्ञान भी है। विज्ञान का लेख जिसमें एक अजीब सी सम्भ्रान्त अस्पृश्यता है। वह इस ढंग से प्रस्तुत किया जाता है या होता है कि ढेरों उसके ख़ौफ़ से ही किनारे हो लेते हैं। दूर हटो , अरे यह तो साइंस है। हम तो साइंस के स्टूडेंट नहीं रहे , हमारे तो शुरू से इसमें नम्बर कम आते थे। और वह गणित ! उसका तो आतंक था !

भारत में अधिसंख्य लोग अभी तरुण हैं और उनमें से बहुतेरे सोशल मीडिया का किसी-न-किसी रूप में प्रयोग कर रहे हैं। समस्त संसार से जोड़ने और तमाम जानकारियों को उपलब्ध कराने के अलावा सोशल मीडिया कई स्तरों पर अपने प्रतिकूल प्रभाव भी व्यक्ति पर डालता है। ऐसे में तरुण-उत्तरदायित्व और बढ़ जाता है कि इतने सफल और सक्षम साधन का उपयोग सही ढंग से कैसे किया जाए। 

सोशल मीडिया का पहला खतरा अनजाँची-अनपरखी जानकारियों से सामना होना है। हर व्यक्ति को मिला अधिकार हर व्यक्ति में बराबर कर्तव्य का बोध नहीं लाता। नतीजन लोग बिना जाँचे-परखे जानकारियाँ ग्रहण करते और बाँटते हैं। कई बार इस छद्म-ज्ञान-शृंखला को शुरू करने वाला व्यक्ति जानबूझ कर ऐसा करता है। वह लोगों की मनःस्थिति समझता है कि वे किस तरह से बिना किसी गहराई तक जाए , बातों को बाँटना शुरू कर देते हैं। इण्टरनेटीय तीव्रता ही इस अधकचरे ज्ञान के प्रसार-कार्य में बहुत मददगार सिद्ध होती है। एक हवा-सी चलती है और उसकी उड़ायी धूल हज़ारों-हज़ारों लोगों की आँखों पर पर्दा डाल देती है। सोशल मीडिया मौलिक चिन्तन में कई बार बाधक बनता है , भीड़ का प्रभाव ऐसा होता है कि लोग बयार की दिशा में बहने लगते हैं।

दूसरा भय मानसिक असुरक्षा का है। आज हम आत्मसम्मोह के सबसे विकट दौर से गुज़र रहे हैं। अपनी प्रशंसा के लिए आतुर व्यक्ति हर वह काम कर रहा है जिससे वह दूसरों का ध्यान आकर्षित कर सके। डीपी नित्य तेज़ी से बदली जा रही हैं , ध्यानखींचू स्टेटस डाले जा रहे हैं और कई बार अकारण ही वाद-विवाद पैदा किये जा रहे हैं। फ़ेसबुकीय लाइक और कमेंट ही इच्छा ही यश की कामना बन कर रह गयी है : तुरन्त कुछ लिखो और लोगों की प्रतिक्रया से उत्फुल्लित-आनन्दित हो जाओ। वे तुम्हारी फ़ोटो-लिखाई लाइक करें , तुम उनकी करो। परस्पर प्रशंसा में आनन्द का कैसा अतिरेक है !

लेकिन मन तब टूटता है जब ध्यान नहीं खिंचता दूसरों का। सकारात्मक के स्थान पर निष्क्रियता मिलती है अथवा नकारात्मक 
प्रतिक्रिया। ऐसे में मन में निराशा का जन्म होता है जो कई बार खिन्नता और फिर कुण्ठा में बदल जाती है। कुछ लोगों में तो यह ऐसा भयावह रूप ले लेती है कि जीवन की दिशा ही भ्रष्ट कर अन्धकारमय कर डालती है। 

सोशल मीडिया का व्यक्ति-परिचय परोक्ष है। मित्रताएँ चटपट होती हैं , जल्दी-जल्दी वे परवान भी चढ़ती हैं। लेकिन प्रत्यक्षता के मन्थर मन-जुड़ाव के अपने लाभ होते हैं। आप किसी को जब बार-बार मिलकर जानते हैं , तो व्यक्तित्व की समझ सच्ची और बेहतर हो पाती है। कम्प्यूटर या सेलफ़ोन की स्क्रीन सामने वाले व्यक्ति की सत्यता नहीं बताती : कई बार लोग छद्म पहचान और मनोभाव लेकर सामने वाले को ठगते चले जाते हैं।

सोशल मीडिया के इन्हीं प्रभावों ने कई लोगों में अवसाद , तनाव और अनिद्रा के लक्षण पैदा किये हैं। नित्य सेल्फ़ी खींचने और लगाने की प्रवृत्ति को अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एसोसिएशन रोग की श्रेणी में ले आया है। यह एक क़िस्म के प्रबल हानिकारक सम्मोहन का प्रकार है जिसे अँगरेज़ी में नार्सिसिज़्म कहा जाता है। घण्टों झुके ध्यानमग्न रहने से शरीर के स्तर पर भी सिर , गर्दन व पीठ में दर्द आम बात हो गये हैं। भूख पर प्रभाव पड़ा है , व्यक्तिगत रख-रखाव पर भी। परिवार बिखरे हैं , नौकरियाँ छूट गयी हैं।

सामूहिक मेष-चिन्तन और उस पर भी इतना आत्मसम्मोहन ! भीड़भरी भेड़-चाल और तिस पर इतना नार्सिसिज़्म ! सामाजिक मीडिया यही विरोधाभास पैदा कर रहा है ! हम शोध नहीं करते , किन्तु मकरन्द का आसव चाहते हैं। हम रोध नहीं करते , लेकिन पर्वत-सी उत्तुंगता चाहते हैं। हम बोध नहीं करते , लेकिन बुद्ध-सा आभामण्डल-प्रतिभास चाहते हैं। 

सोशल मीडिया ने एक असुरक्षा का माहौल भी चारों ओर बनाया है। लोगों में इसकी लत लगी है , लेकिन वे असहाय भी महसूस करने लगे हैं। यह एक ऐसा सम्बन्ध है जिसमें एक ढेरों लोग एक अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा की वर्चुअल दुनिया में नित्य जी रहे हैं। वे कम्प्यूटर के उस आभासी संसार से पीड़ित-प्रताड़ित हैं , लेकिन चाहकर भी उससे अलग नहीं हो सकते। वे ईर्ष्या से भरे एक-दूसरे के प्रस्तुत बिम्बों से आगे निकलने की होड़ में मरे जाते हैं। यह एक तरह से दोहरा जीवनयापन है : वास्तविक संसार और आभासी संसार , दोनों में।

विषमता प्राकृतिक है , कुदरत नहीं चाहती कि उसकी हर सन्तान एक-जैसी हो। न उसने जलवायु एक-सी बनायी , न वातावरण। न उसने तापमान एक-सा रखा और न ऋतुएँ। विभिन्नताओं के साथ जीवन आगे बढ़े , यही उसकी इच्छा रही है। लेकिन विषमताओं को मिटाकर एकनिष्ठ-एकात्म सोच पैदा करना शासक वर्ग की चाहत है। वही शासक-वर्ग जो उसी प्रकृति से निकला है और अब उसकी कोख छोड़कर उसके सिर पर जा चढ़ा है। 

शासक से आशय निवर्तमान के साथ अतीत के लोगों से भी है। वे जो अब धर्म की परिभाषाओं में प्रवेश कर गये हैं , वे अब भी जनता के मन को संचालित करते हैं। पुराने शासक , नये शासक --- दोनों मिलकर जनसंख्या की मनःस्थिति को अपने अनुसार ढालते-मोड़ते हैं। यही चरवाहे और भेड़ों का रिश्ता है। आदिकाल से न चरवाहा मिटा है , न भेड़। पुराने चरवाहों की जगह नये चरवाहे लेते जाते हैं , पुरानी भेड़ों की जगह नयी भेड़ें। सोशल मीडिया बस उसी पुराने मेष-कर्म के लिए नयी कम्प्यूटरी हुलकार-पुकार है। और भेड़ें सोचती हैं कि वे चारगाह की हरियाली को अपनी इच्छा से जब-तब , जहाँ-तहाँ चर रही हैं।

फिर विज्ञान को बाज़ार की गोद में बैठा शिशु क़रार दे दिया जाता है। प्राचीन मनीषियों के नामों के उदाहरण दिये जाते हैं , आधुनिकों को उनके आगे ज्ञान-क्षेत्र में हेय बताया जाता है। तीन हज़ार वर्ष पहले संसार ऐसा था , दो हज़ार वर्ष पहले ऐसा और हज़ार वर्ष पहले ऐसा। कई अति-उत्साही तो लाखों-करोड़ों वर्षों पहले भी पहुँचकर अपनी श्रद्धा का बिरवा रोप देते हैं। 
विज्ञान बाज़ार की गोद में नहीं बैठा , हर प्राचीन-नवीन ज्ञान उसके अंक में सायास बिठाया गया। ज्ञान और उनके ज्ञानियों में यह बड़ा दोष-दुर्भाग्य रहा है : वे राजाश्रयी-अर्थाश्रयी होकर पनपते रहे हैं। यह उनका दोष इसलिए है क्योंकि वे अन्य लोगों की तरह ही मानवीय प्रलोभनों से मुक्त नहीं हैं। यह उनका दुर्भाग्य इसलिए है , क्योंकि आज के विज्ञान में बिना अर्थ-अनुष्ठान के गति सम्भव नहीं है।

न्यूटन ने उपवन में सेब का पात देखा था : यन्त्रों की भूमिका उनकी आँखों और मस्तिष्क ने निभायी। लेकिन आज का वैज्ञानिक आँखों और मस्तिष्क-भर से सत्य तक नहीं पहुँच सकता। सृष्टि के तमाम रहस्य जो अब मानवेन्द्रियों से परे हैं , उनके लिए तरह-तरह के उपकरण चाहिए। और जहाँ उपकरण का आगमन है , वहाँ उसे लेकर उद्योग आता है। वह कहता है कि उपकरण मैं आपको दूँगा , बस आप अपने निष्कर्ष का लाभ मुझे लेने दीजिएगा। यहीं से विज्ञान और व्यापार एक सम्बन्ध-सूत्र में बँध जाते हैं।

इन्द्रियातीत खोजों को करने और पढ़ने वालों , दोनों को अपनी इन्द्रियाँ सुप्त नहीं करनीं। वैज्ञानिक और विज्ञान-भोक्ता को विज्ञानसम्मत बने रहना है। हर विचार , हर तथ्य को कसौटी पर कसने का प्रयास करना है। अफ़वाहों और कोरी गप्पों में बहना नहीं है , चाहे वे कितनी ही आकर्षक क्यों न हों ! विज्ञान आकर्षण के पक्ष में नहीं , सत्य के पक्ष में हाथ उठाता है। और सत्य बहुधा आकर्षण से कम ही सुरूप और काम्य होता है। 

सामाजिक मीडिया एक बयार है जो कई बार अन्धड़ का रूप ले लेती है। इसपर सक्रिय जन परोक्ष ही सही , एक भीड़ में बदल जाते हैं। भीड़ में बहुत अधिक कार्य-ऊर्जा तो होती है , पर विचार-ऊर्जा नहीं होती। ऐसे में हर व्यक्ति को अपनी मौलिकता और स्वायत्तता सोच के स्तर पर बनाये रखनी है।

मौलिक और स्वायत्त चिन्तन बहुधा प्रश्नों के उत्तरों को हाँ-न में नहीं तलाशता। संसार के अधिकांश उत्तरों में सिर सहमति-असहमति में घूमता भी नहीं। विस्तार का भार पाने के बाद बहुधा गर्दन स्थिर-की-स्थिर रह जाती है , मुँह से कोई त्वरित जवाब नहीं फूटता।

उत्तर देने में यह धैर्यपूर्ण विलम्ब ही विज्ञान में रास्ते में बिताया गया समय है। जो जितना विज्ञानी होकर जिएगा , वह उतना थिर जाएगा। जो जितना थिर जाएगा , उतना वह आत्ममुग्ध हुए बिना सामाजिक सरोकार की बात करेगा। जो सामजिक सरोकार का पक्षधर होगा , वह व्यापार पर पैनी समीक्षक दृष्टि रखेगा। और जो इतना कुछ कर लेगा , वह विज्ञानी अन्ततः कलामय हो जाएगा। 

कला यत्र-तत्र निर्बाध बहा करती है , लेकिन व्यापारी की हर नौका , हर पोत , हर पुल की मंशा को समझती उसे अनुशासित करती है। लाभ के जलमार्ग-थलमार्ग बना करते हैं , क्योंकि नदी ऐसा चाहती है। और जब वह नहीं चाहती तो हर यात्रा-यात्री का अपने मुनाफ़े के साथ उसकी गोद में प्राणान्त हो जाता है।

विज्ञान का पाठ सर्प की तरह उसे लीलकर सुख की झपकी लेना नहीं है। वह उस गाय की तरह कुश-चर्वण है , जो उसे बार-बार मुँह में पेट से वापस लेकर जुगाली करती है। अचिन्तक के लिए विज्ञान उसी में पलता विष है , चिन्तक के लिए गाढ़ा सर्वहितकारी पौष्टिक दूध।

( प्रस्तुत लेख स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक सोशल मीडिया की राजनीति में छपा है।)