कैंसर ने सिखाई सेहत और रिश्तों की कद्रः मनीषा कोइराला

".. इस धरती पर हम बहुत कम समय के लिए आए हैं। इसलिए जो कुछ भी हमारे पास है, हमें उसकी कद्र करनी चाहिए। हम अपने और दूसरों के लिए जो भी अच्छा कर सकते हैं, वह जरूर करें। हम सब लोग आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। दूसरों का भला करके हम असल में अपना ही भला कर रहे होते हैं। अब मैंने अपनी ज़िंदगी, अपनी सेहत, अपने समय और अपने रिश्तों पर ध्यान देना व उनका सम्मान करना शुरू कर दिया है। अब मैं छोटी-छोटी बातों पर दुखी नहीं होती। कुदरत का भी भरपूर मजा लेती हूं।.."  
-मनीषा कोइराला  



कभी जिस 'लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे खिलता गुलाब'... आज वही 'लड़की' मनीषा कोइराला (48 साल) कैंसर जैसी बीमारी को मात देकर ज्यादा बिंदास अंदाज से ज़िंदगी जी रही है। लेकिन इस बिंदासपने में ज़िंदगी के लिए लापरवाही नहीं, उसकी कद्र है। चेहरे पर आ गई चंद झुर्रियों को छिपाने में वह अब वह यकीन नहीं रखती। बॉलीवुड की कामयाब हिरोइनों में शुमार मनीषा को सन 2012 में ओवेरियन कैंसर का पता चला था। 6 महीने तक लगातार संघर्ष और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर मनीषा ने कैंसर से जिंदगी की जंग जीत ली। इसी जंग के बारे में वरिष्ठ पत्रकार राजेश मित्तल ने मनीषा कोइराला से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में बात की। पेश हैं बातचीत के खास हिस्से:
Q. यह वाली बीमारी हो जाए तो इससे निपटने का सही तरीका क्या है?

A. कैंसर हो या कोई दूसरी बीमारी, जरूरी है कि इसके बारे में आप खुद सब कुछ जानें। मैंने ऐसा ही किया था। मुझे आखिरी स्टेज का कैंसर था। जानती थी कि सर्जरी के दौरान मेरी मौत भी हो सकती है, लेकिन मैंने सोचा कि मरना तो है ही, कोशिश करने में क्या हर्ज है। गूगल की मदद से इसकी सर्जरी के बेस्ट डाॅक्टर की खोज की। इस बीमारी के बारे में ढेर सारे लेख पढ़े। मुझे इसका बहुत फायदा मिला। अपने इलाज के बारे में सही फैसले ले पाई। जब डाॅक्टर अपना काम कर चुके होते हैं तो फिर खुद आपको अपने लिए काम करना पड़ता है। इस दौरान दिमागी संतुलन बनाए रखें। खुद की सेहत सुधारने के लिए जो भी कोशिश कर सकते हैं, वह करें। सबसे अहम बात है खुद में हौसला बनाए रखना और डाॅक्टर की हर बात पर अमल करना। बीमारी हो जाए तो हमें यह कबूल करना चाहिए कि हमारी ज़िंदगी में कुछ असंतुलन था, जिसे ठीक करने के लिए यह बीमारी आई है। अब अपनी उस गलती को मुझे दुरुस्त करना है।

Q. कैंसर सही वक्त पर पता चल जाए, इसके लिए क्या-क्या करना चाहिए?

A. शरीर में कुछ गड़बड़ महसूस हो तो उसी वक्त चेकअप करा लेना चाहिए। मसलन, ओवेरियन कैंसर में पेट फूलने लगता है, पेशाब बार-बार आता है, कब्ज हो जाती है। ये छोटे-छोटे सिग्नल होते हैं। हम इन्हें नजरअंदाज करते रहते हैं और आखिरी स्टेज में जाकर कैंसर का पता चलता है। तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

Q. ऐसा कहा जाता है कि बहुत-से कैंसर मरीज और उनके परिवार वाले नैचुरोपथी, होम्योपथी, आयुर्वेद, योग आदि के चक्कर में अपना बेशकीमती वक्त और पैसा बर्बाद कर देते हैं, हासिल कुछ नहीं होता?

A. मेरा मानना यह है कि कोई बड़ी बीमारी हो जाए तो खाली इनके भरोसे न रहा जाए। मेनस्ट्रीम के डॉक्टर के पास ही जाना चाहिए, लेकिन हमारा सदियों पुराना ज्ञान भी काफी कारगर है। संतुलित नजरिया यह है कि मुख्य इलाज मॉडर्न मेडिसिन का हो और साथ में इनका सहारा ले लिया जाए। ऐसे में सेहत में सुधार बड़ी तेजी से होता है। यह बात मैं अपने अनुभव से कह रही हूं। बीमारी न हो, इसके लिए योग, नैचुरोपथी, आयुर्वेद में बताई गई बातें बेहद काम की हैं। इन्हीं बातों के आधार पर अब मैंने हेल्दी लाइफस्टाइल को अपनाया है।

Q. इस हेल्दी लाइफस्टाइल के बारे में बताएंगी?

A. सबको मालूम ही है कि हेल्दी लाइफस्टाइल क्या है। इसलिए जानना ही काफी नहीं, उसे अपनी ज़िदगी में संकल्प के साथ अपनाना ज्यादा अहम है। साथ ही तंदुरुस्त रहना है तो इंसान की कुछ रचनात्मक अभिव्यक्ति जरूर होनी चाहिए। जैसे आप लेखक हैं तो जिस दिन आप लिखना बंद कर देंगे तो लगेगा कि दिन बर्बाद जा रहे हैं। कुल मिलाकर हमें ऐसी आदतें, ऐसी रुटीन अपनानी चाहिए कि तन-मन दोनों दुरुस्त रहें।

Q. अपनी रुटीन के बारे में बताएं कि आप खाती-पीती क्या हैं, कौन-सी एक्सरसाइज करती हैं, कितनी नींद लेती हैं?

A. रात को 9-10 बजे तक सोती हूं। सुबह 5, सवा 5 बजे तक उठ जाती हूं। सबसे पहले गर्म पानी पीती हूं। कुछ देर बाद ग्रीन टी। फिर 2 घंटे के लिए फिजिकल ट्रेनिंग पर चली जाती हूं। इससे पहले गुड़-चना या केले जैसा कोई एक फल लेती हूं। ट्रेनिंग से वापस आकर 15 से 30 मिनट तक प्राणायाम करती हूं। सूर्यभेदी और चंद्रभेदी प्राणायाम के 21-21 सेट, फिर नाड़ीशोधन और प्लावनी प्राणायाम। इसके बाद मेडिटेशन। मेडिटेशन से मुझे अपनी सोच को सही दिशा देने में मदद मिलती है। फिर नाश्ता। दिन भर में दूध की चाय दो कप लेती हूं। अॉर्गेनिक फूड खाती हूं। मेरा 90 फीसदी खाना वेजिटेरियन होता है। रोज़ 15 किलोमीटर चलती हूं। 

Q. आप इतना सब कर कैसे लेती हैं? क्या आपको आलस नहीं घेरता- रजाई में पड़े रहो, वॉक को छोड़ो? बेस्वाद ग्रीन टी कोई कब तक झेले? सेहत के लिए जो अच्छा है, वो मन को नहीं भाता और जो मन को भाता है, वह सेहत के लिए खराब है। मन से ऐसे संघर्ष आप भी करती होंगी? कैसे निपटती हैं?

A. आलस ज्यादा हो तो बाद में आपका अफसोस करना तय है। वजह यह कि देर-सवेर शरीर और मन को बीमारियां घेर लेंगी। खुद को रिलैक्स करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है अनुशासन में रहना भी। मैं दोनों संतुलन बनाने में यकीन करती हूं। इसमें मेरी संकल्प शक्ति मददगार बनती है। साथ ही साथ मैं अपने साथ बहुत ज्यादा सख्ती बरतने के हक में भी नहीं हूं। मैंने खुद को किसी सख्त नियम से बांधा नहीं है। बीच में कई दिन तक मेरा मेडिटेशन छूट जाता है। दोबारा शुरू कर देती हूं। कभी 15 मिनट ही करती हूं और कभी 1-1 घंटे तक भी। कभी-कभी नहीं भी कर पाती। महीने में 4-5 दिन मेडिटेशन मिस हो ही जाता है। ऐसे ही वॉकिंग में 15 किलोमीटर रोज का टारगेट रखती हूं। कभी कम हो पाता है, कभी ज्यादा। कभी नहीं भी। असल में हम अपने टारगेट का 80 फीसदी भी कर लें तो काफी है। 

Q. कैंसर ने आपको कौन-से 5 बड़े सबक सिखाए?

A. कैंसर ने मुझे बेहतर इंसान बनने में मदद की है। इसने मुझे सिखाया किः

  1. मौत एक सचाई है। समय आता है तो सभी को जाना ही पड़ता है, लेकिन कैंसर सजा-ए-मौत नहीं है। इसलिए हिम्मत रखें और अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश जरूर करें।
  2. जब भी ज़िंदगी में कोई बड़ी समस्या आती है तो डर जाना स्वाभाविक है, लेकिन उस डर से लड़ना बड़ी बात होती है। हमें उसे चैलेंज के तौर पर देखना चाहिए और पूरी जिंदादिली से अपने डर पर जीत हासिल करनी चाहिए। अपने मन को ठीक रखना बेहद जरूरी है। मन अगर दुखी हो, टेंशन में रहे तो उसका असर शरीर पर जरूर आता है।
  3. इस धरती पर हम बहुत कम समय के लिए आए हैं। इसलिए जो कुछ भी हमारे पास है, हमें उसकी कद्र करनी चाहिए। हम अपने और दूसरों के लिए जो भी अच्छा कर सकते हैं, वह जरूर करें। हम सब लोग आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। दूसरों का भला करके हम असल में अपना ही भला कर रहे होते हैं। अब मैंने अपनी ज़िंदगी, अपनी सेहत, अपने समय और अपने रिश्तों पर ध्यान देना व उनका सम्मान करना शुरू कर दिया है। अब मैं छोटी-छोटी बातों पर दुखी नहीं होती। कुदरत का भी भरपूर मजा लेती हूं। 
  4. सुख हो या दुख, ज़िंदगी के हर पहलू का लुत्फ हमें उठाना चाहिए। दरअसल ज़िंदगी फूलों की सेज नहीं होती। हर किसी की ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि आज बुरा वक्त है तो कल अच्छा वक्त भी आएगा। यह बुरा वक्त कुछ जरूरी सबक सिखाने आया है। ज़िंदगी में हमें लगातार सीखते रहना चाहिए।
  5. सबसे पहले हमें खुद को प्यार करना चाहिए, अपना ध्यान रखना चाहिए। हम तंदुरुस्त होंगे, तभी अपने परिवार की भी देखभाल कर पाएंगे। अपनी सेहत की जिम्मेदारी हमें खुद लेनी होगी। हमें सबसे पहले खुदगर्ज़ होना चाहिए। इसके लिए शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं। मैंने अब दूसरों की अपेक्षाओं और सपनों को पूरा करने के लिए अपनी अरमानों को कुचलना बंद कर दिया है। अब मैं वही सब करती हूं जो मेरी आत्मा को संतुष्ट करता है। दूसरों के सामने खुद को साबित करने की जरूरत नहीं रही। अब मैं अपनी मर्जी की ज़िंदगी जीने के लिए खुद को आज़ाद महसूस करती हूं। अब मैं किसी से प्रेम की भीख मांगने की जरूरत महसूस नहीं करती। जबरन किसी रिश्ते में होने की दरकार नहीं रही। खुद को भीतर से मुकम्मल महसूस करती हूं।

मनीषा कोईराला और राजेश मित्तल