मोदी/गोयल के बजट में मुक्तिबोध का योगदान

"..इस बार भी एक डोमाजी उस्ताद ने उकसाया. अरुण जेटली के बीमार और अमेरिका में होने की वजह से बजट पेश करने आए पीयूष गोयल ने मुक्तिबोध की कविता-पंक्ति उद्धृत की. दिलचस्प यह है कि उन्होंने मुक्तिबोध का नाम नहीं लिया, बस यह कहा कि हिंदी के एक कवि हैं जो महाराष्ट्र के हैं, उन्होंने लिखा है, 'एक पांव रखता हूं, सौ राहें फूटती हैं.'.."
-प्रिय दर्शन
Cartoon: Tanmay Tyagi

यह कई बार सोचा है कि मुक्तिबोध पर लिखते हुए यह नहीं लिखूंगा कि उनकी कविता 'अंधेरे में' में आधी रात को डोमाजी उस्ताद के नेतृत्व में चल रहा विराट जुलूस हमारे आज के यथार्थ का प्रतीक है. यह बात इतनी बार कही जा चुकी है कि इसे दुहराना व्यर्थ लगता है. लेकिन डोमाजी उस्ताद हर तरफ़ हैं और हर बार उकसाते हैं कि उनके बारे में कुछ कहा जाए.

इस बार भी एक डोमाजी उस्ताद ने उकसाया. अरुण जेटली के बीमार और अमेरिका में होने की वजह से बजट पेश करने आए पीयूष गोयल ने मुक्तिबोध की कविता-पंक्ति उद्धृत की. दिलचस्प यह है कि उन्होंने मुक्तिबोध का नाम नहीं लिया, बस यह कहा कि हिंदी के एक कवि हैं जो महाराष्ट्र के हैं, उन्होंने लिखा है, 'एक पांव रखता हूं, सौ राहें फूटती हैं.'

तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के अंतिम (अंतरिम) बजट में हिंदी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का भी एक संक्षिप्त और विनम्र योगदान है. इससे कुछ प्रकाश मोदी सरकार के मंत्रियों की कविता और उसके इस्तेमाल की समझ पर भी पड़ता है.

यह साफ़ है कि पीयूष गोयल या उनके सलाहकारों ने मुक्तिबोध को पढ़ा भी नहीं होगा. उन्हें यह मालूम तक नहीं होगा कि हिंदी की छोटी सी दुनिया अपने इस कवि का कितना सम्मान करती है. उन्हें कहीं से एक 'कोटेबल कोट' की तरह यह पंक्ति मिली होगी और उन्होंने इसका इस्तेमाल कर लिया होगा.

यह बात बताती है कि नेताओं को भी कवियों की ज़रूरत पड़ती है. कुछ नेता कवि होने पर आमादा रहते हैं. कविता और उसकी संस्कृति से अनजान बहुत सारे लोगों को लगता है कि अटल बिहारी वाजपेयी भी अच्छे कवि थे. कहीं-कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कवि होने के प्रमाण भी मिलते हैं. लेकिन कवि बनने की इस कोशिश का वास्ता कुछ चमकीली लगने वाली पंक्तियां, कुछ सूक्तियां गढ़ देने से है. कविता उनके लिए इस्तेमाल की ऐसी वस्तु है जिसका काम सजावट करना है. वह एक बजट भाषण की सज्जा के लिए इस्तेमाल की जाती है. वह संसद में चल रही किसी बहस के दौरान काम में लाई जा सकती है- इस बात की परवाह किए बिना कि पूरी कविता का मंतव्य क्या है या कवि अंतत: किधर खड़ा है.

बेशक, एक बार लिख लिए जाने के बाद कविता का अपना एक स्वायत्त व्यक्तित्व भी बन जाता है जिसे उसका पाठक अपने-अपने अलग-अलग कभी-कभी बिल्कुल विपरीत अर्थों में इस्तेमाल कर सकता है. दुष्यंत कुमार या दिनकर की बहुत सारी पंक्तियां वाम और दक्षिण के पाठक एक ही निष्ठा के साथ दुहराते मिल सकते हैं. कई बार यह भी संभव है कि कविता कवि के ही मंतव्य के विरुद्ध खड़ी हो जाए.
लेकिन बजट भाषण में मुक्तिबोध की काव्य पंक्ति के इस्तेमाल की विडंबना कुछ बड़ी और विरूप क्यों लगती है? इसलिए कि न मुक्तिबोध ने कभी छुपाया कि वे एक खास राजनीतिक चेतना के कवि हैं और न बीजेपी ने यह जताने में कोई शर्मिंदगी महसूस की कि वह इस विचारधारा से नफरत करती है. हालांकि हमारे बीच ऐसे लेखक और संपादक हैं जो इस बात पर कुछ अफसोस जताते हैं कि मुक्तिबोध ने पार्टनर की पॉलिटिक्स क्यों पूछी. उन्हें पॉलिटिक्स से अलग रहना चाहिए था. पीयूष गोयल के बजट भाषण में मुक्तिबोध के इस इस्तेमाल से शायद उन्हें कुछ उत्तर मिला हो.

दरअसल कविता का यह इस्तेमाल कविता को व्यर्थ करना है. उसे एक राजनीतिक नारे में, एक स्लोगन में, एक सजावटी-दिखावटी प्रसाधन में बदलना है. जो राजनीतिक दल या जुलूस दिनकर या दुष्यंत या किसी भी कवि का ऐसा इस्तेमाल करते हैं, वे कविता को छोटा और बेमानी बना डालते हैं. कभी धूमिल ने लिखा था, 'कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है.' अपनी कविता गवां कर, अपनी भाषा भूल कर, अपनी आदमियत को नजरअंदाज़ कर जब आप एक समाज की ठेकेदारी करने निकलते हैं तो आपको अपनी बातों को बहुत सजा कर पेश करना पड़ता है- यहां अचानक कविता से उसका मकसद छीन कर, उसे आप आत्माविहीन कर डालते हैं, एक बेजान से जिस्म में बदल डालते हैं.

कहने की ज़रूरत नहीं कि कविता के साथ यह सलूक सिर्फ नेता या कारोबारी या दूसरे लोग ही नहीं करते, कई बार खुद कवि करते हैं, वे सारे लोग करते हैं जो लेखक होने का दावा करते हैं. कविता उनके लिए तमगे की तरह होती है जिसमें वे सम्मान और पुरस्कार की तरह के कुछ और तमगे जोड़ना चाहते हैं. वे लोग भी कवित को व्यर्थ ही करते हैं.

मुक्तिबोध के संदर्भ में यह त्रासदी कुछ ज्यादा हूक पैदा करती है. हमारी तरह के बहुत सारे लोगों की तरह कविता उनके लिए तफरीह की जगह नहीं थी, वह कोई काल्पनिक जगह नहीं थी, उनके लिए वह आत्मसंघर्ष का मैदान थी, वह जलता हुआ वृत्त थी जिसमें वे इस तरह दाखिल हो गए कि उससे निकल तक नहीं सके. उनका भय, उनकी वेदना, उनका आत्मसंघर्ष उनकी कविता में इतनी गहरी तहों तक अनुस्यूत हैं कि उनसे हम भी मुक्त नहीं हो पाते.

लेकिन पीयूष गोयल मुक्तिबोध का इस बेपरवाही से इस्तेमाल करते हैं कि हैरानी नहीं, तकलीफ होती है. निस्संदेह यह उनका निजी कसूर नहीं, इसे सिर्फ भाजपाई संस्कृति बताना भी अन्याय होगा, यह कुल मिलाकर हमारी पूरी राजनैतिक संस्कृति का आईना है- एक ऐसा आईना जिसका जिक्र भी खतरनाक होने लगता है. आखिर हमारे कवि ने ही कहा था- 'हाय-हाय मैंने उनको नंगा देख लिया है, इसकी सजा मुझे मिलेगी, जरूर मिलेगी.'

प्रिय दर्शन वरिष्ठ पत्रकार हैं. NDTV से जुड़े हैं.

यह आलेख https://khabar.ndtv.com से साभार.