आनंद तेलतुम्बड़े की गिरफ़्तारी के लिए इतनी बेचैनी क्यों?

आश्चर्यजनक यह है कि प्रो.तेलतुंबड़े तो भीमा कोरेगांव में होने वाले प्रदर्शन और उसे दलितों की विजय के रूप में पेश किए जाने के समर्थक भी नहीं हैं. अपने एक लेख में उन्होंने इस बारे में लिखा कि "‘भीमा कोरेगांव का मिथक उन्हीं पहचानों को मजबूत करता है, जिन्हें लांघने का वह दावा करता है। हिन्दुत्ववादी शक्तियों से लड़ने का संकल्प निश्चित ही काबिलेतारीफ है, मगर इसके लिए जिस मिथक का प्रयोग किया जा रहा है वह कुल मिला कर अनुत्पादक है."


प्रो. आनंद तेलतुंबड़े को तड़के पौने चार बजे गिरफ्तार करवाने वाली सत्ता को 12 घण्टे के भीतर ही मुंह की खानी पड़ी और पुणे की एक अदालत ने उन्हें बरी कर दिया.

दलित खेत मजदूर माता-पिता के घर जन्में प्रो.आनंद तेलतुंबड़े गोवा इन्स्टिटयूट ऑफ़ मैनेजमेण्ट में बिग डाटा एनालिटिक्स के विभागाध्यक्ष हैं,आई. आई.टी. में प्रोफेसर रहे हैं, वे मेकैनिकल इंजीनियर के रूप में काम कर चुके हैं, वे एक्टिविस्ट हैं,स्तम्भकार हैं.दलित अधिकारों के मामले में सक्रिय हैं.


इसी सक्रीयता के चलते वे सत्ता के निशाने पर हैं. देश भर में जिन बुद्धिजीवियों, लेखकों,कवियों आदि पर अर्बन नक्सल का लेबल केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने चस्पा किया,उनमें से वे एक हैं. केंद्र की सरकार को पढ़ने-लिखने,सोच विचार करने वालों से काफी चिढ़ है. इसलिए विश्वविद्यालय उसके निशाने पर हैं, बुद्धिजीवी, साहित्यकार सब उसके निशाने पर हैं.

प्रो.तेलतुंबड़े को पिछले साल भीमा कोरेगांव की हिंसा के मामले में अभियुक्त बनाया गया है. इस मामले में हिंसा के असली दोषियों सम्भा जी भिड़े और मिलिंद एकबोटे के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई क्योंकि वे सरकार के खेमे के लोग हैं.

आश्चर्यजनक यह है कि प्रो.तेलतुंबड़े तो भीमा कोरेगांव में होने वाले प्रदर्शन और उसे दलितों की विजय के रूप में पेश किए जाने के समर्थक भी नहीं हैं.अपने एक लेख में उन्होंने इस बारे में लिखा कि "‘भीमा कोरेगांव का मिथक उन्हीं पहचानों को मजबूत करता है, जिन्हें लांघने का वह दावा करता है। हिन्दुत्ववादी शक्तियों से लड़ने का संकल्प निश्चित ही काबिलेतारीफ है, मगर इसके लिए जिस मिथक का प्रयोग किया जा रहा है वह कुल मिला कर अनुत्पादक है."

लेकिन सरकार को विचारों से कोई लेना-देना नहीं है. आदमी बौद्धिक है, एक्टिविस्ट है,सरकार के लिए उसे अपना शत्रु समझ लेने के लिए इतना पर्याप्त है .

यह शत्रुता इस हद तक है कि उच्चतम न्यायालय ने 11 फरवरी तक प्रो.तेलतुंबड़े को गिरफ़्तार न किये जाने के आदेश दिए हुए हैं.परंतु फिर भी उन्हें आज सुबह पौने तीन बजे गिरफ्तार कर लिया गया.सरकार अपनी वैचारिक खुन्नस निकालने के लिए इस हद तक उतर जा रही है कि वह उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करने में भी नहीं झिझक रही है.

प्रो.तेलतुंबड़े को रिहा करने का आदेश देते पुणे के विशेष जिला जज ने अपने आदेश में लिखा कि तेलतुंबड़े को गिरफ्तार करना गैरकानूनी कृत्य है और यह उच्चतम न्यायालय की अवमानना है.

सरकार बहादुर कानून तोड़ कर,गैरकानूनी तरीके से कानून का पालन तो नहीं हो सकता.कोई सरकार कानून तोड़ कर , गैरकानूनी तरीके अपना कर, व्यक्ति विशेष से खुन्नस निकालने पर उतारू हो जाये तो उसमें और अपराधियों के गिरोह में क्या फर्क रह जाएगा? प्रश्न यह भी है कि किसी व्यक्ति विशेष से गैरकानूनी तरीके से खुन्नस निकालने की ,सार्वजनिक धन से अनुमति क्यों होनी चाहिए?

लेखक सीपीआई (एमएल) से जुड़े सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता हैं.