पलटनिया पिता: एक पहाड़ी फ़ौजी के बेटे की स्मृतियां

'पुलवामा' की यह झकझोर देने वाली घटना किन्हीं लोगों के लिए एक ऑपरेशन की सफ़लता भी होगी जैसे ​'सर्जिकल स्ट्राइक' भी एक सफल ऑपरेशन था. हालांकि मक़सद बदल जाने से एक सी दिखती घटनाओं के अर्थ भी बदल जाते हैं. रिपोर्ट्स यह भी हैं कि यह घटना घनघोर लापरवाही का परिणाम भी रही. उसकी जवाबदारी किसके हिस्से आएगी जो इन मौतों का शबब बनीं?
लेकिन इस सब के बीच जिन सैनिकों की शहादतें हुईं, वह सैनिक होने के साथ और भी बहुत कुछ थे. एक बेटा, एक भाई, एक पति, एक दोस्त और पिता भी. वे अपनी जान हथेली पर लिए सीमाओं पर रुमानियत से भरे जितना अपने देश के तैनात थे, उतना ही अपने परिवार के लिए भी. 
कवि अनिल कार्की ऐसे ही एक बेटे हैं जिनके पिता पलटन में थे. उनकी नज़रों से देखें क्या होता है एक 'पल​टनिया पिता'.

- अनिल कार्की की कविताएँ


पलटनिया पिता-1


फ़ौजी पिता 
अख़बारों में मिले 

हमने सीने फुलाए

दिखती थी छब्बीस जनवरी को 

उनकी टुकड़ी 

दूरदर्शन पर 
राजपथ की धुन्ध में क़दमताल करती
हमने सीने फुलाए

कभी न हारने वाले 

जाबाँज सैनिक की तरह 

वे कई बार 
देशभक्ति की फ़िल्मों में थे 
हमने सीने फुलाए

पिता 

मेरे लिए 

बी०एड० की प्रवेश-परीक्षा में 
दस नम्बर का अतिरिक्तांक थे
देश के लिए 
एक सैनिक थे वे

मरने के दिन वह 

एक दिन के लिए बने पिता 

जिन्हें छूते हुए मैं 
देर तक ताकता रहा उनका चेहरा 
वो वैसे थे ही नहीं 
जैसा पढ़ाया और दिखाया गया था 
सैनिकों के बारे में

एक जर्जर शरीर था उनका 

ऐसा कि जैसे लगाम बँधा थका घोड़ा 

जिसके खुर नाल ठोकते ठोकते 
घिस चुके थे
उनके मुँह से बहता हुआ झाग 
मृत्यु के वक्त भी 
देश की बात करता था 
वही देश जिसके पास 
पिता छोड़ आये थे 
जवानी के सबसे ख़ूबसूरत दिन
नसों में बहता गर्म ख़ून
जिस देश को मैंने 
समाचार-चैनलों व अख़बारों में पढ़ा था 
उसी देश को सुना था पिता ने
अपने अधिकारियों के मुँह से

मैं पिता को देखते हुए

इतना ही समझ पाया

देश के बारे में 
कि पिता ने अपने अधिकारियों को देखकर 
फुलाया था सीना
मैंने उन्हें देखकर


पलटनिया पिता-2



काले रंग का तमलेट
सिलवर का टिप्पन

‘चहा’ पीने वाला सफ़ेद कप्फू

एक हरिए रंग की डांगरी
बगस के किनारे 
सफ़ेद अक्षर में लिखे 
नाम थे 
पलटनिया पिता


बगस के भीतर रखे उस्तरे 

ब्लेड, फिटकरी का गोला

सुई, सलाई, 
राईफ़ल को साफ़ करने वाला 
फुलतरा और तेल
कालाजादू बिखेरते फौजी कम्मबल
हुस्की, ब्राण्डी, और रम की 
करामाती बोतल थे 
पलटनिया पिता


धार पर से ढलकती साँझ 

पानी के नौलों (चश्मों) में चलकते सूरज 

चितकबरे खोल में लिपटे 
ट्राँजिस्टर पर बजते
नजीबाबाद आकाशवाणी थे 
पलटनिया पिता


पलटनिया पिता के 

खाने के दाँत और थे 

और दिखाने के दाँत और
देशभक्ति उनके लिए
कभी महीने भर की पगार
कभी देश का नमक 
कभी गीता पे हाथ रख के खाई क़सम परेट थी


कभी दूर जगंलों में राह तकती 

घास काटती ईजा (माँ) 

कभी बच्चों के कपड़े लत्ते जैसी थी
आयुर्वेदिक थी देश भक्ति 
च्यवनप्रास के डब्बे-सी 
आधुनिक थी देशभक्ति 
मैगी के मसाले-सी 
लाईबाय साबुन की तरह 
जहाँ भी हो
तन्दुरुस्ती का दावा करती-सी


इसके अलावा वो हमें मिले थे

कई बार 

कई-कई बार
मसलन
फ़िल्मों में 
और तारीख़ों में 
पन्द्रह अगस्त की तरह
छब्बीस जनवरी की तरह
कुहरीले राजपथों में 
जोशीले युद्धों में 
पंक्तियों में 
कतारबद्ध चलते हुए 
हाँके जाते हुए।


पलटनिया पिता-3


पलटनिया पिता
तुम जब लौटोगे 

भूगोल और देश की सीमाओं से 

कभी मनुष्यता की सीमा के भीतर
जेब से बटुआ निकाल लोगे
निहार लोगे 
ईजा (माँ) की फोटुक
बच्चों की दन्तुरित मुस्कान 
जाँच लोगे मेहनत की कमाई 
एक दिहाड़ी मजदूर की तरह

कहीं किसी पहाड़ी स्टेशन में 
(जो अल्मोड़ा भी हो सकता है)
उतरोगे बस से 
बालमिठाई के डब्बों के साथ 
पहुँचोगे झुकमुक अंधेरे में 
अपने आँगन
मिठाई के डब्बे से 
निकाल लोगे एक टुकड़ा मिठाई

मुलुक मीठी मिठाई-सा 
घुल आयेगा बच्चों की
जीभ पर
जबकि देश पड़ा रहेगा 
लौट जाने तक 
रेलवे टिकट के भीतर 
या संसद में होती रहेगी 
उसके संकटग्रस्त होने की चर्चा

अनिल कार्की चर्चित लेखक हैं. 
कहानी और कविताओं में दख़ल.