वैलेंटाइंस डे स्पेशल : चिड़ियों को खुला आसमान चाहिए, लेकिन आसमान को भी तो खुली चिड़ियाँ चाहिए!

"..कल ही एक लड़का आया था। शादी कर रहा है। प्रेम करते हुए शादी तक आया है। लेकिन इस समय प्रीवेडिंग शूट की प्लानिंग में डूबा है। ऐसी जगह , वैसी जगह। ऐसे पोज़ , वैसे पोज़। यह फ़ोटोग्राफ़र , वह फ़ोटोग्राफ़र। वह मुझसे अपने ख़्याल बताता है : मैं उससे पूछ बैठता हूँ , इतना समय कभी प्रेम को दिया है ?
वह भी मेरी तरह किसी ऊँचाई से गिरता है। ऊँचाई जहाँ दीपिका हैं , रणवीर हैं , प्रियंका हैं , निक हैं। वह वहीं होना चाहता है। मैं उससे अपने आपको तलाशने को कहता हूँ।.."
-डॉ स्कन्द शुक्ला 


बात पुरानी है। मुझे अपने लिए नया लैपटॉप लेना था। अपने एक मित्र के साथ मैं लखनऊ की एलेक्ट्रोनिक-बाज़ार में टहल रहा था : साथ में दो जन और चले आये थे -- अभिव्यक्ति और स्वतन्त्रता। 
दिन आज ही का यानी चौदह फरवरी था, लेकिन रोमांस की जगह मुझे तकनीकी चाहिए थी। इम्तेहान बहुत दूर नहीं रह गये थे और चूँकि ढेरों पढ़ने-लिखने के काम कम्प्यूटर पर ही होते थे, इसलिए इस काम को और टाला नहीं जा सकता था। सो हम दोनों मौक़ा पाते ही बाज़ार को निकल लिये, मित्र के साहचर्य का एक अद्भुत सुख मिला करता था और आज-तक मैं उनके इस दृष्टिकोण के लिए उन्हें प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से आभार व्यक्त करता रहा हूँ। 
"तुम्हें कौन-सा लैपटॉप लेना है ? कुछ मन बनाया है ?" वे पूछते।
मैं 'महाजनो येन गतः स पन्थाः' की तर्ज़ पर कभी ऐपल मैकबुक तो कभी सोनी वायो का नाम ले बैठता। मित्र उस दिन मेरे भटकाव को देख कर जैसा मुस्कुराये थे , वह मुस्कराहट आज-तक मन में उसी तरह ताज़ी बनी हुई है। 
"सुभाषित का पूर्वार्ध जाने बिना उत्तरार्ध जानना और मानना अर्थ का अनर्थ करना है।" उन्होंने कहा था। 
"आपको कैसे पता कि मैं किसी सुभाषित में अटका हुआ हूँ।"
"क्योंकि आप अपने निर्णय महाजनों के पीछे ही चल कर लेना चाहते हैं। और जिन्हें आप महाजन समझते हैं , वे बाज़ार के कारिन्दे हैं। उनके मुलाज़िम। उनकी भाषा बोलते हैं , क्योंकि उनसे पैसा पाते हैं।"
"व्यक्ति कहीं तो पश्चगामी होगा न। सम्पूर्ण अग्रगामिता तो छल है न। ऐसा कौन है जो केवल लीड करता हो और फॉलो नहीं। ऐसा हो सकता है कि हमेशा हर व्यक्ति अपना नेता स्वयं बना रह सके !"
"मटीरियल इच्छाओं के लिए अपना नेता अगर आप बन सकें , तो इससे बेहतर कुछ नहीं। कपड़े , लैपटॉप , घर , गाड़ी --- ये ऐसी वस्तुएँ हैं , कि इनमें किसी अन्य की महाजनीयता आपको नहीं चाहिए।"
"और परामर्श ?"
"बाज़ार आपको परामर्श कहाँ दे रहा है ? वह तो करीना कपूर से वायो बिकवा कर आपको झुका रहा है। वह कह रहा है कि इसे ख़रीदो। यही तुम्हारे लिए उपयुक्त है। आपको पर सोचना चाहिए कि आपकी उपयुक्ति कहाँ है। आपको क्या चाहिए। आपकी इच्छाओं के अनुसार आपके स्पेसिफिकेशन क्या हैं। आपने ऐसा सोचा ?"
मैं मानो ऊपर से गिरा और चोट से कराह उठा। जैसे किसी से सपना छीन कर कुछ सामान्यता थमा दी हो। यक़ीन नहीं होता आज कि मुझे इस सोच के साथ सामंजस्य बिठाने में कई दिन लग गये। मित्र मेरे साथ एक एलेक्ट्रोनिक-शॉप में घुसे। वहाँ करीना कपूर की स्टैन्डियों को उन्होंने निस्पृह भाव से देखा। मुझसे मेरी आवश्यकताएँ पूछीं। हमने कुछ देर दुकान वाले से चर्चा की। और फिर सस्ता किन्तु अच्छा लैपटॉप लेकर बाहर आ गये। 
तब से अब तक जीवन बदल गया है; जटिल से जटिलतर हो गया हैं। माँगें रोज़ सिर उठाती हैं, मन रोज़ कुछ नया पाने के लिए मचलता है। इंडल्ज, बी ग्रीडी, मोर --- जैसे जुमले मुझे रोज़ आकर ललचाते हैं। सेलफ़ोन क्यों न तीस हज़ार का ले लिया जाए ! गाड़ी क्यों न तीस लाख की ! घर क्यों नहीं महँगा-पॉश सा ! फिर एक ही क्यों ! एक से भला क्या होगा ! नो वन कैन ईट जस्ट वन ! 
कल ही एक लड़का आया था। शादी कर रहा है। प्रेम करते हुए शादी तक आया है। लेकिन इस समय प्रीवेडिंग शूट की प्लानिंग में डूबा है। ऐसी जगह , वैसी जगह। ऐसे पोज़ , वैसे पोज़। यह फ़ोटोग्राफ़र , वह फ़ोटोग्राफ़र। वह मुझसे अपने ख़्याल बताता है : मैं उससे पूछ बैठता हूँ , इतना समय कभी प्रेम को दिया है ?
वह भी मेरी तरह किसी ऊँचाई से गिरता है। ऊँचाई जहाँ दीपिका हैं , रणवीर हैं , प्रियंका हैं , निक हैं। वह वहीं होना चाहता है। मैं उससे अपने आपको तलाशने को कहता हूँ। तुम क्या हो , वह बनो। तुम उनके जैसा कृत्य मत करो , क्यों करना चाहते हो। वह अब भी प्रेम का हवाला दे रहा है। मुझे हँसी आ रही है : प्रेम में कहीं ऐसी आडम्बरी ऑब्जेक्टिविटी होती है बबुआ कि लड़की स्वयं को दीपिका समझे और लड़का रणवीर ?
वह कल वही सुभाषित कह रहा था , जो मैंने अपने मित्र से कई सालों पहले कही थी। आधी-अधूरी। केवल उत्तरार्ध , बिना पूर्वार्ध। महाजनों के पीछे ही चलना चाहिए --- जिस मार्ग पर वे चले --- वही अनुकरणीय है। लेकिन आज मुझे वह पूर्वार्ध याद ही नहीं है , स्थापित है।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्। 
महाजनो येन गतः स पन्थाः। 
( धर्म गहनतापूर्वक गुफाओं में छिपा है , इसलिए महाजनों का अनुकरण करके उसे पाना चाहिए। )

मैं लड़के से पूछता हूँ कि किसी अन्य का महँगा मोबाइल देखकर उसे पाने की लालसा जगाना धर्म है ? अथवा रियल स्टेट के लिए मचलते रहना ? अथवा यह प्रीवेडिंग-शूट ? फिर मैं स्वयं जोड़ता भी हूँ कि चूँकि ये सारे विचार मन में हैं , इसलिए निकृष्ट कोटि के ही सही, ये सब तुम्हारे धर्म हुए। अब चूँकि तुम निम्न कोटि के धर्मों में हो, इसलिए तुम्हें वैसे ही देवता अपनी ओर आकर्षित करेंगे। तुम दिन-रात उन्हीं का आह्वाहन करते हो। उन्हीं को सेलफ़ोन और लैपटॉप पर देखा करते हो। तुम ग़लत मार्ग पर खड़े हो, तुम्हें ग़लत नायक ही मिलेंगे। तुम ग़लत गुफ़ा में ग़लत चीज़ की तलाश कर रहे हो।
जिन मित्र ने मुझे सिखाया था कि स्वतन्त्रता अभिव्यक्ति की पुत्री नहीं है सहचरी है --- वे आज भी इसी शहर में हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सबको चाहिए, लेकिन स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति को समझने वाली युवा पीढ़ी हमारे बीच कब उठ खड़ी होगी !
नाम उनका मगर नहीं लूँगा। बस उनसे इतना कहूँगा, जो उस दिन लैपटॉप लेने के बाद सन् 2011 में कहा था : हैपी वैलेंटाइन डे, बन्धु।