13 बनाम अनगिन आत्महत्याएं

ऑस्ट्रेलिया के लिए यह रिपोर्ट शायद एक अन्य जांच रिपोर्ट हो लेकिन मुझ पर इस रिपोर्ट का असर कुछ ज्यादा है. क्योंकि मैं जहां से आता हूं वहां तो ऐसी आत्महत्याओं का हिसाब ही नहीं है. और ये मुल्क, जहां 13 मौतों पर लोग परेशान हैं, एक विशुद्ध पूंजीवादी देश है. कौन मुल्क 10 साल की बच्ची की, जंगल में रहने वाली बच्ची की इतनी परवाह करता है!
- विवेक कुमार


आज ऑस्ट्रेलिया में एक जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई है जो भारत में रहने वाले संवेदनशील लोगों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं होगी.

विशाल महाद्वीप ऑस्ट्रेलिया के विशाल राज्य वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के सुदूर उत्तर में एक जगह है किंबरली. आबादी 50 हजार से कुछ ऊपर. वहां मूल निवासी आबादी यानी ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी ज्यादा हैं. 2013 से 2016 के बीच 13 किशोरों ने आत्महत्या की. यानी साढ़े तीन साल में 13 आत्महत्याएं. इनमें 10 साल की एक बच्ची भी थी जिसने 6 मार्च 2016 को अपनी जान ली थी. पूरा मुल्क कांप गया था. 

आत्महत्या करने वाले 1991 से 2006 के बीच जन्मे थे. किंबरली और उसके आसपास के इलाकों में रहने वाले इन बच्चों ने 20 नवंबर 2012 से 24 मार्च 2016 के बीच खुदकुशी की थी. ज्यादातर किशोर छोटे-छोटे ग्रामीण इलाकों में रहने वाले थे.

लोगों के माथे पर शिकन तो 2012 में ही आ गई थी जब पता चला कि दूर दराज गांव में रहने वाले किशोर खुदकुशी कर रहे हैं. लेकिन 2016  में जब 10 साल की बच्ची ने अपनी जान ली तो जैसे मनों में भूकंप आ गया था. इसी बच्ची की बहन ने तीन साल पहले आत्महत्या की थी. मान लिया गया कि पानी सिर के ऊपर से गुजर गया है. 

हालांकि यह सिर्फ 13वीं मौत थी. इस आंकड़े से पहले ‘सिर्फ’ लिखते वक्त मेरे हाथ कांप रहे हैं लेकिन भारत में किसानों की आत्महत्याओं की ख़बरों को सैकड़ों का आंकड़ा पढ़ बीच के पन्नों पर खिसका देने वाले हाथों को इस कंपकपी की सजा मिलनी ही चाहिए.

तो किंबरली में आत्महत्याओं की जांच हुई. जांच करने वाली अधिकारी ने रिपोर्ट में कहा है कि इन मौतों का जिम्मेदार औपनिवेशीकरण है. ये किशोर, जिनमें पांच 10 से 13 बरस के थे, ऐसे परिवारों में रह रहे थे जो टूट रहे थे. घरेलू हिंसा और नशा इन परिवारों के सदस्य बन चुके थे. जांच अधिकारी कहती हैं कि कुछ बच्चों के साथ यौन शोषण भी हुआ जिसकी कहीं कोई रपट नहीं हुई.

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फिर कुपोषण, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और स्कूल ना जा पाने जैसी बातों का भी जिक्र है. जांच करने वालीं अधिकारी रोज फॉलिआनी कहती हैं कि हर मौत अपने आप में और ये सारी मौतें एक घटना के रूप में एक बहुत बड़ी त्रासदी हैं.

और जानतें हैं, उन्होंने हालात सुधारने के लिए सिफारिशें कैसी कैसी दी हैं? कहती हैं कि युवाओं को सैर कराई जाएं और उन्हें अपने इतिहास, अपनी संस्कृति से परिचित कराया जाए. 

रिपोर्ट कहती है कि इलाके में कोलोनाइजेशन यानी औपनिवेशीकरण का बहुत असर हुआ है. आदिवासी परिवार टूट रहे हैं. नशा बढ़ा है. और किशोरों पर इसका घातक असर हुआ है. रिपोर्ट में दर्जनों सिफारिशें की गई हैं ताकि हालात सुधर सकें. हालांकि हालात उसके बाद ही बेहतरी की ओर बढ़ चले थे. लेकिन स्थिति कोई आदर्श नहीं है. पहले भी मूल निवासियों में आत्महत्याओं की घटनाएं लोगों को परेशान करती रही हैं. और 2016 के बाद भी आत्महत्याएं थमी नहीं हैं. 

बस एक फर्क है. एक चिंता है जो छोटे-छोटे बदलावों के जरिए असर डाल रही है. एक छोटी सी मिसाल है कि जब भी आत्महत्या से जुड़ी कोई खबर लिखी जाती है, तो उसके नीचे एक लाइन जरूर लिखी जाती है.

“यदि आप या आपका कोई जानने वाला आत्महत्या के ख़्याल से गुजर रहा है तो फलां नंबरों पर कॉल करें.”

ऑस्ट्रेलिया के लिए यह रिपोर्ट शायद एक अन्य जांच रिपोर्ट हो लेकिन मुझ पर इस रिपोर्ट का असर कुछ ज्यादा है. क्योंकि मैं जहां से आता हूं वहां तो ऐसी आत्महत्याओं का हिसाब ही नहीं है. और ये मुल्क, जहां 13 मौतों पर लोग परेशान हैं, एक विशुद्ध पूंजीवादी देश है. कौन मुल्क 10 साल की बच्ची की, जंगल में रहने वाली बच्ची की इतनी परवाह करता है!



विवेक कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.
अभी आस्ट्रेलिया में रहते हैं और SBS Hindi के साथ काम करते हैं.