Science Praxis : एंटीबायोटिक्स का टैन इयर्स चैलेंज

"..भारत उन देशों में है, जहाँ इस चित्र पर भरपूर चिन्ता होनी चाहिए। यह दस-सालाना चुनौती हमें बता रही है कि सुपरबग हमारी देहों के द्वार खटखटा रहा है। एंटीबायटिक लिखने वाले और खाने वाले, दोनों को समझदार होने की ज़रूरत है।.."
डॉ. स्कंद शुक्ला
सोशल मीडिया पर आजकल नाॅस्टैल्जिया चलन में है। लोग पलट कर गत दस वर्ष निहार रहे हैं, बुहार रहे हैं, बघार रहे हैं। इस विषय में किस्म-किस्म की सृजनशीलता सामने आ रही है। कुछ विनोदी, कुछ शोचनीय। कुछ गुदगुदाती, कुछ कचोटती। कुछ सुखस्पर्शी, कुछ दुःखदंष्ट्री।
इसी विषय में एक ध्यानाकर्षी दस-वर्षीया चुनौती शेयर किये बिना रहा न गया। ऊपर एक चित्र है। चित्र में दो पेट्रीडिश नामक तश्तरियाँ हैं। प्रयोगशालाएँ जीवाणुओं को उगाने में इनका ख़ूब इस्तेमाल करती हैं। पेट्रीडिशों में अगार नामक पदार्थ डाला जाता है, जो जीवाणुओं का भोजन है। नतीजन पूरी पेट्रीडिश जीवाणुओं की बढ़ती संख्या के कारण धुँधली-सफेद हो जाती है।
चित्र देखिए। दोनों पेट्रीडिशों में छोटी-छोटी फ़िल्टर-पेपर की सोख्ता गोल सफ़ेद पट्टियाँ रखी हैं, जिनमें एंटीबायटिक हैं। बायीं ओर की पुरानी पेट्रीडिश में एंटीबायटिक-युक्त सोख्ता पट्टियों के चारों ओर एकदम साफ़ छल्ले बन गये हैं। ये वे छल्ले हैं, जहाँ पेट्रीडिश में मौजूद जीवाणु विकसित नहीं हो पाते हैं। कारण कि एंटीबायटिक ने अपने चारों ओर जीवाणुओं का विकास स्थगित कर दिया है।
जितने बड़े छल्ले, उतनी मज़बूत एण्टीबायटिक। एंटीबायटिक बनाम जीवाणु जाँचने का यह तरीका डिस्क-डिफ़्यूज़न कहलाता है।
दाहिनी ओर की नयी पेट्रीडिश में एंटीबायटिक के चारों ओर साफ़ छल्ले नहीं हैं। कारण कि एंटीबायटिक जीवाणुओं को मारने में असफल रही हैं। जीवाणुओं में इन दवाओं के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गयी है।
भारत उन देशों में है, जहाँ इस चित्र पर भरपूर चिन्ता होनी चाहिए। यह दस-सालाना चुनौती हमें बता रही है कि सुपरबग हमारी देहों के द्वार खटखटा रहा है।
एंटीबायटिक लिखने वाले और खाने वाले, दोनों को समझदार होने की ज़रूरत है।
डॉ. स्कन्द शुक्ला, चर्चित विज्ञान लेखक हैं. 
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