मणिकर्णिका : क्या है, क्या नहीं?

"वीर हो या वीरांगना उनके साथ जुड़ी किंवदन्तियाँ अतिश्योक्तियों को जन्म देती ही हैं और लोक भी उन्हें स्वीकार कर लेता है झाँसी के किले से घोड़े सहित रानी का कूदना फ़िल्म में आया है। झाँसी का लोक भी इसे स्वीकार करता है, यद्धपि वो इतिहास नहीं है। मूल इतिहास के साथ बहुत कम छेड़छाड़ हुई है। लेकिन झलकारीबाई को शहीद दिखाना और जियाजीराव सिंधिया और रानी का ग्वालियर के किले में आमना-सामना इतिहास सम्मत नहीं।" 

मेरा मानना रहा है और लगातार कहता आ रहा हूँ कि दलितों-आदिवासियों की भाँति देश के प्रत्येक क्षेत्र में स्त्रियों का आगमन हमारे लोकतंत्र को मजबूत ही करेगा. कंगना राणावत निर्देशित और अभिनीत इस फ़िल्म को मैं इसी रूप में देखता हूँ। फ़िल्म की आलोचना करने बैठूँ तो उसमें हजार खामियाँ हैं। 

कितना अच्छा होता कि कंगना आशुतोष गोवारीकर (जोधा अकबर) और केतन मेहता (मंगल पांडेय) के क़रीब रहकर फ़िल्म निर्माण करतीं, जबकि उनकी नज़र बाजीराव मस्तानी और पद्मावत फ़ेम संजय लीला भन्साली पर अधिक रही. जो एक्शन और भव्यता के व्यामोह में इतिहास के मूल से इतनी छेड़छाड़ करते हैं कि दर्शक सिनेमाघर में जाकर अपना सिर पीट लेता है। 

जायसी का पद्मावत देखने गया दर्शक जब भन्साली का पद्मावत देखता है तो उसे नीरजा गुलेरी का चन्द्रकान्ता याद आता है, जिसमें देवकीनन्दन खत्री के मूल चन्द्रकान्ता (उपन्यास) को ढूँढना, भूसे में सुई खोजने जैसा लगता है।

तो बात कँगना की मणिकर्णिका की हो रही थी। कँगना का अभिनय और निर्देशन दमदार है, यादगार भी। जो लचर है वो कथा, पटकथा और संवाद। गीत-संगीत बिल्कुल पात्रानुकूल नहीं है। ड्रेस डिज़ाइनर लगता है कोई मराठी रहा होगा, जिसने ठेठ बुन्देली झलकारीबाई को भी मराठी नौ गज की साड़ी और गूँजदार नथनी पहना दी है। 

पूरी फिल्म में बुंदेलखंड कहीं नहीं है, बस एक जगह जब गंगाधर का ब्याह होता है और पार्श्व में ढोलक पर गीत बज रहा होता है-दुल्हन बनी सिया-जानकी। बस! रानी के साथ झलकारीबाई का जो नृत्य गीत है, वो उस परिवेश को इतना ख़राब करता है कि मन बीच फ़िल्म उठकर आने को होता है। 

'चिकनी चमेली घर से अकेली पौवा चढ़ा के आई' गीत कि बरबस याद दिलाने वाला यह गीत, लिखने वाले ने और फ़िल्म की टीम के लोग यदि थोड़े अध्ययन में जाकर पूरन-झलकारीबाई की पृष्ठभूमि पता करते, तो उस पृष्ठभूमि में कोई सुंदर बुन्देली राई अपने उद्दाम नृत्य के साथ प्रस्तुत की जा सकती थी। 

वीर हो या वीरांगना उनके साथ जुड़ी किंवदन्तियाँ अतिश्योक्तियों को जन्म देती ही हैं और लोक भी उन्हें स्वीकार कर लेता है झाँसी के किले से घोड़े सहित रानी का कूदना फ़िल्म में आया है। झाँसी का लोक भी इसे स्वीकार करता है, यद्धपि वो इतिहास नहीं है। मूल इतिहास के साथ बहुत कम छेड़छाड़ हुई है। लेकिन झलकारीबाई को शहीद दिखाना और जियाजीराव सिंधिया और रानी का ग्वालियर के किले में आमना-सामना इतिहास सम्मत नहीं 

नए शोध में रानी कोटे की सराय पर नहीं फूलबाग पर शहीद हुई थी, वो भी 18 जून को नहीं 17 जून 1858 को रानी की ओर से 8 और अंग्रेजों और सिंधिया की ओर से 7 मोर्चे लगे थे। रानी मुन्ना साहब की कोठी वाले चौथे मोर्चे पर लड़ी थीं, जिनका समाना जियाजीराव, हेमिल्टन, ह्यूरोज से था। एक साथ इतनी भयंकर लड़ाई हुई न थी। ग्वालियर पर चारों ओर से अलग-अलग दिशाओं से हमले हुए थे। 

ख़ैर फ़िल्म के प्रारम्भ में ही दन्तकथाओं और इतिहास के नाट्य रूपांतरण की बात है, तो उसमें शुद्ध इतिहास खोजने की ज़रूरत भी नहीं है। गो-माँस निषेध, भगवा ध्वज और राष्ट्रवाद, फ़िल्म में वर्तमान और तत्काल दोनों से प्रेरित लगते हैं। पर फ़िल्म का मूल सन्देश भंसाली की तरह ब्राह्मणवादी पेशवाओं का महिमामंडन नहीं करता। चाहे शुरुवात में एक-दो जगह लक्ष्मीबाई के ब्राह्मण की बेटी होने पर ज़ोर खटकता है, पर वह ब्राह्मण की बेटी ब्याह के तुरंत बाद ही ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता की धज्जियाँ उड़ाना शुरू करती है, तब फ़िल्म नागपुर से उठने वाली भगवा लहर को हवा देती नहीं लगती। 

यह कँगना का निर्देशकीय कमाल है या रानी का समावेशी चरित्र कि फ़िल्म में मुस्लिम, दलित और आदिवासी (याद करें फ़िल्म के अंतिम दृश्य में हरी साड़ी पहने रानी के साथ युद्ध करती साँवली लड़की जो रानी से पहले शहीद होती है, वो काली या कान्हा आदिवासी युवती है, जिसके बारे में सुभद्राकुमारी अपनी कविता में कहती हैं-कान्हा और मुन्द्रा सखियाँ रानी के संग आई थीं, उन दोनों ने युद्ध क्षेत्र में भारी मार मचाई थी।) कन्धे से के कन्धा मिलाकर खड़े हैं। 

रानी ब्राह्मण और स्त्री दोनों है पर वह विवाह के बाद भी महल की चारदीवारी में कैद नहीं रहती। वह घुड़सवारी भी करती है और प्रजा के बीच दलित-पिछड़ी बस्तियों में भी जाती है! विधवा होने पर वह एक पारम्परिक सनातनी स्त्री की तरह केश मुंडन नहीं करवाती है, न श्वेत वस्त्र पहन काशीवास। महाराष्ट्र में सधवा स्त्रियाँ ही हल्दी-कुंमकुम का त्यौहार मनाती हैं, पर लक्ष्मी उस समय विधवा होकर भी हल्दी-कुंकुम की रस्म करती है और एक क़दम आगे बढ़ वह एक बाल विधवा को सिंदूर दान भी करती है। 

रानी प्रारम्भ में भले ही एक रियासत को बचाने के लिए समझौते और यत्न करती है, पर अंत में जब विद्रोहियों के सम्पर्क में आती है तब उसका सपना स्वराज का होता है। रानी का स्वराज निश्चित ही मनु सहिंता पर आधारित पेशवाई स्वराज न था, क्योंकि उस संघर्ष में जिस प्रकार मुस्लिम (गुलाम गौस) दलित (पूरन-झलकारी) आदिवासी (कालीबाई) ओबीसी (भाऊ बख्सी) और तमाम बुंदेलखंड के लोक को वे सम्मलित करती हैं, उससे सिद्ध होता है कि रानी लक्ष्मीबाई के स्वराज की संकल्पना नागपुरिया चित्तपावनों के हिंदुस्तान से कहीं बेहतर और उदार प्रकृति की थी। 

यद्धपि यह शोध का विषय है कि 1848 के आसपास इन्ही पेशवाओं की नाक के नीचे फुले दम्पत्ति, लड़कियों के लिए स्कूल, विधवाओं का केश करतन निषेध और उनकी अवैध सन्तानों के प्रसव की व्यवस्था हेतु आश्रमों की व्यवस्था कर रहे थे, तब वहाँ से चलकर उत्तर में आ गए पेशवाओं और मराठों तक इस बात का कितना और कैसा प्रसार होता है कि रानी लक्ष्मीबाई 1853 में राजा गंगाधर की मृत्यु पर न तो मुंडन कराती हैं, न विधवा भेष धारण कर काशीवास. 19वीं सदी के उत्तरार्ध से कुछ वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुए इन सुधार आंदोलनों का प्रभाव, तत्कालीन राजे-रजवाड़ों पर अवश्य ही पड़ा होगा।

जितेन्द्र विसारिया ग्वालियर में रहते हैं. 
अध्यापन से जुड़े हैं.