हरीश रावत का नशा विरोध और नींबू पार्टी


वैसे हमें हरीश रावत जी की इन पार्टियों से कोई दिक्कत नहीं है। उनके पास इतने संसाधन हैं कि वह जो भी पार्टी करें लोग शामिल हो ही जायेंगे, लेकिन इन पार्टियों के पीछे की जो 'धूर्तता' है वह पहाड़ की चेतना को समाप्त करने का रास्ता तैयार कर रही है। मैं हरीश रावत के बेटे को ज्यादा नहीं जानता। उन्हें नशे के खिलाफ किसी आंदोलन में शामिल नहीं देखा। पहाड़ में हरीश रावत जी से पहले, हरीश रावत के समय और उसके बाद लगातार गांवों तक पहुंचाई जा रही शराब के खिलाफ किसी आंदोलन में खड़े भी नहीं देखा। जब हरीश रावत ने पूरे राज्य में एक ही ब्रांड की शराब 'डेनिश' चलाई तो तब भी मैंने कहीं उन्हें नहीं देखा। हो सकता है वह धर्मात्मा प्रवृत्ति के हों। चुपके से अपना काम करते हों। हो सकता है नशे के खिलाफ जंग लड़ रहे हों, लेकिन उन्होंने अपने पिता को इस जंग में क्यों शामिल किया यह बात समझ से परे है। 
-चारू तिवारी


उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जी। बहुत सुलझे हुये नेता। मधुर बोलते हैं। जब वे बोलते हैं तो उनके दूसरे शब्द के मुंह से बाहर आने का इंतजार करना पड़ता है। बहुत कम नेता हैं जो इतना मधुर बोलते हैं] लोगों से मिलते हैं। किसी से 'खुदंक' भी हो तो जाहिर नहीं होने देते। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत से लेकर सुप्रसिद्ध जन गायक नरेन्द्र सिंह नेगी तक को 'आम पार्टी' में अपने हाथ से आम काटकर खिला सकते हैं। और भी बहुत सारी खूबियां हैं हरीश रावत जी में। अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही। आज उनकी एक पोस्ट पढ़ी तो मन हुआ कि कुछ बातचीत कर ली जाये। हरीश रावत जी ने अपने फेसबुक वाॅल पर बताया कि वे 30 दिसंबर को रुद्रपुर के एक बड़े होटल में 'नींबू पार्टी' देने जा रहे हैं। पहले उस पोस्ट पर एक नजर जो उन्होंने लिखी है-

"दोस्तो आप सबको मालूम है कि मेरे पुत्र आनंद रावत ने नशे की बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ एक अभियान छेड़ा हुआ है और वर्षों से समर्पित भाव से वो काम कर रहा हैं मैंने सोचा एक बाप होने के नाते मैं भी उनके अभियान में योगदान दूं। उसी दिशा में किच्छा के गुड़ व पहाड़ी नींबू की संग, जसपुर की कचरी, लोहाघाट और ओखलकांडा के माल्टा व रुद्रपुर के अमरूदों के संग, इस थीम को लेकर मैंने 30 दिसंबर को रुद्रपुर के लैक पैराडाइज़ में एक नींबू, गुड़ चाय व कचरी पार्टी आयोजित की है। आप सादर आमंत्रित हैं। मौसमी फलों के स्वाद के साथ नशे के खिलाफ जंग का ऐलान करिये।"

इस पोस्ट से आप समझ ही गये होंगे हरीश रावत और उनके सुपुत्र आनंद रावत उत्तराखंड में फैली नशे की प्रवृत्ति के प्रति कितने 'चिंतित' हैं। वे रुद्रपुर में पार्टी कर पहाड़ के फलों को प्रमोट करने का कितना नेक काम कर रहे हैं। हमारे कई बुद्धि़जीवी साथियों ने इस पहल की प्रशंसा की है। हरीश रावत जी ऐसी पार्टी पहली बार नहीं कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली, देहरादून और हल्द्वानी में वह 'आम पार्टी' कर चुके हैं। जब दिल्ली में थे हर साल ऐसी पार्टी करते थे। पिछले साल से उन्होंने एक नई पार्टी शुरू की है, उसका नाम है "काफल पार्टी।"  इस तरह से हरीश रावत ने लगातार लोगों से अपने को जोड़ने की कोशिश की है।

वैसे हमें हरीश रावत जी की इन पार्टियों से कोई दिक्कत नहीं है। उनके पास इतने संसाधन हैं कि वह जो भी पार्टी करें लोग शामिल हो ही जायेंगे, लेकिन इन पार्टियों के पीछे की जो 'धूर्तता' है वह पहाड़ की चेतना को समाप्त करने का रास्ता तैयार कर रही है। मैं हरीश रावत के बेटे को ज्यादा नहीं जानता। उन्हें नशे के खिलाफ किसी आंदोलन में शामिल नहीं देखा। पहाड़ में हरीश रावत जी से पहले, हरीश रावत के समय और उसके बाद लगातार गांवों तक पहुंचाई जा रही शराब के खिलाफ किसी आंदोलन में खड़े भी नहीं देखा। जब हरीश रावत ने पूरे राज्य में एक ही ब्रांड की शराब 'डेनिश' चलाई तो तब भी मैंने कहीं उन्हें नहीं देखा। हो सकता है वह धर्मात्मा प्रवृत्ति के हों। चुपके से अपना काम करते हों। हो सकता है नशे के खिलाफ जंग लड़ रहे हों, लेकिन उन्होंने अपने पिता को इस जंग में क्यों शामिल किया यह बात समझ से परे है।

क्योंकि हरीश रावत जी तो हमेशा उत्तराखंड में नशे के व्यापार को ही आर्थिकी का आधार मानते रहे हैं। वे न केवल शराब के प्रबल समर्थक रहे हैं, बल्कि उन्होंने पहाड़ में भांग की खेती करने की बात भी कही है। जिस राजनीतिक रास्ते से पहाड़ में शराब आई है उसी राजनीतिक धारा का प्रतिनिधित्व भाजपा-कांग्रेस करती रही है, जिसके नेता हरीश रावत हैं। हरीश रावत जी जब 1980 में पहली बार सांसद बने तो उस समय पूरा पहाड़ नशे की गिरफ्त में था। सुरा-लिक्वड के व्यापारी अवैध तरीके से नशे को पूरे पहाड़ में फैला रहे थे। कांग्रेस के ज्यादातर नेता-कार्यकर्ता इस धंधे से जुड़े थे। कई ब्लाॅक प्रमुख, जिला पंचायत अध्यक्ष-सदस्य नशे के इस कारोबार में शामिल थे। उस समय के लीसा चोर, लकड़ी चोर, खनन माफिया, जंगल माफिया राजनीतिक संरक्षण के साथ राजनीति में आगे बढ़े। कई तो बाद में विधायक और उच्च संवैधानिक पदों पर भी पहुंचे।

हमें यह पड़ताल भी करनी होगी कि आखिर इन सबको पनपाने वाले लोग कौन थे? अल्मोड़ा में अस्सी के दशक में शराब विरोधी आंदोलन के दौरान एक नारा लगा- 'दो मंजले में हाथी है, डाबर वाला पापी है।' दुर्भाग्य से हरीश रावत जब प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा स्थित होटल मैनेजमेंट संस्थान का नाम उसी सुरा व्यापारी के नाम पर रखा। जो लोग नशे के व्यापारियों के नाम पर शिक्षण संस्थानों का नाम रख सकते हैं वे किस नशे के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं यह समझा जाना बहुत जरूरी है। नहीं तो इन 'पार्टियों' के माध्यम से हमारी एक पूरी पीढ़ी को छलने का काम जारी रहेगा। 'नशा नहीं, रोजगार दो' आंदोलन के समय एक नारा दिश गया- 'जो शराब पीता है वह परिवार का दुश्मन है, जो शराब बेचता है वह समाज का दुश्मन है, जो शराब बिकवाता है वह देश का दुश्मन है।' शराब बिकवाने वाली सरकारें और पार्टियां देश ही नहीं मानवता की भी दुश्मन हैं। हमारे संविधान की धारा-47 कहती है कि शराब या नशे को लागू करना संविधान विरोधी है। इस लिहाज से ये लोग संविधान विरोधी भी हैं। हरीश रावत न केवल ऐसी सरकारों में रहे हैं, बल्कि वे कांग्रेस के महासचिव भी हैं। उसी कांग्रेस की जो अपने चुनावों में शराब और पैसे का जमकर प्रयोग करती है। उस चुनाव अभियान में हरीश रावत भी शामिल रहते हैं उनके सुपुत्र 'नशे के खिलाफ जंग' लड़ने वाले आनंद रावत भी। भाजपा के राष्ट्रभक्तों का हाल तो आपने देख ही लिया है। त्रिवेन्द्र रावत ने न केवल मोबाइल गाड़ियों से शराब पहुंचाई है, अब हमारी जमीनों का सौदा भी कर दिया है। इसलिये राजनीति में आई 'पार्टियों' की इस 'धूर्तता' को समझें। हरीश रावत का यह आमंत्रण तो वैसा है जैसे बिल्ली को दही का पहरेदार बना देना। वाह! 'डेनिश' भी तुम ही लाओगे, शराब व्यापारी के नाम पर संस्थान भी तुम ही खोलोगे, नशे के खिलाफ  तुम ही नायक बनोगे। निर्मल जोशी की एक कविता के अंश-

दावेदार......... दावेदार....... सुन जंगल के दावेदार......
उन्हीं का बेटा फौज में अफसर, उन्हीं का बेटा थानेदार,
उन्हीं का बेटा संसद में है, उन्हीं का बेटा ठेकेदार।

उत्तराखंड के जन सरोकारों को लेकर हर मोर्चे पर सक्रिय, चारू तिवारी वरिष्ठ पत्रकार हैं।