यात्रा: एक नदी से दूसरी नदी की क्षेम-कुशल (तीसरी किस्त)

यह यात्रा संस्मरण मैंने पश्चिमी रामगंगा के इलाकों में घूमते हुए लिखा है। मकसद स्पष्ट है कि मैं पूर्वीरामगंगा के इलाके से आता हूँ, मैंने सोचा कि क्यों न यात्रा के बहाने दोनों नदियों के सामाजिक, पर्यावणीय, ऐतहासिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक सन्दर्भों को वर्तमान के आईने में देखा जाय। पता नहीं इसमें कहाँ तक सफल हो पाया पर इसी के मध्यनज़र यह एक कोशिश की है। इसे मैं पत्रशैली में लिख रहा हूँ जिसको मैंने नाम दिया है 'पूर्वी राम को पश्चिमी रामगंगा की कुशल बात'। यह रही तीसरी किस्त..




पिछली किस्त से आगे..
चैखुट की पारबती सौरास न जान् बलि 
मासी का परताप लौंडा स्कूल नै जान बलि

ये वही रंगीली गेवाड़ है जिसेे मैं जागर से लेकर लोक कथाओं में बचपन से सुनता आ रहा था। पर कौन जानता था कि मैं एक दिन यहाँ आंऊगा और इस वक्त में अपने लोक गायक नैननाथ रावल की आवज में यह चांचरी सुनते हुए चैखुटिया की तरफ बढ़ रहा हूँ। यहाँ भिकियासैंण से हमने चैखुटिया की यात्रा आरंभ की। भिकियासेंण से पश्चिमी राम के दूसरे किनारे से यात्रा शुरू की। स्यालदे वाली सड़क और गेवाड़ घाटी की तरफ जाने वाली सड़क के बीच में पश्चिमी रामगंगा बहती है। बहुत शान से दोनों किनारों पर असंख्य गाँव समेटे।

भकियासेंण से दौला 30 किलोमीटर, चैखुटिया 28 किलोमीटर, केदार नौ किलोमीटर और मासी 14 किलोमीटर है। मानीला के धूरे में जहाँ बुरांश खिल आया था वहीं घाटी के लोग भी लाल रंग से वाकिफ होने लगे थे। सेमल का चटक फूल अब निकला कि तब निकला वाली भंगिमा में था। पीला केशिया सड़क किनारों पर लगभग जोगी सा वेशधर के  खिला हुआ था। रणेल या रड़्यो अभी चटख खिलने के मूढ में नहीं था। वह खिलेगा पर कुछ दिनों में वैसे भी घाटी का बुराँश तो रड़्यो ही हुआ।

पूर्वीराम तुम जानती हो ना मुझे लाल कितना पसंद है ? और हाँ मैंने थल में तुम्हारे ही किनारे पीपल के पेड़ के नीचे बैठे बूड़े खग्गाड़ भगनौलियों से गेवाड़ घाटी की महिला भगनौलियों के बारे सुना था। उन बुजर्गों के नाम थे 85 वर्षीय रूप राम , 82 वर्षीय दान सिंह , 76 वर्षीय मोतीराम। सुनो पूर्वी ये तुम्हारे अनाम बेटे है जिन्होंने तुम्हारे पानी का नीलापन गेवाड़ और गेवाड़ के लोककलारों ने अपने गेवाड़ को दानपुर-जोहार तक पहुँचाया। इन कलाकार ने एक दूसरे को ही नहीं जान पहचान कराई बल्कि अपने संस्कृति रीत रिवाजों को दूर दूर तक पहुँचाया । 

कालान्तर में जिन लोककलाकारों की हमने बेज्जती की वही एक समय हमारी मौखिक पंरपरा, शिक्षा और ज्ञान के सच्चे शिक्षक थे, जिन्होंने आपसी भाईचारे के साथ ही एक दूरसे को समझने जानने के लिए गीत रचे। कभी कभी सोचता हूँ वह न होते क्या हमारे पास स्मृतियां रह पाती? 

मैंने एक मानवविज्ञानी फिशर को पढ़ते एक पंक्ति देखी मनुष्य और जानवर को एक ही अन्तर सबसे ज्यादा एक दूसरे से अलगाता है, वह है कि मनुष्य अपनी स्मृतियों को अपनी नई पीढ़ी को हस्तांतरित करता है जो जानवर नहीं करता। हमें हमारी स्मृतियों को नये संन्दर्भों मे हस्तांतरित करने वाले यही पुरखे तो थे। 

मैंने जब गेवाड़ को देखा भी नहीं था तब मैं गेवाड़ को इन्ही लोक कथाओं के वाहकों से जानता था या इन्हीं गीतों से । जब मैं इन गीतोें को सुनता था तो लगता था कि मासी गाँव किसी धूरे में होगा पर मासी गाँव तो चैरस सेरों के आस-पास बसा गाँव है। मासी में हमने देखा कि पश्चिमी राम के किनारे पूर गेवाड़ घाटी का क्रिकेट मैच चल रहा था। और स्कूल इण्टर कालेज के लड़के भी स्कूल गोल करके रामगंगा के बगड़ में बैठे क्रिकेट देख रहे थे। मन हुआ कि कुछ देर गाड़ी रोक के बैठ लिया जाय और बचपन के दिनों को याद कर लिया जाय हम भी तो ऐसा ही किया करते थे।

बहरहाल हम यहाँ से मासी पहुँचे मासी क्या सुन्दर जगह है पर पूर्वीराम मै जानता हूँ जब जेठ आयेगा तो तुम्हारे बग्गड़ो कि तरह ही हवा के गर्म भभके पश्चिमी राम भी छोड़ती होगी। पर पूर्वी राम तुमने तो हमें मासी और चैखुटिया जैसे सेरे रक्बे नही बक्शे। तुम्हारी बहन और मेरी कैंजा अपने रहवासियों के लिए ज्यादा उदार है, पर मुझे तुम भी उतनी ही प्यारी हो जितनी अपनी ईजा। हाँ यहीं कहीं हिंदी के कथाकार मेरे प्रिय पंकज बिष्ट का भी पैतृक गाँव है। पूर्वी तुम्हें तो कोई ढ़ग का कथाकार भी नहीं मिला। पर कुछ एक जगह तो नदी का तल क्रेशरों ने यों खुरच दिया है कि पूरा का पूरा रेता उठा ले गये हैं। बगड़ पूरी तरह मिट्टी वाला दीख रहा है। यह लोकसंस्कृति का संपन्न इलाका है। 

इस वक्त हम चैखुटिया में है मासी से सीधी प्लेन सड़क है जो रंगीले सेरों से चैखुटिया तक पहुंचती है। यहाँ के भगनौलिया बहुत चर्चित रहे हैं। भगनौल के बारे मेरा मानना हैं भगनौल गायन लौकिक और शास्त्रीय परम्परा का मंजुल समन्वय है। इसे गाने वाले बड़े जानकार होते हैं  और त्वरीत आसुकविता व समय सापेक्ष अपनी बात को कहना जवाब देना जानते हैं।  इसीलिए भगनौल का अर्थ है नई कहन। भगनौल और बैर यह दोनों शब्द एक साथ ही प्रयुक्त होते हैं। भगनौल का आरंभिक पक्ष आशीष और आसल -कुशल से आरंभ होता है, उसके बाद यह कठिन  गणितीय , शास्त्रीय, लोक पहेलियों, किस्सों, कथाओं के सवालो का रूप लेता चला जाता है। भगनौल का सामाजिक पक्ष यह कि इसमें जहाँ एक तरफ उपजीव्य ग्रंथो (गीता महाभारत पुराण आदि ) से  सवाल जवाब  होते हैं वहीं लोक के प्रचलित मिथकों किस्सों से किस्सागो कथाओं से दृष्टान्त उठाये जाते हैं। यहाँ भगनौल में कोई वर्ग नहीं होता, न कोई वर्ण, यहाँ सीधा शास्त्रार्थ  होता है। सभी जातियों से गायक होते हैं पर अन्य जातियों के अपेक्षा शिल्पकार (उत्तराखंड में अभिजातीय तपकों द्वारा माने जाने वाली जातियां ) ज्यादा होते हैं। जो लोक के साथ साथ आसुकविता के माहिर तुर्रम और आवाज के धनी होते हैं। भगनौल सामाजिक ,राजनैतिक , उपदेशात्मक , नीतिपरक होते हैं, मूल बात को  गायन में ही कहना होता है। कभी कभी गायक भूमिका बांधता है तो भगनौल के बीच बातचीत भी होती रहती है। 

दरअसल यह किस्सागोई और चैपालों की कुमाउनी फॉर्म है किसी दौर में यह गायन बहुत पापुलर रहा होगा। पूर्व में गेवाड़ के भगनौलिया पूरे कुमाऊ में सबसे जानकार और तुर्रम आसुकवि माने जाते थे। यहाँ से महिलाएं भी भगनौल गाती थी। मैंने लोक संग्रहक और जसिराम जसदा के युवा साथी राजेन्द्र से बात की तो पता चला कि अब भी यहाँ  कुछ गाँव  की महिलाएं भगनौल गायन करती है। उन्होंने बताया कि नौ गाँव, तड़ाताल, बेड़िया, बसर की महिलाएं अभी भी गाती है, पर उनका कोई रिकाॅड नहीं है। 

यहाँ एक चम्तकारिक व्यक्तित्व रहता है जिसका नाम है जसिराम। जसदा पूर्व में नाट्य प्रभाग से जुड़े रहे और नैनीताल में गिर्दा के साथ रहे। जसिराम मेरे दोस्त है और पुरखे भी। जो खुद में इस गेवाड़ घाटी के संस्कृति के चलते फिरते संस्थान है। जब मैं चैखुटिया पहुँचा तो सबसे पहले अपने काम निपटा के मैंने जस दा को ही फोन किया पर वे भाभर गये हुए थे। उनकी कापी किताबों की दुकान पर उनके परिवार के लोग बैठे थे। थोड़ा सा उदास हुआ पर उदासी तब काफूर हो गई जब पता चला कि मुझे जिस आदमी से संदीप दा ने मिलाया और कहा कि यह अनिल कार्की है तो अचनाक वह बोल पड़े "अच्छा मैं जानता हूँ, ये वही हैं जो लोकसंस्कृति पर काम करते हैं।" वे बोले अपका नम्बर मेरे पास था, जस दा ने कहा था कि कभी अनिल से बात करो। फिर जस दा से बात हुई तो मैं राजेन्द्र भाई का एक इन्टरव्यू ले आया। 

गेवाड़ में भैरव देवता और उनका टम्टाओं के साथ लगाव व हिफाजत की गाथा तो पहले सुनी थी पर इस बार उनके द्वारा किये गये काम से पता चला कि गेवाड़ में दबे कुचले तपके का एक मजबूत हिफाजती देवता भी है। मेरा यह भ्रम टूट सा गया कि स्तुति बंदनों में केवल ठाकुरों राजाओं का ही और ब्राहमणों की जिक्र मिलता है। पहली बार मुझे यह दस्तावेज मिला तो मैं खुश हो गया। राजेन्द्र जी और जसिराम जी ने इसे संरक्षित करने में बहुत मेहनत की है। जसिराम तो उस गेवाड़ के चलते फिरते संस्थान पर उन्हें जाने कब इसका सम्मान मिलेगा, वैसे भी काम करने वाले को क्या सम्मान। कुछ प्रोग्रेसिव लोग मुल्ला बनके चिल्लाते रहते हैं किचड़ उछालते है पर वे विचार में जीवन देखने के आदी हो चुके हैं उन्हे जीवन में विचार नहीं दिखते। मैं उस थोड़े से अंश को यहाँ दे रहा हूँ शायद रूचिकर लगे।


"प्रथम उत्पत शिवजटा से होई, तबते कहाँ आये...चीन तो महाचीन में जागो, आदेश तेरो चीनिया गुरू का आदेशम, लामा गुरू का आदेशम्, सियासैंण को आदेशम, तिमरौंसैण का आदेशम,अलमी अनवाल को आदेशम, बार बीसी उनियालि, बार बीसी कठाली को आदेशम, गेरू का खाडु का आदेशम, हीलू-तीलू बाकरी का आदेशम, बार बीसी खाड़वान का आदेशम, लाल छड़ी का आदेशम। आदेशम शक्ति उड्यार को आदेशम, चवलाचैरी का आदेशम, कुसिर बगड़ का आदेशम, पंथी भगवान को आदेशम, आदेश तेरो सिरगुरबार का आदेशम, कोठ्यार बाड़ को आदेशम, सात भाई टमटा को आदेशम, लहु टमटों, बचु टमटौं, रैंले रिमत टमटों को आदेशम, आदेश तेरों उदतु टमटा को आदेशम। जिन टमटों लैं मोल मारें-दाम साठें, गैली गेवाड़ को ले आये। टमटा को चेली को पुज्याणी, ब्वारी को बुलाणी, आदेशम तेरों काशी भण्जों का आदेशम। आदेशम डोबरी मण्डप को आदेशम, आदेशम नथ्थों-दत्तों को आदेशम.... जिननों ने तेरों नाम को डिकरों जो बनायो........।’’

इस के बड़े सन्दर्भ जिन पर कभी विस्तार से लिखूंगा। इस अशं से कोई भी लोकविद् समझ सकता है कि क्या माईने है इस सब के। यह बहुत रोचक है । बारहाल चैखुटिया में यह सब मिलेगा इसकी उम्मीद कम थी। इतने कम समय में पर मुल्ला मस्ज़िद ढ़ूढ़ लेता है। मेरा काबा मेरी कांशी है जसराम और राजदा जैसे लोग। चैखुटिया रमझोर बगड़ में बैठा है रमाइलो छ भौत। ओ पूर्वीरामगंगा जैसे तुम्हारी जोहार घाटी संमन्न है वैसे ही मुझे कुमांऊ की कुछ घाटियां बहुत आकर्षित करती है, जिनमें बोरारों घाटी, काली घाटी, रामघाटी, पनारघाटी, गोरीघाटी, सरयूघाटी और गेवाड़ घाटी तो विशेष है ही।

पूर्वी राम सुनो यह सब बात एक तरफ और मेरी मच्छी खाने की लत एक तरफ  मैं  चौखुटिया के बाजार में दुकानों में पूछ-पूछ के थक गया कि मच्छी कहाँ  मिलेगी? जब पुलपार पहुँचा तो एक छोटे चाय खोमचे पर मच्छी की खूश्बू नाक में चली गयी, मैंने कहा यहाँ जरूर मच्छी बन रही होगी, पूछा तो खोमचे वाले ने मना कर दिया। बाद में पता चला कि यहाँ वह बड़ी गूंछ मछली के मारने के बाद जो मुकदमेंबाजी हुई उसके बाद मच्छी अब बाजारों में नहीं आती। आती भी है तो लोग खरीदने में हिचकते है बेचने वाले डरते हैं। मुझे पंरम्परागत मछुवारों से सहानुभूति है क्योंकि वे कभी अनियंत्रित शिकार नहीं करते। जबकि पूर्वीराम गंगा तुम्हारे बगड़ में तो रात दिन लोगबाग कारतूस डायनामाईट फोड़ते रहते हैं जिन्होने परम्परागत मछुवारों के रोजगार को भी छीन लिया है। 

मैं भी तो मछैर ही हुआ, कक्षा पाँच में पहली बार जब मैंने तीस मीटर के लायलाॅन की रस्सी पर 70 एम एम के तांत लगा के सुरके बनाये थे उस समय पिता जिन्दा थे, उन्होनें कहा था मैं अब मछैर हो गया हूँ। पहले दिन एक आंसली मछली सुरके में लटकी देख मुझे कितनी खुशी हुई थी तुम नहीं अन्दाजा लगा सकती। जीवन में पहली बार किये जा रहे काम के अनुभव कितने रोमांचक होते है यह मैं बखूबी जानता हूँ।

बहरहाल मैं अब अपने मित्र कहानीकार और कवि खेमकरण से मिलने चैखुटिया डीग्रीकालेज के गेट पे जा रहा हूँ। वह गेट पर ही मिलने आ गया है और हाँ ये वही खेम है जो कभी किसी कम्पनी में मजदूर था अपने संघर्ष से वह आगे बड़ा। इस बार वह संजीदा युवक लगा कोट पेंट में कसा हुआ। हाँ, हम कसकर गले मिले। खेम ने अपने कोट के जेब में हाथ डाला और मुझे चार बादम के दाने व दो काजू के दाने दिये। जाते-जाते एक बादाम का दाना मेरी हथेली मे चेप भी गया। मैने उससे कहा यार ज्यादा मत खिला कुत्तों को खीर नहीं पचती। 

हम चांदी खेत आ गये हैं मैने लगभग सभी घाटियों खेतोे के सेरों के नाम नोट करने आरंभ किये है, यह नाम इस बार जुड़ा। लगा पुरखे भी कितने दार्शिनक रहे होगें जमीनों को चांदी खेत कह दिया। मिट्टी को चाँदी कहने वाले पुरखे इसी घाटी मे नहीं सभी जगह है। बोरारों में तो एक सेरे को सुनाड़ी कहा जाता है मतलब सोने के खेत, चैखुटिया और मासी में एक बात बहुत बुरी लगी यहाँ के लोगों ने पूरे सेरों के बीच में भद्दे सिमेन्ट के मकान बना के उसकी सुन्दरता को खत्म कर दिया है। जल्दी चांदी खेत को सिमंेन्ट खेत में बदल दिया जायेगा। बारहाल मैंने खेम से विदा ली। साहित्यिक बिरादरी बहुत बढ़ गई है इस बीच द्ववराहाट कन्या इंटर कालेज में कहानीकार अमीता प्रकाश जी का स्कूल देखने का भी उनसे वादा है सो चैखुटिया खाना खा के टीम द्वाराहाट को रास्ते लगी।


चोखुट की पारबती सोरास नै जान बलिमासिक परताप लौड़ा स्कूल नै जान बलि...

..जारी


अनिल कार्की, उत्तराखंड के कुमाऊँ के पहाड़ों में बसे समाज की ठसक लिए हिंदी के युवा कवि, कहानीकार और लेखक हैं। अपने अंचल की भाषा, संस्कृति, ज्ञान और समूचे जीवन को अपने कथन की विशिष्ट शैली में पिरोए उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नयी भाषा से रूबरू कराया है। anilsingh.karki@gmail.com पर उनसे संपर्क किया जा सकता है।