तेल की राजनीति और अमेरीकी तिकड़म

"..70 के  दशक में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने सोने को डॉलर का आधार मानने से इंकार कर दिया। इसके साथ उन्होंने सऊदी अरब को अपना तेल व्यापार डॉलर में चलाने के लिए राजी कर लिया बदले में वहां के शाह को हथियार और सुरक्षा की गारंटी प्रदान की। इससे तेल व्यपार डॉलर में होने लगा और कई देशो ने अपना विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में संचित किया। इस प्रकार डॉलर एक शाक्तिशाली मुद्रा के रूप  विश्व में उभरा. इसकी वजह थी कि अधिकांश देशों में तेल ही सबसे बड़ा आयातित माल था।.." 

- कुंदन


बहुत पहले द्वितीय विश्व युद्ध में ही ब्रिटिश अधिकारीयों ने यह घोषित किया था की विश्व पर अधिपत्य की इच्छा रखने वाली किसी भी शक्ति के लिए मध्य-पूर्व का तेल एक वरदान है। यहाँ विश्व के तेल भंडार का दो-तिहाई तेल मौजूद है। जिसका उत्पादन काफी कम लागत पर किया जा सकता है। इसके साथ-साथ यहाँ प्राकृतिक गैस का भी विशाल भंडार मौजूद है. तेल और प्राकृतिक गैस के ये भंडार ऊर्जा के ऐसे स्त्रोत हैं जो आज औद्योगिक विश्व के लिए अनिवार्य हो गयें हैं.

इसलिए आने वाले समय में यह तय था की साम्राज्यवादी देशों के बीच आपसी प्रतियोगिता का केंद्र रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ये क्षेत्र होंगे। इसलिए  2001 में अफगानिस्तान और 2003 में इराक हमला कुछ नहीं बल्कि 1980 में जिमी कार्टर की गयी घोषणा की और एक पहलकदमी थी. जिसमे कहा गया था की अमेरिका खाड़ी के देशो के तेल के भंडार को अपने राष्ट्रीय हित्त के लिए इस्तेमाल करेगा और इसके लिए सैन्य शक्ति के इस्तेमाल से भी नहीं चूकेगा। इसके साथ-साथ वह मधय-पूर्व के देशों को इस बात के लिए राजी करेगा की वे अपने ऊर्जा भंडारों को विदेशी निवेश के लिए खोल दें। 

इससे ये साफ़ होता है की सद्दाम का गुनाह, न तो कुवैत पे हमला करना था न ईरान से दस वर्षीय युद्ध लड़ना था (जिसमे अमेरिका ने उसका साथ दिया था) और नहीं अपनी ही कुर्द जनता का नरसंहार करना था बल्कि उसका गुनाह था. असल में इस क्षेत्र में अपनी स्वायत्तता बरकरार रखना था।सद्दाम ने 1973 से लेकर 2003 तक अपने सभी तेल भंडारों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। तेल उद्योग के विश्लेषक अन्तोनिअ जुहास्र ने अल-जजीरा चैनल को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा था "2003 के हमले और कब्जे से पहले अमेरिका और पश्चिमी तेल कंपनीयां इराक के तेल बाजार से बाहर थें .… लेकिन हमें इस हमले, कब्ज़े की करवाई का शुक्रियादा करना चाहिए अब कंपनियों के लिए पहली बार तेल का बाजार खोल दिया गया है।"

तेल और प्राकृतिक गैस के लिए साम्राज्यवादी देशों की आपसी प्रतियोगिता

तेल के बारे में यह बताना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका आज भी इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता है और 2010 तक सबसे बड़ा आयातक देश था. जबकि चीन 2001 में जापान को पछाड़ कर दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश बन चुका था. पूरा यूरोप (इंग्लैंड और नार्वे को छोड़कर) पूरी तरह से तेल के आयात पर निर्भर है। हम यह समझ सकतें हैं की साम्रज्यवादी देशों की प्रतियोगिता की दृष्टि से इस क्षेत्र का रणनीतिक रूप से खास महत्व है। इस पर नियंत्रण से अमेरिका साम्रज्यवादी देशों को तेल के लिए खुद पर निर्भर बनाकर एक हद तक साम्रज्यवादी प्रतियोगिता को अपने पक्ष में झुका सकता है (बहरहाल पूरी तरह से समाप्त कभी नहीं कर सकता). 

इसलिए 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' के लिए इन क्षेत्रों पर हमले का मकसद सिर्फ तेल की अपनी आवयश्कता की पूर्ति या अत्यधिक मुनाफा कामना ही नहीं है बल्कि साम्राज्यवादी देशों की आपसी प्रतियोगिता इन प्रयासों की तीव्रता का कारण है। यहाँ तक कि चीन जैसे देश जो निर्यात के लिए पहले से ही अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं, तेल के लिए भी अमेरिका पर निर्भर रहेंगे। 

यही नहीं रूस का अमेरिका के साथ, यूक्रेन को लेकर हाल का विवाद कुछ नहीं बल्कि इसी प्रतियोगिता का एक हिस्सा है। जिसमें अमेरिका का लक्ष्य रूस के द्वारा सयुंक्त यूरोप को की जा रही प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को रोकना है। वे आपस में सीरिया को लेकर इसी प्रतियोगिता के तहत 2011 से एक छद्म युद्ध कर रहे हैं। और अफगानिस्तान में किया गया हमला और सत्ता परिवर्तन इसी परियोजना का हिस्सा है। लेकिन तेल अपने उपयोगी गुण (उपयोगी मूल्य) के कारण ही अमेरिकी सम्राज्यवाद के लिए महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि तेल का डॉलर के उतार चढ़ाव के साथ भी खास जुड़ाव है।  

डॉलर, यूरो तथा अन्य मुद्राओं की बीच प्रतियोगिता : साम्रज्यवादी प्रतियोगिता का एक आयाम

70 के  दशक में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने सोने को डॉलर का आधार मानने से इंकार कर दिया। इसके साथ उन्होंने सऊदी अरब को अपना तेल व्यापार डॉलर में चलाने के लिए राजी कर लिया बदले में वहां के शाह को हथियार और सुरक्षा की गारंटी प्रदान की। इससे तेल व्यपार डॉलर में होने लगा और कई देशो ने अपना विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में संचित किया। इस प्रकार डॉलर एक शाक्तिशाली मुद्रा के रूप विश्व में उभरा. इसकी वजह थी कि अधिकांश देशों में तेल ही सबसे बड़ा आयातित माल था। 

चुकी अब डॉलर विश्व की रिज़र्व मुद्रा थी इसलिए प्रत्येक देश अब डॉलर आयत करने के लिए मजबूर हो गयें। इसका मतलब था हर देश को अपने सामान और सेवाएं अमेरिका को देनी पड़ती थीं, जो अधिक से अधिक डॉलर छाप कर (क्यूोंकि सोना अब डॉलर का आधार नहीं था) थोड़ी सी लागत में इनका आयात करा सकता था। यही वह कारण है की घाटे के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यस्था बिना किसी प्रतिकूल प्रभाव के चल रही है। ऋणग्रस्त होने के बावजूद तेल व्यापार का डॉलर में बने रहना इसे जिलाये हुए है।

इसलिए तेल एक उपयोगी वस्तु के रूप में ही नहीं बल्कि इसका व्यापार डॉलर में चलता रहे यह भी अमेरिकी साम्रज्यवाद के लिए आवयश्क है। सद्दाम हुसेन का सबसे बड़ा गुनाह था की उन्होंने अपने तेल व्यपार को 6 नवम्बर २००० में डॉलर के बदले यूरो में प्रारंभ किया। भले ही अमेरिका और दुनियाभर की मीडिया इस पर चुप रही मगर अमेरिकी प्रशासन यह जानता है कि अगर यह कदम ईरान, वेनेजुएला और रूस की ओर से ये उठाया गया तो यूरो एक शाक्तिशाली मुद्रा बन कर उभरेगी। 

इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की २००० में इराक के इस कदम के बाद यूरो जो 82 सेंट था, डेढ़ गुना शाक्तिशाली हो गया। अगर दुनिया भर का तेल व्यापार यूरो में चल पड़े तो अमेरिका न सिर्फ साम्रज्यवादी प्रतियोगता में पिछड़ जाएगा बल्कि उसकी अर्थवयवस्था अर्जेंटीना की तरह नेस्तोनाबूद हो जाएगी। 

2003 में इराक पर हमला अमेरिका द्वारा यूरोप के साम्राज्यवादी हित पर हमला भी था। यही वह कुंजी है जिससे हम समझ सकतें हैं की क्यों फ्रांस और जर्मन (यूरो मुद्रा के प्रतिनिधि देश) द्वारा इस हमले का विरोध किया गया और क्यों इस हमले में न केवल ब्रिटेन का बल्कि स्पेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे डॉलर के मामले में समृद्ध देशों की भी सहायता थी। अतः साम्राज्यवादी देशों के बीच शांतिपूर्ण संबंध स्थापित होने की घोषणा करने वाली थेसिस का खोखलापन साफ है। 

लेनिन के अनुसार साम्रज्यवादी संघो और साम्राज्यवादी राष्ट्रों के बीच लगातार आपसी प्रतियोगिता साम्रज्यवादी युग का अनिवार्य गुण है, इराक पर हमला लेनिन की बात का पुख्ता प्रमाण है। आगे हम देखेंगे की कैसे यह प्रतियोगिता नए रूप लेती है और विश्व राजनीती को संचालित करती है।

2003 के मध्य में ईरान ने  डॉलर के अधिपत्य से खुद को मुक्त करते हुए तेल के निर्यात के भुगतान के लिए यूरो को मंजूरी दी। अमेरिका का अगला शिकार अब ईरान था उसने ईरान पर परमाणु हथियारों के कार्यक्रम चलाने का आरोप लगाया। अब ईरान अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों से जूझ रहा है। शुरुआती दौर में इराक के तेल भंडारों के लिए सिर्फ अंपने यहां के पांच इजारेदार कंपनी को ही कंट्रैक्ट में शामिल किया था यहां तक इग्लैंड की भी इसमें हिस्सेदारी नहीं थी। लेकिन तेल कोई तैयार मॉल नहीं है बल्कि सुन्नीबहुल क्षेत्र में जनता द्वारा कड़े प्रतरोध के कारण इराक के तेल का उत्पादन वांछित स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा था। 

इसके साथ बाथ पार्टी और अन्य कई गुट अमेरिकी सेना के खिलाफ लगातार छापामार युद्ध चला रहे थे। इराक में युद्ध से मरने वाले अमेरिकी सैनिको की संख्या 4801 है जबकि कम से कम 14,55,000 इराकी युद्ध में मारे गयें हैं। मजबूरन इन समस्यायों से निपटने के लिए अमेरिका को न केवल यूरोप की साम्रज्यवादी शक्तियों से बल्कि चीन और रूस जैसे पारम्परिक प्रतिद्वदियों से भी इराक तेल क्षेत्र को साझा करना पड़ा। 

रूस की इस क्षेत्र में तीन बड़ी कंपनिया गज़पोर्म  निफ्ट ,लुकआयल , रोस्नेफ्त ने इराक में भारी निवेश किया है। मगर अफगान पर हमला रूस के गैस पाइप लाइन के प्रसार को रोकने तथा इसके वजाय अमेरिकी नियत्रण में लेने का एक प्रयास है इसी तरह अमेरिका ने रूस के आस-पास के क्षेत्रों में नाटो के सैन्य कैंप खोले हैं। अब हाल में यह युद्ध मुद्रा के स्तर पर भी लड़ा जा रहा है। 

रूस और चीनी केंद्रीय बैंक एक ड्राफ्ट कर्रेंसी स्टाप एग्रीमेंट पर राजी हुए जिसके तहत द्विपक्षीय व्यापार घरेलु मुद्राओं में करने की अनुमति है जो अमेरिकी डॉलर पर उनकी निर्भरता को कम करेंगे। हाल तक रूस और चीन का द्विपक्षीय व्यापार डॉलर में चलता था। अभी हाल में 14 अगस्त को क्रीमिया में पुतिन ने कहा की वह अपने तेल और गैस को रूबल में बेचेगा क्योंकि ऊर्जा के क्षेत्र में डॉलर का एकाधिकार रूस की अर्थवयवस्था को नुकसान पहुंचा रहा है। 

निश्चय ही ये मौद्रिक नीतियां , युद्ध और आर्थिक प्रतिवंध साम्रज्यवादी देशों की आपसी प्रतियोगिता के ही भिन्न- भिन्न  आयाम है।

इसके साथ -साथ  साम्रज्यवाद की एक महत्वपूर्ण नीति रही है ऐसे क्षेत्रो में वहां के दलालो के साथ मिलकर अपने हितों के लिए तथाकथित जनतांत्रिक राज्य का गठन। 

इराकी संघीय राज्य का गठन

2002 में अमेरिका ने इराक पर हमला बोलने से पहले भावी इराकी परियोजना के लिए तेल और ऊर्जा पर कार्यकारी समूह की स्थापना की। इस समूह में प्रभावशाली इराकी प्रवासीयों या निर्वासितों को लिया गया। जो बाद में जाकर इराकी सरकार का हिस्सा बने। इस परियोजना का उद्देश था 'इराकी  तेल और ऊर्जा नीति के लिए ढांचागत मसौदा जो ऊर्जा नीति का आधार के रूप में इराकी संसद में विचारणीय है। कुल मिलकर इराक राज्य का गठन यहां अमेरिकी हितों की सुरक्षा के लिए किया गया था। यह कोई स्वतंत्र, संप्रभु राष्ट्र नहीं है जिसकी कोई अपनी स्वत्रंत नीति हो। यही अमेरिका का इराक को ‘सद्दाम की तानाशाही’ से मुक्त करा कर जनतंत्र स्थापित करने का मिशन था। 

यु.एस एनर्जी इनफार्मेशन एडमिस्ट्रशन के अनुसार इराक में 115 बिलियन वैरेल तेल सुरक्षित है जो सऊदी अरब और ईरान के बाद पुरे विश्व में तीसरे स्थान पर आता है। माना जाता है की आधुनिक विधियों का इस्तेमाल करने पर अधिक मात्रा में तेल पाया जा सकता है। अतिरिक्त तेल की मात्रा 45 बिलियन से 214 बिलियन वैरेल तक जा सकती है। कुछ गैर सरकारी संगठनो के अनुसार यह मात्रा 400 विलियन को पार कर सकती है ऐसा हुआ तो इराक दुनिया का सबसे बड़ा तेल स्त्रोत बन कर उभरेगा। फ़िलहाल हम यह समझ सकते हैं इराक में असीम संभवना होने के वावजूद एक दलाल राज्य का पुनर्गठन किया गया है जिसका काम साम्राज्यवादी हितों के लिए काम करना है तथा इराकी राष्ट्रीयता को कमजोर करना है। ऐसे इराकी संघीय राज्य के अगुआ थे नूरी अल मलिकी। आइये देखे ओबामा प्रशासन उनसे क्यों खफा है।   

नूरी अल मलिकी का गुनाह

नूरी अल मलिकी ने 2011 को इराक में मौजूद दसीयों हजार अमेरिकी फ़ौज को दण्डमुक्ति के कानून का रक्षा कवच पहनने से इंकार किया था। फलस्वरूप 2011 में इराक से अमेरिकी सैनिको को जाना पड़ा। लेकिन यह वापसी अल्पकालिक ही साबित हुई। दूसरी बात ऐसी ऊर्जा और तेल नीतियों को जो अमेरिकी हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं भारी जन दवाबों के कारण नूरी अल मलिकी सरकार संसद में पास नहीं करा पाई। इससे आगे क्षेत्र में शिया राजनीती के नाम पर ईरान से सीरिया को असद को मिलने वाली मदद मसलन शिया लड़ाके इराक के स्थल मार्ग का इस्तेमाल कर रहे थे।

अमेरिकी सरकार सीरिया में असद के खिलाफ विद्रोह करने वाली शक्तियों की मदद कर रही थी। उधर असद सरकार को जनता के साथ बड़े स्तर पर रूस और ईरान की मदद मिल रही थी। यह युद्ध अमेरिका और उसके गठ्वंधन में शामिल तुर्की और इसराइल के लिए बड़े महत्व का था क्योंकि अगर यहाँ रसिया का प्रभाव बढ़ता है तो अमेरिका प्रायोजित अरब गैस पाइप लाइन के विकल्प में रूस समर्थित सीरिया, इराक,ईरान से तुर्की होते हुए यूरोप जाने वाली पाइप लाइन का निर्माण किया जाएगा। इसमें इजराइल शामिल नहीं है मगर लेबनान को शामिल किया जाएगा। मतलब यह इस क्षेत्र में सीरिया, ईरान, रूस और चीन के गठबंधन को बढ़ावा दे रहा था। 

इसके साथ-साथ कुर्द जो परम्परिक रूप से, सद्दाम के जमाने से, अमेरिकी समर्थक रहे है वे कुर्द बहुल इलाके में जहां भारी संख्या में तेल के लिए विदेशी निवेश हुए हैं तेल के मामले में अपनी स्वायत्तता बरकरार रखना चाहतें थें. मतलब राजस्व को बगदाद सरकार के साथ साझा नहीं करना चाहतें थें. और अमेरिकी, फ्रांस, इंग्लॅण्ड के निवेशों को बिना बगदाद सरकार के इजाजत के मंजूरी देना चाहतें थें। 

कुर्दुस्तान रीजनल गोवेर्मेंट के ऐसे प्रयासों पर मलिकी सरकार ने संसद से कानून पास करा कर पानी फेर दिया। इसके तहत अमेरिकी इजारेदार तेल कंपनी एक्सान को मलिकी सरकार ने 2012 में वेस्ट क़ुरान -1 से निकल बाहर किया। इसके साथ-साथ रूस की कंपनिया लुकोइल,और गाजप्रोम ने इस क्षेत्र में भारी निवेश किया है। मलकी ने रूस से इसी वर्ष 4. 2 बिलियन डॉलर के हथियार समझौते पर हस्ताक्षर किया था। मलिकी सरकार का रूस और चीन की और झुकाव साफ था। 

इस प्रकार मलिकी सरकार एक प्रकार के केंद्रीकरण की और बढ़ रही थी। एक प्रकार का स्वायत कुरदुस्तान (इराकी राज्य से स्वायत न की सम्राज्य्वाद से स्वायत ) अमेरिकी सरकार की जरुरत है ताकि शक्तियों का इस प्रकार का बटवारा इराकी राज्य को कमजोर बना रहने दे और अमेरिका उस पर अपना दवाब बनाए रख सके। खंडित इराकी राष्ट्रीयता अमेरिका के लिए एक मुहमाँगा वरदान है। ऐसे इराकी राष्ट्रीयता को अपने शिया संकीर्णतावाद से मलिकी ने नुकसान पहुंचाया है। 

लेकिन किसी ऐसे राज्य का प्रतिनिधि जिसे साम्राज्यवादी नीतियों का प्रहरी बनाया गया हो और कर भी क्या सकता है। यह हम अपने यहां विदेशी निवेश और उसके साथ हिंदुत्व की जुगलबंदी के रूप में देख सकतें हैं। इस समय इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक एंड सीरिया का इराक पर धावा ही वह अवसर था जब मलिकी पर अमेरिका प्रधानमंत्री पद छोड़ने का दवाब बना सकता था और अब मलिकी अपना पद छोड़ चुकें हैं।

इस्लामिक स्टेट का इराक में उभार

मलिकी सरकार के प्रति गुस्सा इराकी जनता में मौजूद था। सिर्फ सुन्नी इलाकों में ही नहीं बल्कि सिया समुदाय में भी क्रोध मौजूद था। मजदूर हड़ताल के साथ अन्य जनता भी सड़क पर आ रही थी। ऐसे में बाथ पार्टी जो सुन्नी इलाको में लगातार छापामार प्रणाली से युद्ध चला रही थी कुछ हद तक साम्राज्यवादी शक्तियों को रोकने में कामयाब हुई। इस जनाक्रोश के लिए इराकी संसद कोई राजनितिक जगह नहीं देती। इराकी संप्रभुता (साम्राज्यवाद से मुक्ति) इसका तात्कालिक सरोकार है और इराकी राष्ट्रीयता इसका आधार है। ये दोनों चीज़े आपस में जुडी हुई हैं। 

मलिकी ने इसके बदले एक छद्म राजनीति की उन्होंने संप्रभुता के सवाल को अमेरिका बनाम रूस के सवाल से तथा राष्ट्रीयता के बदले शिया संकीर्णतावाद को अपना राजनीतिक आधार बनाना चाहा। लेकिन यह राजनीति मलकी सरकार नहीं बल्कि वह संसदीय संरचना पैदा कर रही है जो साम्राज्यवाद के आधीन है। अगर राष्ट्रीयता को अपना राजनीतिक आधार बनाया जाये तो साम्राज्यवादी देशों की बीच आपसी प्रतियोगिता संप्रभुता के लक्ष्य का एक लाभदायक संदर्भ बन सकती है। 

लेनिन के साम्राज्यवाद के विश्लेषण का एक राजनीतिक आयाम भी है। क्योंकि लेनिन एक कोरे सिद्धांतकार नहीं थें बल्कि उनका विश्लेषण साम्राज्यवाद से निपटने की रणनीति भी बताता है। अतः वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे की साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रिय मुक्ति का आंदोलन, अंतराष्ट्रीय मजदुर आंदोलन का ही एक हिस्सा है। अगर इस बिंदु को अपना आधार बनाया जाए तो इस्लामिक स्टेट का एक मूल्यांकन संभव है। मैं उन तथ्यों में नहीं जाऊँगा जिसके आधार पर इस्लामिक स्टेट को अमेरिकी साम्राज्यवाद से उसके सांठ-गाँठ की बात कही जा रही है। 

इस कथन के पक्ष और विरोध में काफी कुछ लिखा जा रहा है। ना ही इस बात में मुझे कुछ ताकत नजर आती है कि इससे साम्राज्यवादी हस्तक्षेप को वैधता मिलती है। इराक के सुन्नी समुदाय का राज्य के खिलाफ आक्रोश इराक में इस्लामिक स्टेट की सफलता का कारण बना। सीरिया में उसे साम्राज्यवाद की सहायता मिली फिर भी वहां उसे वह विजय नहीं मिली। आज निश्चय ही वह इराक में अमेरिकी फ़ौज के खिलाफ जंग लड़ रहा है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। मगर सीरिया से लेकर इराक तक के उसके अभियान में जिस बात में निरंतरता नजर आती है वह है, सीरिया और इराक दोनों जगह वह इन भिन्न राष्ट्रों की राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ भी खड़ा है। अंततः वह इराकी राष्ट्रीयता को कमजोर कर रहा। इस अर्थ में वह साम्राज्यवाद के लिए एक आधार पैदा कर रहा है।

(आलेख साभार मोर्चा पत्रिका)

 - कुंदन
kundan24april@gmail.com