फ्रांस ही नहीं, रूस से भी हुई ‘रिलाइंस’ की ‘डिफेंस डील’

"..हालाँकि रफ़ाल अब एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन इसके साथ ही जुड़ी एक और जानकारी काफ़ी लोगों के लिए रोचक हो सकती है कि ‘रफ़ाल डील’ के चलते वि​वादों में चल रही ‘रिलाइंस डिफेंस’ की ‘डिफेंस डील’ महज रफ़ाल बनाने वाली Dassault Aviation के साथ ही नहीं हुई बल्कि रूस की कंपनी Almaz-Antey के साथ भी हुई थी. इस समझौते से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस का दौरा किया था जिसका मक़सद दोनों देशों के बीच रक्षा समझौतों को मज़बूत करना बताया गया था.."

-रोहित जोशी

​भारत में काफी विश्वसनीय माने जाने वाले अखबार 'दी हिन्दू' के पूर्व संपादक और इस अख़बार समूह के चेयरमैन एन. राम की सिलसिलेवार सामने आ रही बेहद महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स ने रफ़ाल के मुद्दे को मौजूदा रा​जनीति का सबसे तीखा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है. हालांकि विपक्ष रफ़ाल मामले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार घेरने की कोशिश करता रहा है, लेकिन एक मझे हुए पत्रकार एन. राम के इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म ने मोदी सरकार को इस मुद्दे पर मय सबूत पूरी तरह घेर लिया है, जिससे बचने की कोई आसान राह सरकार के पास अभी नहीं दिख रही. एन. राम की इन रिपोर्टों ने बताया है कि रफ़ाल मुद्दा मोदी सरकार के लिए बड़ा सिर दर्द है और यह मुद्दा लगातार बना रहेगा.

हालाँकि रफ़ाल अब एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन इसके साथ ही जुड़ी एक और जानकारी काफ़ी लोगों के लिए रोचक हो सकती है कि ‘रफ़ाल डील’ के चलते वि​वादों में चल रही ‘रिलाइंस डिफेंस’ की ‘डिफेंस डील’ महज रफ़ाल बनाने वाली Dassault Aviation के साथ ही नहीं हुई बल्कि रूस की कंपनी Almaz-Antey के साथ भी हुई थी. इस समझौते से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस का दौरा किया था जिसका मक़सद दोनों देशों के बीच रक्षा समझौतों को मज़बूत करना था.

विनिर्माण और रखरखाव का यह सौदा 6 अरब डॉलर की क़ीमत का था. ख़ुद रिलाइंस डिफेंस ने इस सौदे की जानकारी दी थी. अपने अस्तित्व में आने के महज 8वें महीने, दिसम्बर 2015 में रिलाइंस डिफेंस की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है, "दोनों पक्षों ने साझेदारी के लिए, ​एयर ​डिफेंस मिसाइल सिस्टम्स.. रडार्स और ऑटोमेटेड सिस्टम्स… साथ ही भारतीय रक्षा मंत्रालय की ऑफसेट नीतियों को भी.. को चिन्हित कर लिया है..”

न्यूज़ ऐजेंसी रॉयटर्स की वैबसाइट ने भारतीय रक्षा मंत्रालय के सूत्रों हवाले से इस डील के बारे में लिखा था, "हवाई हमलों से देश के रक्षातंत्र को आधुनिक बनाने के लिए के लिए भारत सरकार ने पांच S-400 एयर डिफेंस सिस्टम्स, जिनकी क़ीमत 4.5 अरब डॉलर है, की खरीद की संस्तुति दे दी है."

​रिलाइंस की इस नई डील की शुरूआत भी रफ़ाएल की तरह ही भारतीय प्रधानमंत्री की रूस यात्रा के बाद हुई जिसका मक़सद दोनों देशों के बीच रक्षा समझौतों को मजबूत करना था.

एक नई-नवेली कंपनी को जिस तरह भारतीय रक्षा संबंधी सबसे बड़े सौदे एक के बाद एक दिए गए हैं, इससे फिर वह सवाल मजबूत होता है कि क्या वाकई मोदी सरकार रिलाइंस समूह को फ़ायदा पहुंचाने के लिए इन डील्स से HAL जैसी सरकारी कंपनियों को दूर रख कर ‘रिलाइंस डिफेंस’ का नाम आगे बढ़ा रही है? और फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांसोआ ओलांद का बयान तो इसका सबूत भी पेश करता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत सरकार ने ही रिलाइंस का नाम रफ़ाएल की डील के लिए आगे बढ़ाया था और ‘उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था’.

असल में रफ़ाल डील में पीएमओ के हस्तक्षेप और रिलाइंस ​डिफेंस को यह डील दिलाने के लिए बैटिंग करने का यह मामला इसलिए खुल कर बाहर आ पाया क्योंकि इस डील की शुरूआत यूपीए के दौर में ही हो गई थी. यह डील सरकारी कंपनी एचएएल के साथ होनी थी और डील की स्थितियों से यूपीए दौर के मंत्री वाकिफ़ थे. लेकिन रूस और दूसरे देशों के साथ जो डील्स हुई हैं उनकी शुरूआत ही मोदी सरकार के दौरान हुई. यहां कोई गुंजाइश ही नहीं थी कि अनुभवी सरकारी कंपनी एचएएल का नाम भी आगे बढ़ाया जाता, सो यह डील सीधे रिलाइंस डिफेंस के खाते में चली गई. लेकिन जो प्रश्न रफ़ाल डील पर हैं स्वाभाविक तौर पर वही प्रश्न इन डील्स पर भी बनते हैं.