क्या होगा 'डी कंपनी' का 'यू' (उत्तराखंड) इम्पेक्ट?

"..यह रिपोर्ट ऐसे वक्त में आयी है, जब देश में लोकसभा चुनाव तो आसन्न हैं ही, अजीत डोभाल के बड़े पुत्र शौर्य डोभाल के लिए भी उत्तराखंड में सियासी ज़मीन तैयार की जा रही है। शौर्य पिछले तकरीबन एक साल से पौड़ी लोकसभा सीट पर रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा कार्यक्रमों में सक्रियता बनाए हुए हैं। अजीत डोभाल की सार्वजिनक छवि व उत्तराखंड में लोकप्रियता के चलते शौर्य के समर्थकों की संख्या भी ख़ासी बड़ी है। डोभाल पुत्रों के कारोबार को लेकर उठ रहे सवालों पर आम लोगों के साथ ही उनके समर्थक भी असमंजस में हैं। कोई इसे फ़ेक न्यूजतो कोई साज़िश क़रार देता है, तो किसी के लिए यह सब समझ से परे की बात है।.."


राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल अक्सर खबरों की सुर्खियों में होते हैं। कभी अपने ‘शौर्य’ के किस्सों को लेकर तो कभी सरकार की सुरक्षा नीति, रणनीति व विशेष अभियानों को लेकर। तमाम अहम पदों और भूमिकाओं में रहते हुए उनका सार्वजनिक जीवन बेदाग रहा है, लेकिन हाल ही में एक मीडिया हाउस की 'एक्सक्लूसिव' रिपोर्ट से उनके सार्वजनिक जीवन की सुचिता पर सवाल खड़ा हो रहा है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के पुत्र ‘टैक्स हेवन’ यानी कर चोरों का ‘स्वर्ग’ कहे जाने वाले देश से ‘हेज फंड’ का कारोबार कर रहे हैं । 

दरअसल ‘दी कारवाँ’ नाम की पत्रिका अपनी एक खोजी रिपोर्ट TheD-Companies में इस बात को सामने लेकर आई है। इस रिपोर्ट की ‘तपिश’ दिल्ली के सियासी गलियारों से लेकर देहरादून की सियासत तक में महसूस की जा रही है। यह रिपोर्ट ऐसे वक्त में आयी है, जब देश में लोकसभा चुनाव तो आसन्न हैं ही, अजीत डोभाल के बड़े पुत्र शौर्य डोभाल के लिए भी उत्तराखंड में सियासी ज़मीन तैयार की जा रही है । शौर्य पिछले तकरीबन एक साल से पौड़ी लोकसभा सीट पर रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा कार्यक्रमों में सक्रियता बनाए हुए हैं।

अजीत डोभाल की सार्वजिनक छवि व उत्तराखंड में लोकप्रियता के चलते शौर्य के समर्थकों की संख्या भी ख़ासी बड़ी है। डोभाल पुत्रों के कारोबार को लेकर उठ रहे सवालों पर आम लोगों के साथ ही उनके समर्थक भी असमंजस में हैं । कोई इसे ‘फ़ेक न्यूज’ तो कोई साज़िश क़रार देता है, तो किसी के लिए यह सब समझ से परे की बात है। जबकि कांग्रेस तो इसे सरकार के ख़िलाफ़ बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है, इसे मनी लांड्रिंग करार दे रही है। ख़बर यह भी है कि विवेक डोभाल की ओर से कांग्रेस द्वारा मनी लांड्रिंग के आरोप पर कांग्रेस एवं पत्रिका पर मानहानि का वाद दायर किया है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि उन्होंने ‘टैक्स हेवन’ से हेज फंड के कारोबार का खंडन नहीं किया है।

ऐसे में हर कोई यह समझना चाहता है कि आखिर यह मसला क्या है? क्या वाकई डोभाल पुत्रों द्वारा किसी गैरकानूनी कारोबार का संचालन किया जा रहा है? सच्चाई यह है कि उत्तराखंड जैसे छोटे से प्रदेश के लिए तो ‘टैक्स हेवन’ और ‘हेज फंड’ जैसे शब्द ही समझ से परे हैं।

चलिये पहले यही समझते हैं कि ‘टैक्स हेवन’ कंट्री और ‘हेज फंड’ आखिर क्या बला हैं? दुनिया भर में 19 टैक्स हेवन देश बताये जाते हैं, फिलवक्त जो केमैन आइलैंड चर्चा में है वह भी उन्हीं में एक है । ये देश टैक्स चोरों के लिए ‘स्वर्ग’ माने गए हैं, क्योंकि ऐसे देशों में पैसे जमा करने पर वह जमा करने वाली कंपनी या व्यक्तियों के बारे में कुछ नहीं पूछते । इन देशों में टैक्स या तो लगता ही नहीं है या फिर नहीं के बराबर लगता है । हर कोई वाकिफ है कि भारत व अन्य देशों से कर चोर इन देशों में कालाधन जमा करते हैं।

अब बात हेज फंड की। इस ख़ास किस्म के निवेश को एक तरह से अमीरों का म्युच्युअल फंड कहा जा सकता है। भारत में हेज फंड में निवेश के लिए कम से कम एक करोड़ रुपया लगाना होता है, जबकि विदेशी फंड में कम से पांच लाख डॉलर ज़रूरी है। यह म्युच्युअल फंड जैसा होने के बावजूद म्युच्युअल फंड से बिल्कुल अलग है, शेयर बाजार के उतार चढ़ाव का इस पर कोई असर नहीं पड़ता। कुल मिलाकर यह अमीरों के लिए कम रिस्क में निवेश की अधिकाधिक सुरक्षा और लाभ की गारंटी है। भारत में फिलहाल 15 ऐसे फंड सेबी में पंजीकृत हैं जिनमें कार्वी कैपिटल, आईआईएफएल, मोतीलाल ओसवाल और एडिलविस आदि शामिल हैं।

‘टैक्स हेवन’ और ‘हेज फंड’ को समझने पर यह साफ हो जाता है कि यह ‘हाई प्रोफाइल’ कारोबार खास लोगों द्वारा खास लोगो से खास लोगों के लिए ही संभव है। इसकी संभावनाएं काफी हैं कि इस कारोबार में कालेधन का इस्तेमाल होता हो, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि यह कारोबार अवैध या गैरकानूनी है।

जहां तक विवेक डोभाल का सवाल है तो वे एक चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट हैं और सिंगापुर में रहते हैं। वह अजीत डोभाल के छोटे बेटे हैं और उनकी नागरिकता इंग्लैंड की है। जो कहानी सामने है वह यह है कि विवेक कर चोरों के लिये स्वर्ग माने जाने वाले देश केमैन आइलैंडस से हेज फंड का व्यवसाय संचालित कर रहे हैं ।

कारवां की रिपोर्ट की ही बात करें तो कथित तौर पर कर चोरी और कानेधन से जुड़े इस कारोबार में दुनिया भर की हज़ारों की संख्या में कंपनियां हैं। विवेक तो अभी इस खेल के बहुत छोटे खिलाड़ी हैं । लेकिन कहानी को सनसनीखेज और दिलचस्प बनाने वाला तथ्य यह है कि विवेक डोभाल जिस जीएनवाई एशिया फंड नाम से बने हेज फंड के निदेशक हैं, उसने थोड़े ही समय में बड़ी तरक्की की है । दावा किया जा रहा है कि जीएनवाई एशिया नाम की कंपनी का केमैन आइसलैंड्स में रजिस्ट्रेशन 21 नवंबर 2016, भारत में नोटबंदी की घोषणा के ठीक 13 दिन बाद हुआ ।

कहानी का गंभीर पहलू यह है कि विवेक की कंपनी में डॉन डब्ल्यू ईबैंक्स और मोहम्मद अल्ताफ मुस्लियाम वितील नाम के दो निदेशक और भी हैं, जिनमें से ईबैंक्स का नाम पैराडाइस पेपर्स में ऐसी दो कंपनियों के निदेशक के तौर पर सामने आ चुका है, जो केमैन आइलैंड में पंजीकृत हैं। यही नहीं जीएनवाई एशिया के कानूनी पते के मुताबिक यह जिस वाकर्स कारपोरेट लिमिटेड नाम की फर्म के तहत आती है। उसका नाम पैराडाइज पेपर्स और पनामा पेपर्स में भी सामने आया है। यही तथ्य विवेक डोभाल की कंपनी को लेकर उठ रहे सवालों और आरोपों का मुख्य आधार भी है ।

विवेक डोभाल की कंपनी को केमैन आइलैंडस से आने वाले एफडीआई यानी भारत में विदेशों से आने वाला निवेश से भी जोड़ा कर देखा जा रहा है। बताते हैं कि केमैन आइसलैंड्स से पिछले सालों में अनपेक्षित निवेश हुआ है । रिजर्व बैंक आफ इंडिया की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि पिछले सालों की वार्षिक रिपोर्ट में केमैन आइलैंड से आने वाली पूंजी में 2226 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। दिसंबर 2017 और मार्च 2018 में खत्म होने वाले दो क्वार्टर में ही केमैन आइसलैंड्स से निवेश की राशि एक बिलियन डालर से अधिक हो गयी थी। इस बढ़ोतरी के पीछे हालांकि विवेक डोभाल की कंपनी की भूमिका रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहीं साबित नहीं हो पा रही है । लेकिन एक अन्य तथ्य यह जरूर है कि एडिलविस कस्टोडियल सर्विसेज लिमिटेड, जो कि जीएनवाई एशिया की आधिकारिक कस्टोडियन है उसके टर्नओवर में हाल के सालों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट में तो यह दावा किया गया है कि एडिलविस ने विवेक डोभाल की कंपनी को सीमा से बाहर जाकर जगह दी ।

बहरहाल, विवेक से शुरू हुई इस कहानी में किसी की भी दिलचस्पी तभी बढ़ती है जब उसके तार अजीत डोभाल और शौर्य डोभाल से जुड़ते हैं । विवेक डोभाल द्वारा विदेश के एक टैक्स हैवेन से हेज फंड का व्यवसाय संचालित करना इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उनके पिता अजीत डोभाल एक बड़े सार्वजनिक पद पर हैं। उससे भी अहम यह है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो के चीफ रह चुके अजीत डोभाल ने ही 'इंडियन ब्लैक मनी एब्रोड: इन सीक्रेट बैंक्स एंड टैक्स हैवेन्स' नाम की वह रिपोर्ट तैयार की, जिसमें विदेशों से संचालित टैक्स हैवेन के खिलाफ बड़े अभियान को चलाए जाने की वकालत की गयी है । इस लिहाज से देखा जाए तो नैतिक आधार पर विवेक का यह कारोबार वाकई ठीक नहीं ठहराया जा सकता ।

विवेक के लिए कहा जा सकता है कि वह भारतीय नागरिक नहीं है, विदेशी नागरिकता वाले कॉरपोरेट हैं, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती । कहानी यह है कि विवेक के इस कारोबार के तार बड़े भाई शौर्य के कारोबार से भी जुड़े हैं । शौर्य डोभाल हालांकि घोषित तौर पर ‘जेमिनी फाइनेंशियल सर्विसेज’ का संचालन करते हैं लेकिन वह महज एक कारोबारी नहीं बल्कि उस इंडिया फाउंडेशन के निदेशक हैं, जिसका मोदी सरकार के साथ गहरा रिश्ता है । इंडिया फाउंडेशन के निदेशक होने के चलते वह भी आज देश के प्रभावशाली चेहरों में शामिल हैं । रिपोर्ट के मुताबिक शौर्य और विवेक की कंपनियों के तार एक दूसरे से जुड़े हैं।

बताते चलें कि शौर्य विदेश में इन्वेस्टर बैंकर के तौर पर कार्यरत थे, लेकिन 2009 से वह भारत में ही हैं। इंडिया फाउंडेशन का अस्तित्व भी देश में सन 2009 से ही है । आज यह देश का सबसे प्रभावशाली थिंक-टैंक है, जो विदेश और भारत के औद्योगिक जगत की प्रमुख हस्तियों को मंत्रियों और अधिकारियों को साथ बैठकर सरकारी नीतियों पर बातचीत का मंच मुहैया कराता है । भाजपा नेता राममाधव के साथ ही सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री फाउंडेशन के नीतिकारों में शामिल रहे हैं । जिनमें एक मंत्री जयंत सिन्हा का नाम पैराडाईज पेपर्स में भी सामने आ चुका है।

बीते सालों में इंडिया फाउंडेशन के बढ़ते प्रभाव, उसमें सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों की निदेशक के तौर पर उपस्थिति और उसकी फंडिंग को लेकर पहले से ही तमाम सवाल उठते रहे हैं। मोदी सरकार में फाउंडेशन ने तमाम विदेशी राजदूतों और शख्सियतों के साथ बैठकें आयोजित की हैं। कुछ बैठकों पर तो विवादित प्रायोजकों को लेकर तो सवाल भी उठे हैं । कहा जाता है कि पीएम के विदेश दौरों के सफल इवेंट इंडिया फाउंडेशन ही आयोजित कराता है। न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वैयर पर आयोजित पीएम के इवेंट का श्रेय भी इसी संगठन का जाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शौर्य डोभाल की क्या अहमियत है ।

ऐसे में यदि शौर्य और विवेक डोभाल की कंपनियों के बीच वाकई कारोबारी रिश्ते हैं तो सवाल उठने स्वाभाविक हैं । राजनैतिक तौर पर इसका उन्हें नुकसान होना भी तय है । जहां तक मीडिया रिपोर्ट का सवाल है तो रिपोर्ट में यह साबित करने की कोशिश की गयी है कि मोदी सरकार के करीबी ऐसे कारोबार में लिप्त हैं, जिस पर भाजपा के थिंक टैंक खुद सवाल उठाते रहे हैं। रिपोर्ट यह भी इशारा कर रही है कि सरकार की नोटबंदी के फैसले का लाभ मोदी के करीबियों ने जमकर उठाया है । कांग्रेस तो इसे खुले तौर पर मनी लांड्रिंग का मामला बताते हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाने की कोशिश में है ।

देश के अधिकांश न्यूज चैनलों और समाचार पत्रों में लगभग गायब यह रिपोर्ट वेब मीडिया पर इन दिनों जबरदस्त वायरल है। कारोबार से इतर वास्तविकता क्या है, फिलहाल कहना मुश्किल है। लेकिन कुछ तो है क्योंकि कहानियां आखिर यूं ही नहीं बनती। बहुत संभव है कि मसला सियासी हो लेकिन तथ्यों के आलोक में असल मुद्दा सार्वजनिक छवि का है, मुद्दा राजनैतिक सुचिता और नैतिकता का है।

मुद्दा यह है कि राजनैतिक सुचिता को मुद्दा बनाने वाली और सुशासन का दावा करने वाली सरकार में भी यही सब होना है तो फिर कैसी सुचिता, क्या फर्क है फिर भाजपा और कांग्रेस में? मुद्दा यह भी है कि एक आदर्श छवि वाली शख्सियत पर सवाल उठ रहा है। सवाल यह भी है कि जो अजीत डोभाल खुद टेक्स हैवन देशों से चल रहे कारोबार के विरोधी रहे हैं, आज वही कारोबार उनकी छवि पर भारी पड़ रहा है ।

योगेश भट्ट पत्रकार हैं.