'योनि से सुगंध' की किसको तलाश?

- डॉ स्कन्द शुक्ला

"योनि से गुलाब और लैवेंडर की सुगन्ध अगर प्रकृति-सम्मत होती, तो वह स्वयं प्राकृतिक ढंग से घटित होती।"
- रॉनी लैमन्ट , रॉयल कॉलेज ऑफ़ ऑब्स्ट्रेटीशियन्स एण्ड गायनेकोलॉजिस्ट्स-प्रवक्ता।



अमेरिका में इन दिनों टैल्कम पाउडर निर्मात्री कम्पनी जॉनसन एण्ड जॉनसन मुसीबत में है। टैल्क जिसका प्रयोग ढेरों लोग बदबू और पसीने से निजात के लिए करते हैं, इस विवाद का केन्द्र बिन्दु है। मिसूरी में एक जूरी ने बाईस महिलाओं को चार बिलियन से ऊपर मुआवज़ा देने को कहा है : ये वे महिलाएँ हैं , जिन्हें अण्डाशय का कैंसर है, और इनका आरोप है कि जे एण्ड जे के टैल्कम पाउडर में मौजूद एस्बेस्टस के कारण इन्हें यह रोग हुआ है।

टैल्क में सिलिका नामक खनिज की प्रचुरता है। सिलिका का जब खनन किया जाता है , तो साथ में एस्बेस्टस निकलता है। ज्यों अमृत के साथ विष। एस्बेस्टस मेडिकल-जगत् में कैंसरकारी रसायन के रूप में कुख्यात है। यह एक घोषित कार्सिनोजेन है। आरोपी महिलाओं का मानना है कि जे एण्ड जे के टैल्कम पाउडर में मौजूद सिलिका में एस्बेस्टस की मौजूदगी के कारण इन्हें आज अण्डाशय-कैंसर से जूझना पड़ रहा है। कम्पनी इस आरोप का ज़ाहिर है , विरोध कर रही है। उसका कहना है उसका टैल्क पूरी तरह से एस्बेस्टस-रहित है और उपभोक्ता इस बाबत निश्चिन्त होकर इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

इस तरह के आरोप तमाम प्रसाधन-कम्पनियों पर पहले से लगते रहे हैं। क़िस्म-क़िस्म के ऐसे रसायनों की इनके उत्पादों में मौजूदगी, जो हानिकारक हैं। कई कार्सिनोजेन हैं। वे उपभोक्ताओं की कोशिकाओं के डीएनए में ऐसी त्रुटियाँ यानी म्यूटेशन पैदा करते हैं , जिनकी मरम्मत कोशिकाएँ नहीं कर पातीं। नतीजन वे कैंसरीय हो जाती हैं।

प्रश्न यह भी उठता है कि अण्डाशय तक टैल्कम पाउडर के कण कैसे पहुँचे होंगे। आशंका है कि इस पदार्थ को महिलाओं ने जननांगों के आसपास लगाया होगा। योनि-क्षेत्र की स्वच्छता के प्रयासों में बाज़ार तरह-तरह के प्रयोग उपभोक्ताओं को बेचा करता है। डूशिंग से लेकर स्टीमिंग तक, तमाम मलहम, लोशन और भी न जाने क्या-क्या। भौतिकता के अन्धे हुए जाते युग के लिए बदबू एक बड़ी नकारात्मकता है। ऐसी जिसके नाम पर वह कुछ भी बेचेगा और लोग टूट पड़ेंगे।

अगला प्रश्न वही है, जो ऊपर रॉनी लैमन्ट ऊपर उठा रही हैं। योनि से गुलाब और लैवेंडर की सुगन्ध अगर प्रकृति-सम्मत होती, तो वह स्वयं प्राकृतिक ढंग से घटित होती। उसके लिए हम-मनुष्यों को इतनी प्रसाधनी तरक़ीबें न भिड़ानी पड़तीं। कुदरत ने मानव के जिस अंग को जैसा बनाया है, उसके पीछे उसने सुरक्षा के साधन भी मुहैया कराये हैं। योनि के भीतर रिसने वाला द्रव और मौजूद जीवाणु ऐसे हैं, कि वहाँ सरलता से किसी रोगकारक कीटाणु के लिए बचे रहकर पनपना आसान नहीं। जानिए कि मानव-योनि वह अंग है, जिसमें बड़ी आँत के बाद सर्वाधिक संख्या में जीवाणु पाये जाते हैं।

जब आप इस अंग के साथ प्रसाधनी प्रयोग करते हैं, तो आप इसके पर्यावरण को बदलते हैं। जीवाणु मार दिये जाते हैं, द्रव को धोकर-पोछकर साफ़ कर दिया जाता है। तमाम बाहरी रसायन योनि की अम्लीयता को भी दुष्प्रभावित करते हैं, जिससे बाहरी संक्रमणों को पनपने में आसानी होती है। बैक्टीरियल वैजिनोसिस से लेकर टॉक्सिक शॉक सिण्ड्रोम तक और फिर टैल्क-एस्बेस्टस-सम्बन्धी इस चले रहे विवाद तक, न जाने क्या-क्या मात्र इसलिए सिर उठाता है कि योनि-अति स्वच्छता को बाज़ार पोषित ऑब्सेशन बना दिया जाता है।

यह सही है कि पूरे मासिक चक्र के दौरान योनि के भीतर बदलाव होते हैं। स्रावित होने वाले द्रव में परिवर्तन होते रहते हैं , अम्लीयता घटती-बढ़ती रहती है। जीवाणुओं की संख्या में भी बदलाव आते हैं। मासिक धर्म के दौरान होने वाला रक्तस्राव तो फिर है ही। लेकिन स्वच्छता के लिए तमाम स्त्री-रोग-विशेषज्ञ दर्शाया बताते जाते साफ़ पानी, मामूली साबुन और साफ़ कपड़े से बिना रगड़े योनि को पोछने के सिवा किये गये उद्यम न सिर्फ़ अनावश्यक हैं, बल्कि कई बार हानिकारक भी। लेकिन किया क्या जाए ! प्रसाधनों के तेज़ आकर्षी विज्ञापनी शोर में विज्ञान का सादा-सपाट शालीन स्वर दब जाता है।

फ़िल्म-तारिकाएँ क्या बेच रही हैं, यह महत्त्वपूर्ण नहीं। ग्विनेथ पॉल्ट्रो के कहने-भर से योनि-स्वच्छक कोई विधि आपको नहीं अपनानी चाहिए, अगर विज्ञान उसके पक्ष में न हो। स्त्री-रोग-विशेषज्ञों की वैज्ञानिक राय से अधिक किसी कम्पनी, किसी उत्पाद, किसी एजेंट पर विश्वास सही नहीं।