गांधी की हत्या पर सभी कुतर्कों के जवाब : आरा में गोष्ठी

गांधी की हत्या न 55 करोड़ रुपये पाकिस्तान को देने की वजह से हुई थी न ही भारत- पाकिस्तान बंटवारे के कारण. अगर ऐसा होता तो फिर 1934 से ही गांधी को मारने के लिए 7 बार हमले क्यों हुए? जबकि 1934 में न पाकिस्तान का मुद्दा था न ही 55 करोड़ का. साम्प्रदायिक विभाजनकारी विचारों के खिलाफ गांधी दीवार की तरह खड़े थे और उसी विचारधारा वालों ने षड्यंत्र कर गांधी की हत्या की. गांधी की हत्या पर अपने विचारों को रखते हुए नाथूराम गोडसे, सावरकर एवं हिन्दू महासभा को गांधी की हत्या के लिए मुख्य रूप से दोषी करार दिया.
-आशुतोष कुमार पांडेय


आरा में हुए इस कार्यक्रम की रिपोर्ट के साथ यह तस्वीर अलीगढ़ से आई एक ​वीडियो का स्क्रीन ग्रैब है, जिसमें हिंदू उत्पाती संगठनों के सदस्य गांधी के शहादत दिवस के मौके पर उनके पुतले को गोलियां मार रहे हैं. : संपादक

महात्मा गांधी की शहादत दिवस के मौके पर आरा में एक बहुत ही विचारोत्तेज़क बहस का आयोजन हुआ. जिसमें आरा के संस्कृतिकर्मियों, समाजकर्मियों, साहित्यकारों एवं प्रबुद्ध नागरिकों ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम का आरंभ भारतीय समयानुसार ठीक ग्यारह बजे गाँधी जी के मौन श्रंद्धाजलि के साथ आरंभ हो गयी. चुकी यह कार्यक्रम, मुक्ताकाश मंच जेपी स्मारक के परिषर में सुनिश्चित था तो जाहिर तौर पर जेपी का माल्यार्पण भी हुआ. इसके बाद नरसी मेहता की लिखित और महात्मा गाँधी के प्रिय प्रार्थना 'वैष्णव जन तो तेने कहिये पीर पराई जाणे रे' का आरा इप्टा के अध्यक्ष नागेन्द्र नाथ पाण्डेय के नेतृत्व में इप्टा के कलाकारों पूजा कुमारी,सोनी पाण्डेय, सिद्धि कुमारी, दीपा, ऐश्ना राज, अर्चना, ज्योति, श्रेयष भारद्वाज ने गायन प्रस्तुत किया. 

क्योंकि मंच का संचालन मेरे ही जिम्मे था, तो मैंने गाँधी की हत्या को जायज़ ठहराने के लिए जितने भी कुतर्क कट्टर-लाफ़ाज्जों-जालसाजों-सामजिक माफ़ियाओं द्वारा गढ़े गए हैं, उसे रखने की जिम्मेदारी थी, उसे मैंने सबके सामने रखा. इस तमाम सवालों का जवाब मुख्य वक्ता के तौर पर आमंत्रित जयप्रकाश स्मारक संस्थान के महासचिव सुशील कुमार को देना था. उन्होंने जवाब देते हुए गोष्ठी के विषय को खोला भी. लेकिन उससे पहले मैंने बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर छपे प्रिय रेहान फज़ल का "कैसे बीता था महात्मा गांधी का आख़िरी दिन?" को श्रोताओं के सामने रखा. उसके बाद इप्टा से जुड़े कलाकारों 'अल्ला तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम' का गायन किया.


सुशील कुमार ने गाँधी की हत्या को जायज़ ठहराने वाले गढ़े गए कुतर्क मसलन, 
  1. जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने के लिए गाँधी ने देश का विभाजन करवा दिया? 
  2. गाँधी जी मुस्लिम परस्त थे? 
  3. गाँधी जी हिन्दू विरोधी थे? 
  4. गाँधी जी भगत सिंह को फाँसी से बचा सकते थे? 
  5. आज़ादी के बाद गाँधी जी पाकिस्तान को 55 करोड़ देने के लिए भूख हड़ताल पर बैठे थे. इस तरह देश को ब्लैकमेल किया।  




सुशील कुमार ने इन सवालों का बिंदुवार विस्तार से जवाब दिया. उन्होंने कहा कि गांधी की हत्या न 55 करोड़ रुपये पाकिस्तान को देने की वजह से हुई थी न ही भारत- पाकिस्तान बंटवारे के कारण. अगर ऐसा होता तो फिर 1934 से ही गांधी को मारने के लिए 7 बार हमले क्यों हुए? जबकि 1934 में न पाकिस्तान का मुद्दा था न ही 55 करोड़ का. साम्प्रदायिक विभाजनकारी विचारों के खिलाफ गांधी दीवार की तरह खड़े थे और उसी विचारधारा वालों ने षड्यंत्र कर गांधी की हत्या की. गांधी की हत्या पर अपने विचारों को रखते हुए नाथूराम गोडसे, सावरकर एवं हिन्दू महासभा को गांधी की हत्या के लिए मुख्य रूप से दोषी करार दिया. सावरकर के द्विराष्ट्र के सिद्धांत को वक्ताओं ने मुख्य रूप से भारत- पाकिस्तान बंटवारे के लिए कारण बताया जो हिन्दू महासभा के अहमदाबाद सम्मेलन में रखा गया था. इसके 6 साल बाद मुस्लिम लीग द्वारा 1940 के लाहौर अधिवेशन में अलग पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित किया गया था.यह भी बात गोष्ठी में बताई गई कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव पारित होने के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी जो उस समय बंगाल प्रान्त के वित्त मंत्री थे ने वाईसराय को पत्र लिखकर भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव का विरोध किया था. उस समय बंगाल में हिन्दू महासभा एवं मुस्लिम लीग की संयुक्त सरकार थी. मुस्लिम लीग के सोहरावर्दी मुख्यमंत्री थे. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही बाद में जनसंघ की स्थापना की थी. हिन्दू महासभा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों आजादी के आंदोलन के विरुद्ध थे.

अध्यक्ष मंडल में दीपक श्रीवास्तव, सुशील तिवारी एवं जितेंद्र कुमार थे, जिससे मुझे आखिर में व्यक्तव्य लेना था. और मैंने इनलोगों को आखिर में व्यक्तव्य लेने के लिए रोक कर रखा था. लोग बढ़ते जा रहे थे. दरसअल मंच ओपेन था. जो लोग आकर नाम लिखा देते थे उनका नाम मैं जोड़ लेता था. मैंने जितेश कुमार नामक सज्जन को आमंत्रित किया. उन्होंने आते ही आयोजन के लिये धन्यवाद दिया और कहा कि मैं एक घोर संघी परिवार से आता हूँ, जिस परिवार में गाँधी और नेहरू के बारे में बहुत ही गलत बातें पढ़ाई गयी. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मैंने हाल के दौर में जब गांधी के बारे में विस्तार से पढ़ा तो मालूम हुआ कि जो हमारे समाज और परिवार में गाँधी के बारे बातें कही गयी थी उसका कोई आधार नहीं था. सब फ़र्जी और झूठ था. 

प्राध्यापक और जाने माने साहित्यकार सुधीर सुमन ने कहा कि सादगी और स्वच्छ्ता अलग-अलग चीज है. इसपर ध्यान देना होगा. गाँधीवाद कई स्वरूप में मौजूद नज़र आता है. मेघा पाटेकर का प्रतिरोध का उदारहण देकर समझाया. जो भी धरना-प्रर्दशन के तरीके है उनमें भी गांधीवादी प्रवृत्ति मौजूद है मगर वह राजनीतिक तौर पर संगठित नहीं है. जो स्वार्थ और लूट और कारपोरेट परस्त की राजनीति है वह अंततः गांधीवाद तथा गाँधी की हत्यारों के साथ खड़ी होगी. अवसर पर Sudhir Suman ने असरार-उल-हक़ मजाज़ की गांधी की हत्या के बाद लिखी ग़ज़ल को सुनाया. साथ ही भगत सिंह, यशपाल और मुक्तिबोध की गाँधी सबंधित दृष्टि को भी रखा. ग़ज़ल को सुनाते हुए कहा कि सोचिये एक रूमानी गज़लगो गांधी पर कलेजा निकाल लेना वाला ग़ज़ल लिखा. पेश है कुछ शेर-

हिन्दू चला गया न मुसलमाँ चला गया
इंसाँ की जुस्तुजू में इक इंसाँ चला गया 
बरहम है ज़ुल्फ़-ए-कुफ़्र तो ईमाँ सर-निगूँ
वो फ़ख़्र-ए-कुफ्र ओ नाज़िश-ए-ईमाँ चला गया  
बीमार ज़िंदगी की करे कौन दिल-दही
नब्बाज़ ओ चारासाज़-ए-मरीज़ाँ चला गया  
किस की नज़र पड़ेगी अब ''इस्याँ'' पे लुत्फ़ की
वो महरम-ए-नज़ाकत-ए-इस्याँ चला गया  
वो राज़-दार-ए-महफ़िल-ए-याराँ नहीं रहा
वो ग़म-गुसार-ए-बज़्म-ए-अरीफ़ाँ चला गया  
अब काफ़िरी में रस्म-ओ-राह-ए-दिलबरी नहीं
ईमाँ की बात ये है कि ईमाँ चला गया  
इक बे-खु़द-ए-सुरूर-ए-दिल-ओ-जाँ नहीं रहा
इक आशिक़-ए-सदाक़त-ए-पिन्हाँ चला गया 
बा-चश्म-ए-नम है आज ज़ुलेख़ा-ए-काएनात
ज़िंदाँ-शिकन वो यूसुफ़-ए-ज़िंदाँ चला गया  
ऐ आरज़ू वो चश्मा-ए-हैवाँ न कर तलाश
ज़ुल्मात से वो चश्मा-ए-हैवाँ चला गया  
अब संग-ओ-ख़िश्त ओ ख़ाक ओ ख़ज़फ़ सर-बुलंद हैं
ताज-ए-वतन का लाल-ए-दरख़्शाँ चला गया 
अब अहरमन के हाथ में है तेग़-ए-ख़ूँ-चकाँ
ख़ुश है कि दस्त-ओ-बाज़ू-ए-यज़्दाँ चला गया 
देव-ए-बदी से मार्का-ए-सख़्त ही सही
ये तो नहीं कि ज़ोर-ए-जवानाँ चला गया 
क्या अहल-ए-दिल में जज़्बा-ए-ग़ैरत नहीं रहा
क्या अज़्म-ए-सर-फ़रोशी-ए-मर्दां चला गया  
क्या बाग़ियों की आतिश-ए-दिल सर्द हो गई
क्या सरकशों का जज़्बा-ए-पिनहां चला गया  
क्या वो जुनून-ओ-जज़्बा-ए-बेदार मर गया
क्या वो शबाब-ए-हश्र-बदामाँ चला गया  
ख़ुश है बदी जो दाम ये नेकी पे डाल के
रख देंगे हम बदी का कलेजा निकाल के
इस मौके पर उपस्थित अन्य वक्ताओं में रंगकर्मी अजय साह ने गाँधी के पत्रों को पढ़ा. मैंने बीच में टोका और कहा कि गाँधी की हत्या को जायज़ ठहराने वालों के जवाब में आयोजन है, अतः विषयांतर होने का कोई औचित्य नहीं है. 

जाने माने साहित्यकार जगतनंदन सहाय ने गाँधी की हत्या के पक्षधर को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जो लोग गाँधी की हत्या को जायज़ ठहरा रहे है वे मानवता के बड़े दुश्मन है. सफ़ेद पाजामा कुरता और काले रंग के बंडी में आये जेपी आंदोलन के सेनानी राणा प्रताप सिंह मुँह में पान चबाते हुए कहा कि महात्मा गाँधी की हत्या पर बात नहीं होनी चाहिए. हत्या हो गया लेकिन हमें उनके स्वच्छता अभियान से सीखनी चाहिए.  

कृषि वैज्ञानिक डॉ. पी के द्विवेदी ने कहा कि यहाँ आने से कई प्रकार की भ्रांतियां दूर हुई. गाँधी की हत्या करने वाले के पक्षधर गाँधीवाद की प्रवृत्तियों की हत्या करने में लगे हुय्ये हैं.

बुजुर्ग सुधीर केशरी गाँधी की हत्या पर आयोजित कार्यक्रम पर विफर गए. उन्होंने कहा कि नाथूराम जी ने गोली ने नहीं मारी. कही दूसरी जगह से गोली आयी थी. 

संघ से संवेदना रखने वाले साहित्यकार और अधिवक्ता अतुल प्रकाश ने कहा कि गाँधी की हत्या पर हमेशा बातचीत नहीं होनी चाहिए. हत्या हो गयी तो हो गयी. लेकिन अब उनके विचारों पर बातचीत होनी चाहिए.

युवा नेता अजित कुशवाहा ने गोडसे को 'जी' और सावरकर को 'वीर' कहने वालों को लानत-मलामत करते हुए जमकर फटकार लगाई. उन्होंने कहा कि सावरकर गाँधी की हत्या के साज़िश कर्ताओं में शामिल थे. अजित ने आगे कहा कि जो सावरकर अंग्रेजों से माफी मांगकर द्विराष्ट्र सिंद्धांत पर काम किया वह वीर और देशभक्त कैसे हो सकता?

अनिल राज ने कहा कि गाँधी के बारे में आज विस्तार से जाना और उनके बारे में बताया गया झूठ का आज पर्दाफाश हो गया.

इस अवसर पर गिफ्ट अकादेमी विद्यालय के उपस्थित पांचवीं कक्षा के अर्जुन सिंह तथा अमन सोनी ने गांधी का संक्षिप्त परिचय का पाठ किया. 

गिफ्ट एकेडमी की पाँचवीं कक्षा शबा, संदीपा, खुशी, मुस्कान, संजना ने 'साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल' का गायन किया. 

बहस तीखी होती जा रही थी इसी दौरान मैंने इप्टा के अंजनी शर्मा  को मंच पर आमंत्रित किया तो उन्होंने गाँधी की हत्या के बाद नागार्जुन की लिखी 'तर्पण' शीर्षक कविता का पाठ किया. 

कार्यक्रम के अध्यक्ष मंडल के दीपक श्रीवास्तव ने अपनी संक्षिप्त वक्तव्य में गाँधी की हत्या से संबंधित दस्तावेजों को ब्यौरोदार ढंग से रखा.

सुनील तिवारी ने गाँधी की हत्यारों का पक्ष लेने वाले और धार्मिक कर्मकाण्ड के नाम पर समाज और देश को ठगने वाले भगवाधारियों और सरकारों को खरी-खोटी सुनाई.

सुप्रसिद्ध साहित्यकार-कवि-आलोचक जिंतेंद्र कुमार ने नए गाँधी के दो मुँही सरकार की जमकर खबर ली. उन्होंने कहा कि बहुत ही रणनीतिक ढंग से संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व गाँधी के नाम पर स्वच्छता अभियान चलाता है और दूसरी तरफ नीचे के नेताओं को गाँधी के खिलाफ़ बोलने के लिए उकसाया जाता है. इसी बीच ख़बर आयी कि अलीगढ़ में भगवाधारियों ने नाथूराम गोडसे जिंदाबाद का नारा लगाते हुए गाँधी के पुतले को गोली मारी फिर उनके पुतले को जलाया तो जिंतेंद्र कुमार ने उस गिरोह की खबर लेते रहे.

कार्यक्रम का समापन इप्टा के कलाकारों ने रघुपति राघव राजा राम गाकर किया. धन्यवाद ज्ञापन आंदोलनकारी रंगकर्मी अशोक मानव ने किया. कार्यक्रम के आखिर में रसूल मियां लिखित और गायिका चन्दन तिवारी द्वारा गाया गीत ( https://youtu.be/9V7uwqWvncY ) को साउंड बॉक्स पर बजाया गया. साथ ही सोपान जोशी द्वारा लिखित पुस्तक 'एक था मोहन' को बच्चों के बीच वितरित किया गया. इस अवसर पर शहर के संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों एवं आम नागरिकों में प्रमुख रूप से डॉ नीरज सिंह, कुर्बान आतिश, मो. शाहनवाज आलम, मुमताज अहमद, शकील अहमद, गुलाब जी, श्रीधर शर्मा, देवेंद्र कुमार पदयात्री, रामनाथ ठाकुर, अभिषेक कुमार मिश्र, अमित कुमार, आनंद पाण्डेय, कृष्ण कुमार कृष्णेन्दु, रवि प्रकाश सूरज, आलोक सिंह, अभिषेक वत्स आदि उपस्थित रहे ।