कोचिंग-संस्थान और आत्महत्या : ये कहां जा रहे हम?

बच्चे चूहा-दौड़ की बलि चढ़ रहे हैं और आप स्वयं उन्हें वेदी तक ला रहे हैं। आज के समाज में जब जीवनयापन पहले की तुलना में अधिक आसान है, तो दूसरे की देखा--देखी नकल करनी ही क्यों? ज़रूरी है हर लड़का डॉक्टर बने ? और हर डॉक्टर नर्सिंग-होम बनाये?
ज़रूरी है कि आम को आम की तरह पाला जाए , इमली को इमली की तरह और लीची को लीची की तरह। समाज को सभी स्वादों की ज़रूरत है।
-डॉ स्कन्द शुक्ला

PC: https://www.thequint.com
किसी कोचिंग-संस्थान की छात्रा की आत्महत्या का दुःखद समाचार सुनने को मिला। लोगों के एक बार फिर से कोचिंग व उसके औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगाया है।

कोचिंग-संस्थान कहीं किसी बाहरी की वजह से स्थापित नहीं हैं। उन्हें स्थापना हमारी ही वस्तुनिष्ठ सोच के कारण मिली है। वे डॉक्टर-इंजीनियर-आईएएस-वकील पैदा करने की फैक्ट्रियाँ हैं। उनमें आप इंसान डालते हैं, वे इंसान-उत्पाद निकालती हैं। फैक्ट्रियों में इंसानों से इंसानों-सा बर्ताव नहीं किया जाता। फैक्ट्रियों से व्यक्तिनिष्ठ सम्मानपूर्ण बर्ताव की अपेक्षा भी बेमानी है। फैक्ट्री को एक रेस में घोड़ों को तमगे जितवाने हैं। जो घोड़ा नहीं जीत पाया या घायल हो गया , फैक्ट्री को उसकी चोटों से कोई हमदर्दी नहीं।

बच्चों को दोष देना ग़लत होगा। बच्चे निर्दिष्ट किये जाते हैं। कभी अधूरे, कभी पूरे। उस कच्ची उम्र में सही-ग़लत का ठीक-ठीक निर्णय लेना बहुत मुश्किल होता है। माँ-बाप को अपनी अधूरी महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ बच्चों पर लादना है। वे डॉक्टर नहीं बने , लड़के को बनाएँगे। वे आईआईटी नहीं गये, लड़की को भेजेंगे। उन्हें आईएएस बनने की इच्छा थी , अब उनकी औलाद पूरा करेगी।

एक बार दो बच्चों से बात चल निकली थी। एक को डॉक्टर और दूसरे को आईएएस बनना था। मैंने उनसे कारण जानने की कोशिश की। उन्होंने वही घिसा-पिटा उत्तर दिया : देश की सेवा करनी है। यह उत्तर किसी ब्यूटी-पैजेंट में दिये गये जवाब सा ही है, जब सम्भाव्य विश्वसुन्दरी कहती है --- मैं संसार-भर के गरीबों, रोगियों, बच्चों की सेवा करूँगी। परिणति सभी जानते हैं, बॉलीवुड की फ़िल्मों में होती है।

मैं फ़िल्मों में प्रवेश को भी ग़लत नहीं मानता। मनोरंजन भी एक सामाजिक कर्त्तव्य है और कोई समूह उसका वहन करेगा। ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर और आईएएस अपने कर्त्तव्यों का करते हैं। लेकिन सेवा कर्त्तव्य नहीं है। वह कर्त्तव्य के आगे की बात है। वह कर्त्तव्य का भाग दो है।

मैं यह भी नहीं कहता कि सब गान्धी, विनोबा और आम्टे बन जाएँ। निवृत्तिमार्ग की भारत देश में ऐसी स्थापना है कि समाज के लिए घर-बार नहीं त्यागा, वह समाजसेवी नहीं। गोया समाज बिना सेवकों के चल न सकेगा। जबकि सच तो यह है कि हम सेवा-शब्द के प्रति रोमैंटिक ढंग से आसक्त हैं। उसी तरह जिस तरह प्रेम से आसक्त हैं। हम प्रवृत्ति-मार्ग को बड़ा रास्ता मानते ही नहीं। हम यह सोच ही नहीं पाते कि अधिसंख्य का किया कर्त्तव्य समाज और देश के उन्नयन के लिए बहुत हद तक पर्याप्त है।

ज़्यादातर अगर कर्तव्यी हो जाएँ , समाज उठ जाए। ज़्यादातर साक्षात्कारों में सेवी बनने लगते हैं। साक्षात्कारी उस झूठ को सुनते हैं , साक्षात्कृत कहते हैं। क्यों ? वही खोखला आदर्शवाद।

लड़के को डॉक्टर आप क्यों बनाना चाहते हैं? पैसा कमाने के लिए न? आईएएस के प्रति आपका ऐसा अनुराग क्यों है? पद के रोब के कारण न? आपने अपनी सन्तान की प्रकृति को नहीं समझा, आपने युग के चलन के अनुसार उसकी प्रकृति को मोड़ने की अनवरत चेष्टा की। ऐसे में नतीजे तो भयावह आने ही थे। आपके दबाव में लड़का अगर डॉक्टर-आईएएस-इंजीनियर बन भी गया तो क्या वह अपने जीवन की गुणवत्ता पा पाएगा? या फिर आपने जीवन की गुणवत्ता केवल बड़ा पैकेज और बड़ा रोब भर समझा है।

बच्चे चूहा-दौड़ की बलि चढ़ रहे हैं और आप स्वयं उन्हें वेदी तक ला रहे हैं। आज के समाज में जब जीवनयापन पहले की तुलना में अधिक आसान है, तो दूसरे की देखा--देखी नकल करनी ही क्यों? ज़रूरी है हर लड़का डॉक्टर बने ? और हर डॉक्टर नर्सिंग-होम बनाये?

ज़रूरी है कि आम को आम की तरह पाला जाए , इमली को इमली की तरह और लीची को लीची की तरह। समाज को सभी स्वादों की ज़रूरत है।

जो समाज प्रकृत नहीं है, वह ढोंगी और छद्म है। और जो छद्म है और दूसरे की देखा-देखी बढ़ना चाहता है, वह ढह पड़ेगा।

डॉ स्कन्द शुक्ला, चर्चित विज्ञान लेखक हैं. इनके फेसबुक पेज़ skandshukla22 पर आप कई ज्ञानवर्धक आलेख पढ़ सकते हैं.