मोदी के सपने में वैज्ञानिकों की आशंका के लिए कितनी जगह?

ज़मीन के नीचे कहीं गहरे इस किस्म की भूगर्भीय हलचलों पर इंसानी नियंत्रण संभव ही नहीं है. ऐसे में यहां प्रश्न यह है कि हम बतौर इंसान, अपनी सीमाओं के भीतर वैज्ञानिकों की इन चेतावनियों पर क्या बरताव करें?
- रोहित जोशी


बीते महीने भारतीय शोधकर्ताओं ने अपने एक नए अध्ययन के आधार पर एक आशंका की ओर फिर से ध्यान खींचा है, जिसमें बताया गया है कि हिमालय एक बड़े सिसमिक गैप से गुजर रहा है और इसके भीतर भारी मात्रा में तनाव पैदा हो गया है जो कि निकट भविष्य में एक बड़े और विनाशकारी भूकंप का कारण बन सकता है. सिसमिक गैप का मतलब है कि किसी भूगर्भीय एक्टिव फॉल्ट में लंबे समय से कोई हरकत नहीं हुई है. यही कारण है कि कई सालों से यहां कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है और हिमालय की भूगर्भीय संरचनाओं में किसी बड़ी हलचल की आशंका प्रबल हो गई है.
भूगर्भ में सोया भूकंप 
जवाहर लाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च, बंगलुरू के सिसमोलॉजिस्ट सीपी राजेन्द्रन के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में कहा गया है, ”इस तनाव के चलते, भविष्य में केंद्रीय हिमालय के ओवरलैपिंग सेगमेंट में से किसी एक में 8.5 या उससे अधिक मैग्निट्यूड का कम से कम एक या फिर और ज्यादा भूकंप आने की आशंका है.”
वैज्ञानिकों की यह आशंका नई नहीं है. अगर आप हिमालय और उसके पर्यावरण में रुचि रखते हैं तो इस आशंका के बारे में आप लगातार कई नामी भूगर्भशास्त्रियों की इस चेतावनी से वाकिफ़ होंगे.
‘आपदाएं तब आती हैं जब हम उन्हें भूल जाते हैं’
ज़मीन के नीचे कहीं गहरे इस किस्म की भूगर्भीय हलचलों पर इंसानी नियंत्रण संभव ही नहीं है. ऐसे में यहां प्रश्न यह है कि हम बतौर इंसान, अपनी सीमाओं के भीतर वैज्ञानिकों की इन चेतावनियों पर क्या बरताव करें?
संभवत: इसके लिए हम जापान की एक मशहूर कहावत से सबक ले सकते हैं और इस कहावत का हिंदी तर्जुमा लगभग यह है कि ‘आपदाएं तब आती हैं जब हम उन्हें भूल जाते हैं.’ जैसा कि हम जानते हैं जापान में लगातार छोटे-बड़े भूकंप आते रहते हैं और यह कहावत संभवत: इन्हीं आपदाओं के अनुभव से बनी हो. इस कहावत का आशय है कि हमें भूकंप या दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से हमेशा सचेत रहने की ज़रूरत है. हम अगर भूले तो बेशक प्रकृति की कई चरम घटनाएं भीषण आपदाओं की शक्ल लेने से नहीं चूकेंगी.
इस बात का अनुभव हमें जून 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ की भयावह आपदा के समय हुआ. वैज्ञानिक विश्लेषण से आज हम यह जान चुके हैं कि कैसे सालाना मानसून और पश्चिमी विक्षोभ के आपस में टकरा जाने से 14 से लेकर 18 जून तक पूरे उत्तराखंड के साथ ही हिमाचल के पूर्वी और नेपाल के पश्चिमी छोर में भीषण बारिश हुई. मानसून और पश्चिमी विक्षोभ का यूं टकरा जाना अपने आप में एक विलक्षण घटना है क्योंकि आमतौर पर जब बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठता मानसून हिमालय की इन पहाड़ियों तक पहुंचता है, पश्चिमी विक्षोभ बर्फबारी करता हुआ लौट चुका होता है. लेकिन प्रकृति की यह विलक्षण/चरम घटना कैसे भयानक बाढ़ की तबाही बन गई उसे समझने की ज़रूरत है?
2013 की आपदा के सबक 
हिमालय के इतिहास और समाज के अध्येता डॉ. शेखर पाठक कहते हैं, “2013 की आपदा में उत्तराखंड भर की जो नदियां उफान पर आईं और तबाही का कारण बनी, तो यहां एक बात ध्यान देने की है कि तक़रीबन सारी नदियां अपने ही फ्लड ज़ोन पर बह रही थीं. हां कुछ जगहों पर उन्होंने अतिक्रमण किया लेकिन अधिकतर जगहों पर नदियों ने अपने फ्लड ज़ोन से मानवीय अतिक्रमण को हटाया. जो कि इस तबाही का कारण बना.”
दिसंबर 2014 में भारत सरकार (वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय) ने भी पहली बार सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने एक हलफनामे में स्वीकारा कि 2013 की आपदा की भयावहता को बढ़ाने में हिमालय में अपनाया जा रहा ‘विकास मॉडल’ ज़िम्मेदार रहा है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आग्रह पर 2013 की आपदा की पड़ताल के लिए मंत्रालय द्वारा गठित 13 विशेषज्ञों की रवि चोपड़ा कमिटी ने भी अपनी रिपोर्ट में विस्तार से इस बात का ज़िक्र किया था कि कैसे अनियंत्रित ढंग के विकास मॉडल (जिसमें बाँध परियोजनाएं, अवैज्ञानिक ढंग से बनाई जा रही चौड़ी सड़कें, अनियंत्रित पर्यटन आदि शामिल हैं) ने मिलकर इस आपदा की भयावहता को बढ़ाने का काम किया. बाद में मंत्रालय की ओर से गठित एक अन्य समिति, विनोद तारे कमिटी ने भी तक़रीबन रवि चोपड़ा कमिटी की बात को ही दोहराया. (हालांकि सुप्रीम कोर्ट में मंत्रालय द्वारा दाखिल हलफनामे में विनोद तारे कमिटी की रिपोर्ट को गलत तरह से पेश किए जाने का मामला भी सामने आया था).
पंचेश्वर बांध : प्रधानमंत्री मोदी का ऊंचा सपना
जवाहर लाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च, बंगलुरू के वैज्ञानिकों की इस चेतावनी के आलोक में जापान की उपरोक्त कहावत के अनुसार आज हम कहां खड़े हैं इसकी पड़ताल ज़रूरी है. एक तरफ वैज्ञानिकों की ओर से जब यह चेतावनी दी जा रही थी, लगभग इसी समय केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष एस. मसूद हुसैन ने भारत और नेपाल की सीमा पर उत्तराखंड में पंचेश्वर का दौरा किया, जहां दोनों देश मिल कर महाकाली नदी पर दुनिया के दूसरे सबसे ऊंचे बांध निर्माण की तैयारियां कर रहे हैं. यह प्रस्तावित बांध 311 मीटर ऊंचा होगा और 116 वर्ग किलोमीटर का एक विशाल जलाशय बनाएगा जिसके डूब क्षेत्र में महाकाली समेत उसकी 5 सहयोगी नदियों का 11,600 हैक्टेयर जलागम क्षेत्र आएगा, जिसमें कई विशिष्ट हिमालयी वन, वनस्पति, वन्य और जलीय जीवन और स्थानीय समाज और उसकी आजीविका शामिल है.
संवेदनशील हिमालय में यह डूब क्षेत्र कितना बड़ा होगा इस बात को ऐसे समझ सकते हैं कि यह इलाका चंडीगढ़ शहर (11,400) से भी 200 हैक्टेयर अधिक क्षेत्र को डुबोएगा. इस परियोजना की डीपीआर के मुताबिक़ इसके डूब क्षेत्र में 134 गांव आने हैं और इसमें बसी 55,000 से अधिक आबादी सीधे तौर पर प्रभावित होनी है. जबकि अप्रत्यक्ष तौर पर इससे कई अधिक आबादी पर इसका प्रभाव पड़ना है परियोजना के दस्तावेजों में जिसका ज़िक्र नहीं है.
भारत और नेपाल का सीमांकन करने वाली महाकाली नदी पर इस प्रस्तावित बांध की परिकल्पना पहले-पहल 1960 के दशक में की गई थी. लेकिन फरवरी 1996 में दोनों देशों के बीच हुई महाकाली संधि में ‘पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय विकास परियोजना’ नाम से इसे एक ठोस रूप मिला लेकिन नेपाल की राजनीतिक अस्थिरताओं के चलते इस परियोजना पर कभी काम आगे नहीं बढ़ पाया. लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता पर क़ाबिज होते ही उनकी दो नेपाल यात्राओं के दौरान इस विशालकाय बाँध का जिन्न फिर बोतल से बाहर निकल आया. 2014 में सार्क सम्मलेन के लिए मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने ‘पंचेश्वर विकास प्राधिकरण’ का गठन किया. इस कवायद को भारत की ओर से भारत-नेपाल संबंधों की गर्माहट के तौर पर भी प्रचारित किया गया.
पिछले दौर में बड़े बांधों के नकारात्मक प्रभावों के चलते दुनियाभर में इनके ख़िलाफ़ एक वैश्विक समझदारी विकसित हुई है, जिसके चलते अमेरिका, यूरोप और कई दूसरे विकसित देशों में 1000 से ज्यादा बड़े बांधों को तोड़ा गया है. नदियों के ई-फ्लो (Environmental Flow/प्राकृतिक बहाव) को किसी तरह दुबारा से पाना दुनियाभर की पर्यावरणीय चिंताओं के केंद्र में आ गया है और पानी से ऊर्जा पाने की उस तकनीक को अतीत की चीज़ माना जा रहा है जिसमें नदियों का प्राकृतिक बहाव बाधित होता हो. इसके लिए ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजनाओं की वकालत की जा रही है, जिसमें नदियों के प्राकृतिक बहाव से ही ऊर्जा निकाल ली जाए.
ऐसे में दुनिया भर में अतीत की चीज़ मान लिए गए विशाल बांधों में से एक ‘पंचेश्वर बांध’ को हिमालय के अतिसंवेदनशील भूगोल में बनाए जाने की कवायद चल रही है जबकि दूसरी ओर वैज्ञानिक इस संवेदनशील हिमालय में भयानक भूकंप की चेतावनी दे रहे हैं. यह दर्शाता है कि हम उपरोक्त जापानी कहावत के मर्म को समझने को तैयार नहीं हैं कि ‘आपदा तब आती है, जब हम उसे भूल जाते हैं!’