यात्रा: एक नदी से दूसरी नदी की क्षेम-कुशल (आख़िरी किस्त)

यह यात्रा संस्मरण मैंने पश्चिमी रामगंगा के इलाकों में घूमते हुए लिखा है। मकसद स्पष्ट है कि मैं पूर्वीरामगंगा के इलाके से आता हूँ, मैंने सोचा कि क्यों न यात्रा के बहाने दोनों नदियों के सामाजिक, पर्यावणीय, ऐतहासिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक सन्दर्भों को वर्तमान के आईने में देखा जाय। पता नहीं इसमें कहाँ तक सफल हो पाया पर इसी के मध्यनज़र यह एक कोशिश की है। इसे मैं पत्रशैली में लिख रहा हूँ जिसको मैंने नाम दिया है 'पूर्वी राम को पश्चिमी रामगंगा की कुशल बात'। यह रही आख़िरी किस्त..
पिछली किस्त से आगे..
अब चैखुटिया से द्वाराहाट की तरफ..
हम चैखुटिया से द्वाराहाट की तरफ जा रहें है। इसी सड़क पर पहले जसिराम जसदा का गाँव है और इसी तरफ है मेरे प्रिय नेता पीसी तिवारी का गाँव बसभीड़ा। वैसे बसभीड़ा एक एतिहासिक है गाँव है जिसे ’नशा नहीं रोजगार दो’ आन्दोलन की जन्मस्थली माना जाता। 70 के दशक में यह आन्दोलन संघर्ष वाहिनी ने चलाया था। इस आन्दोलन के बीज अप्रैल 1983 में पेशावर स्मृति समारोह में बोए गये जिसमें देश के बहुत सारे गंभीर चिन्तकों और युवा साथियों ने भाग लिया। अपनी माटी की लड़ाई लड़ने को इस सम्मेलन में पहाड़ में व्याप्त हताशा, बेरोजगारी और वनों पर अधिकारों के साथ ही शराब के बढ़ते चलन को लेकर गंभीर चिन्तन हुआ। जिसकी परिणिति 2 फरवरी 1984 में नशा नहीं रोजगार दो आन्दोनल के रूप में हुई । इसमें पर्वतीय ग्रामोउत्थान व पर्वतीय युवामोर्चा ने भी भाग लिया था।

पूर्वी राम! क्या तुम्हारे किनारे कोई आन्दोलन हुआ? तुम्हारे लोग भी इस आन्दोलन में शामिल रहे शेर सिंह कार्की उन्हीं आन्दोलनकारियों का एक वृद्ध पर युवादिल लिये वह इस आन्दोलन में अपनी तरह सक्रिय था। तुम जानती हो ना उस जोगी को और उसकी गांधीवादी सर्वोदयी मण्डली को। पर तुम्हारे रिवाड़ों से कोई आन्दोलन नहीं निकला मुझे उम्मीद है भविष्य में तुम्हारे रिवाड़ बहुराष्ट्रीय बाँध कम्पनियों की अनवरत संसाधनों की लूट के ख़िलाफ़ सुलग उठेंगे। तुम्हारी पड़ोसी कालीगंगा के किनारों पर इन दिनों गर्म सांसों की हलचल है। मैं उम्मीद करता हूँ वह अपने रहवास छीने जाने के ख़िलाफ़ लामबद्ध हो घेराबन्दी करेंगे। 

पूर्वी! तुम्हारे घाटी के लोग अपनी माटी के लिए लड़ना कब सीखेंगे? तुमने हमें इतना दब्बू क्यों बनाया? बारहाल मैं इस वक्त सोच रहा हूँ आजकल के आन्दोलन में लोग प्रेसवार्ता के लिए दिल्ली, देहरादून व मण्डल मुख्यालयों में जाते हैं पर तब के आन्दोलनकारियों के लिए मीडिया से जरूरी था, मास मूमेंट और आमलोगों तक उसकी पहुँच. इसीलिए तो बसभीड़ा जैसी जगहों पर खड़े हुए आन्दोलन, पूरे मुद्दों के साथ जन-जन तक पहुँचे। कभी-कभी सोचता हूँ हम तो यूँ ही तुर्रम बन गये हैं। बिना लड़ाईयों के महारथी हमारी युवा पीढ़ी को लेकर कभी खुश होता हूँ तो कभी-कभार कोफ्त भी होती है। हम कितने बिखरे और छिटके हुए हैं क्या हम कभी एक होकर पहाड़ के मुद्दों पर कैरियर को दरकिनार कर सोच सकेंगे? याद रहे बिकाऊ लोग टिकाऊ समाज नहीं खड़ा करते। समाज खड़ा वह करते हैं जो आन्दोलनों की आँच में सन्दर्भों के साथ तपते हैं और जमीनों में टिके रहते हैं।

पूर्वी राम! मैंने अभी-अभी तुम्हारी बहन को अलविदा कहा। कितना दुखदाई शब्द है, अलविदा कहना पर मैं जल्द ही वापस उससे मिलने जांऊगा। हाँ तुमसे भी। सुनो अब मैं कत्युरों की रंगली बैराठ पहुँच गया हूँ यहाँ के विजनरी नेता थे विपिनचन्द्र त्रिपाठी। ये वही कत्युरों की राजधानी है कहते हैं जिनके राजमहल के द्वारपालों से नाराज हो हमारी राजुला सौक्याण ने पूरे महल में भोट का जादू  और एकराख मिट्टी बिखेर कर सबको अचेत कर दिया था और अपने प्रियतम मालू के सिरहाने एक पत्र लिख के गई, "अगर तूने अपनी माँ का दूध पिया है तो मेरी सोने की भोट आकर मुझे अपनी दुल्हन बना के ले जा"  सुनो रामगंगा कितनी सुन्दर और साहसी रही होगी वह। यह लिखते हुए मुझे लोक में फैला यह गीत याद आ रहा है।
ल्या दिया ल्या दिछा बौज्यू सुनपति सौका कि चेलि
यह लोक स्मृतियों में आज भी जीवित है। राजुलामालूसाही नाम से उस कथा के कुछ-कुछ अंश याद आ रहे हैं। द्वाराहाट में कम रूकना हुआ, हमारी टीम सीधे कन्या इंटर कालेज द्वाराहाट चली गई है। यहाँ खूब संघर्षशील और गैरबराबरी के ख़िलाफ़ मुखर लेखक कहानीकार अमीता प्रकाश जी से मिलना बहुत अच्छा रहा। उनका स्कूल एक ख़ूबसूरत जगह पर है यह सन 1957 में स्थापित हुआ। यहाँ हमने स्कूल के सभी शिक्षिकाओं से पठन-पाठन के अलावा लैंगिक मुद्दों पर बात बहस का माहौल बनाने को लेकर बात की और विदा हुए। अब हमारी टीम द्वारसों होते हुए निकल रही है। मुझे ठीक एक साल पहले हुआ नैनीसार-आन्दोनल याद आ रहा है। मैं आन्दोलन के साथियों को याद कर रहा हूँ और आन्दोलन की असफलता को लेकर थोड़ा उदास हो जाता हूँ। मेरी स्मृतियों में इस आन्दोलन के नारे व जनगीत गूंजने लगते है।


चोर आकर बेधड़क हिमालय लूटते रहे 
भूखे असहाय गाँव पीछे छूटते रहे
चोरों को ललकारने की कसम हमने खाई है 
लड़ना है भाई ये तो लम्बी लड़ाई है 
जीतने के वास्ते मशाल जो जलाई है।
मन टीसों से भर जाता है, कसक रह सी जाती है। मुझे आगे बढ़ना है। मैं कठपुड़िया में चाय पीता हूँ, सामने होली के मध्यनज़र तराई के ढोलकिये आकर रूके हैं। चाय बनने तक उनके पास चला जाता हूँ। देखता हूँ कि वे अदला-बदली में एक सानड़ की हाथ से कोरी ढोलक गाँव से उठा लाये हैं। उसमें पूड़े चढ़ा के फिर से नई करके बेंचेगे। मैं उनसे उसे अपने लिये मढ़ देने की बात करके लौट आया। रास्ते में केशिया खिला है पीला और प्योली सूखे भीड़ों से झांक रही है। इस बीच मुझे रास्ते में अंगुली वाला चील दिखाई दिया। दत्त चित्त साधू सा चीड़ की टहनी में मग्न बैठा हुआ कुछ देर उसे निहारने के बाद अचानक डर सा गया। लुप्तप्राय प्रजातियों में शुमार केवल पंछी ही नहीं, हमारे पहाड़ और उसकी जीवन शैली भी है। अगर सब ऐसे ही जंगल राज चलता रहा तो एक दिन वाकई हम भी मिटा ही दिए जायेंगे। जैसे अभी चालीस हज़ार परिवारों को विस्थापन का फरमान मिला है, वैसे ही एक दिन हमारे हम सबके रहवास मिटा दिए जायेंगे।

पूर्वी राम! यह मेरी यात्रा थी। तुम्हारी बहन पश्चिमी रामगंगा बहुत सुन्दर और सहृदय है । मैं इस वक्त यही दुवा कर रहा हूँ कि तुम दोनों बहनें बचे रहना। तुम दोनों बहनों के साथ ही बचे रहें, तुमसे मिलने वाली गाड़-खोले छोटी नदियां भी बची रहें। दुनिया की सारी नदीयां और उनके किनारों के लोग भी उनकी संस्कृतियां अपनी विविधता, अपनी पहचान बनाए रखें। प्रिय रामगंगा! मैं इस वक्त अल्मोड़ा से तुम्हें यह अंतिम हिस्सा पठा रहा हूँ।

इतनी ही कुशल बात !



पुल डूब रहा है
बिना आवाज़
चुपचाप
एक पुल डूब रहा है

कई-कई पुल डूब रहे हैं
इस वक्त दुनिया में
दुनिया को जोड़ने वाले

डुबोये  जा रहे सारे पुल
अपनी मर्जी से कतई नहीं डूब रहे
बल्कि उन्हें शाजिशन डुबोया जा रहा है

इन डूब रहे पुलों को
नदी कतई नहीं डुबो रही
बल्कि यह डूबती नदी संग डूब रहे हैं
क्योंकि  दुनिया के सारे पुल
नदियों के प्रेमी है
जिन्हें नदी के दोनों किनारों की फ़िक्र है

दोनों किनारों के हाल चाल
क्षेम कुशल
चूल्हों की आग
रिश्तेदारियाँ चुपचाप
आर-पार ले जाते पुल
हरे रंग की पोषक पहने
आदिम डाकिए हैं

सारे पुल अंगद के पैर हैं 
राजाओं और देशों की खींची हुयी
सीमाओं व दरबारों में जमे हुए

पुल
विषमताओं में समताओं के दूत है
सीमाओं के विरुद्ध
वह नदी से भी बढकर है
कभी कभी

पर नदी का होना
पुलों का होना है
जैसे पुलों का होना
नदी का होना 

दुनिया में डूबते हैं जब भी पुल
गहराती है विषमताएं
सीमाओं का मुंह खुल जाता है
घूरने लगते हैं दोनों किनारे
एक दूसरे को शक-संदेह से

कितना जरूरी है
होना पुलों का
यह नदियों से बेहतर
और कौन जानता है

इस समय पुल केवल
इसलिए भी डुबोये जा रहे हैं
ताकि हम इन्सान भी
पूरी तरह कट जाएँ
मनुष्यता की नदी के दो किनारों की तरह

दरअसल पुल को डुबो देना
या डूब जाना  पुल का
केवल लोहे के सरियों से बने
नदी के दो किनारों में अटके
झूले का डूब जाना नहीं 

धरती से मनुष्यता के संवाद का
डूब जाना भी है 
समाप्त। 
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अनिल कार्की, उत्तराखंड के कुमाऊँ के पहाड़ों में बसे समाज की ठसक लिए हिंदी के युवा कवि, कहानीकार और लेखक हैं। अपने अंचल की भाषा, संस्कृति, ज्ञान और समूचे जीवन को अपने कथन की विशिष्ट शैली में पिरोए उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नयी भाषा से रूबरू कराया है। anilsingh.karki@gmail.com पर उनसे संपर्क किया जा सकता है।