यात्रा: एक नदी से दूसरी नदी की क्षेम-कुशल (दूसरी किस्त)

यह यात्रा संस्मरण मैंने पश्चिमी रामगंगा के इलाकों में घूमते हुए लिखा है। मकसद स्पष्ट है कि मैं पूर्वीरामगंगा के इलाके से आता हूँ, मैंने सोचा कि क्यों न यात्रा के बहाने दोनों नदियों के सामाजिक, पर्यावणीय, ऐतहासिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक सन्दर्भों को वर्तमान के आईने में देखा जाय। पता नहीं इसमें कहाँ तक सफल हो पाया पर इसी के मध्यनज़र यह एक कोशिश की है। इसे मैं पत्रशैली में लिख रहा हूँ जिसको मैंने नाम दिया है 'पूर्वी राम को पश्चिमी रामगंगा की कुशल बात'। यह रही दूसरी किस्त..



.. यह क्या हम खाना खा के ज्यों ही ऊपर आये कि होटल का मालिक उमाकान्त लखचैरा ने कमरा खटखटया और कहा कि महराज हमारे यहाँ कि एक हस्ती आयी है हम चाहते आप लोग उनसे मिलो। हम भी कहाँ पीछे रहने वाले थे सो हम भी रिसपेशन में चले गये। बगल के कमरे में एक गढ़वाली भाई रूके थे दिल्लीदां थे वे भी नीचे उतर के मिलने आ गये । देखा एक बौने व्यक्ति के साथ एक और आदमी है। बौने व्यक्ति ने राॅयल स्टेग की क्वाटर खोली है और पी रहा है लगभग नशे में है। 

महराज लखचैरा ने इस आदमी का परिचय एक युवा ठेेकेदार के बतौर कराया। एक पल के लिए जरूर अच्छा लगा कि तमाम् शारीरिक अक्षमताओं को दरकिनार कर यह आदमी एक दबंग ठकेदार है। जब परिचय हुआ तो हमने कहा हम भी पहाड़ से ही हैं तो पूरी ठेकदारी लहजे में बोला कि आज भाईयों का कमरा मेरी और से बुक कर दो। एक क्वाटर शरीर के लिये एक क्वाटर शायद बोतल हो चुकी थी। जैसे ही ठेकेदार महोदय कुर्सी से नीचे उतरते तो लखचैरा पण्डित उन्हें पीछे से हाथ डाल फिर कुर्सी पर बिठा देता बिल्कुल सार्गिदाना अन्दाज में। बरहाल ठेकेदार से क्या उम्मीद कर सकते हैं जितनी बात हुई उसमें मैं-मैं की ही रटंत लगी रही। सब एक-एक करके खिसक गये। 

तभी दिवान दा ने मेरा ध्यान काउंटर के नीचे रखी तीन गिलासों की और किया मैंने देखा कि लखचैरा गुरू होटल के ग्राहकों के यहाँ से जो पैक लाये थे वह क्रमवार रखे थे कि कब काम निपटे और कब दो घूंट अपने और दो करीगर के हलक में उतार के सोया जाय। हम भी खिसक लिए और सो गये । 

मुझे बड़ी खुजली है कब उठ जाऊं, कब सो जाऊं कुछ रूटीन नहीं रहता । लेकिन यहाँ तो मैं साढे़ तीन के आस-पास उठ गया और सुबह को देखने का इन्तजार करने लगा। अल्मोड़े की सड़ी बाजार में कोई चाय का खोमचे वाला तक दोस्त न बना हमारा। यहाँ आके बड़ा अच्छा लगा। सुबह सामने पूरब की दिशा रक्तिम हुई और मैं उसकी रोशनी को हिमाल पर पड़ने का इन्जार (इंतज़ार) करता रहा करीब पौने सात बजे के आस-पास त्रिशूल के एक कौने में हल्का घाम दिखा तो रंगत ही आ गई।

यहाँ घाम हिमाल की दिशा से आता है तो हिमाल कम चमकता है। यहाँ से सूर्य अस्त जरूर बढ़िया दिखता होगा। हम पहाड़ी इन पचड़ों में नहीं फंसते, तो भी आजकल जब से मैं शहरी और कुछ कवि, वबि, लेखक, फेंकक टायप मान लिया गया हूँ। कुछ चीजें जबरन जीवन में घुस सी गयी है जैसे ये सनसैट वाला सौन्दर्यबोध। नाश्ते में नीचे उतरे तो मन था कि बांज और बेटुली के जंगल का चारे खाये हुए जानवरों की गाड़ी मीठी दही मिलेगी पर यहाँ भी आनंदा की दही ही मिली। 

जिबड़ी पर धिनाली लगी ठैरी तो ह्यांक कहाँ जाती है इससे पहले लखचैरा से बात हुई तो पण्डित जी बोले कि महराज आधा भिकियासेंण लखचैराओं का राज है। उन्होने बताया कि वह पहले कुछ साल दिल्ली में रहे फिर किसी लाला के यहाँ मुंसीगिरी की और अब कुछ सालों से यह होटल खोल के सपरिवार यहीं रहते हैं। बड़ा बेटा हल्द्वानी में किसी चीज की कोचिंग कर रहा है। वे खुद और बच्चे होटल चलाते है। सुबह नाश्ता हमें उनकी पत्नी ने ही कराया। मुझे अच्छा लगा कि पहाड़ में इस तरह भी काम हो रहा है वरना तो अमूमन पहाड़ों में पहाड़ी अपनी ही जमीनों पर दिल्ली मुंबई के होटल व्यवसाईयों के वेटर बन के जिन्दगी काट रहे हैं। लेकिन लखचैरा गुरू की बात और ठसक कुछ और ही है।

पूर्वीराम! मैं सोच रहा हूँ हमारे लोगों में अभी इतनी समझ नहीं कि वे भी कुछ इस तरह के काम सोंचे। पूरे पहाड़ में जब तक पेशों को जाति आधारित देखा जायेगा तब तक स्वरोजगार की मूल समझ हम विकसित नहीं कर सकेंगे। हम मानीला के बीच गाझिन जंगलों से निकल रहे हैं। गाड़ी नम्बर 2988 में हमारे साथ युवा दोस्त महेन्द्र है। वह कुछ शर्मीला नौजवान है और सभ्य कहे गये मानकों में अभी 24 कैरेट है। मानीला से एक किलोमीटर उतरे ही थे कि जंगली मुर्गीयों का एक झुण्ड कार के आगे से गुजरा। बहुुत पहले खाई जंगली मुर्गी के मासं का खट्टा स्वाद जुबान पर आ गया। यह सड़़क पहाड़ के रिज में है और बीचों-बीच चलती है। यहाँ एक छोटा कस्बा है रतखाल नाम से, स्कूली बच्चे यों सड़क के किनारे यों बुदक के निकलते हैं जैसे कि हैरी पोटर उपन्यास के पात्र हों। यहाँ भी पानी की समस्या है। लोगों ने बताया कि यहाँ जल्द पश्चिमी रामगंगा से बरगिण्डा-मानीला हाइड्रो प्रोजेक्ट बन रहा है जिससे यहाँ होटल व्यवसाय खूब फल फूल सकेगा।

पूर्वीराम! मैं सदैव से सोचता हूँ कि तुम बड़ी नदियां क्यों अपने किनारों के लोगों से उदारता से पेश नहीं आती? तुम्हारे किनारों में बसे गाँव भी इसी तरह सूखे है। मैनें देखा कि इधर स्यालदे और देघाट में विनोद नदी ने क्या सेरे-रक्बे बक्शे है अपने किनारों के रहवासियों को। तुम इस मामले में थोड़ा कजूंस हो तभी शायद तुम्हारें किनारे के रहवासी तुमसे बहुत नहीं जुड़े। मैंने देखा कि जितनी भी छोटी गाड़ और नदी हैं उन्होंने अपना पानी उदार हो के अपने किनारों के रहवासियों पर लुटाया है, लेकिन बड़ी नदियों ने नहीं। हो सकता है तुम्हारी अपनी भगौलिक कमजोरियां हो पर फिर भी तुमसे शिकायत बनती है।  

हाँ जब हम मानीला से नीचे उतर रहे थे एक धार पर मैंने 82 वर्ष के ठेठ पहाड़ी बूबू से पांच रूपये की टौफी खरीदी क्योंकि गाड़ी से पेट घूम रहा था। बूबू आँख से कुछ कमजोर थे इसलिये उन्होंने एक रूपये की दो वाली टाॅफी तो एक की एक ही दी, और एक रुपये की दो वाली टाॅफी एक की दो दे दी। अब हम जैनल पहुंच गये हैं। यह इलाका पश्चिमी रामगंगा के किनारे बसा है इसके पास ही भिकियासैंण है। लोग यहाँ वर्षों से रामगंगा जिला बनाने की माँग के लिये लड़ रहे है। यहाँ से देघाट 30 किलोमीटर, डोटियाल 30 किलोमीटर, मानीला 19 किलोमीटर, चम्पा नगर 18 किलोमीटर और रानीखेत यहाँ से 60 किलोमीटर है। एक तरह से भिकियासेंण यहाँ के केन्द्र में है। यहाँ की भाषा मजकुम्मया है कुमाऊनी गढ़वाली मिक्स। 

भिकियासैंण से पहले हम जैनल में रूके और पश्चिमी राम को मानिला की तरफ से पार किया। भिकियासैंण, चैखुटिया, सल्ट, ताड़ीखेत, द्वाराहाट से घिरा है। इसकी सीमा नैनीताल जनपद को छूती है। राम यहाँ ठहर के चलती और हरे मगर छोटे खेत-सेरे हैं। खेतों में देखा तो गेहूँ दूध भरने से पहले ही लगभग मरीयल सी हालत में था। सरसों के फूलों पर कोसे लगने के बजाय केवल डंठल रह गये थे। यह सब बारिस न हो पाने के कारण हुआ। बारहाल हमें स्यालदे की तरफ जाना था जहाँ से हम देघाट तक जा पाते। जब हम स्यालदे पहुँचे तो दूर-दूर तक हरे सेरे-खेत दिखाई दिये। स्यालदे से पहले हमें तिमली गाँव मिला था जो भरपूर और संपन्न गाँव है।

प्रिय पूर्वीराम यहाँ पश्चिमी की सहायक नदी 'विनोद' बहती है। 'विनोद' अपने लोगों को उदारता से पानी बांटती हुई, चौड़े फाट, हरे सेरे के बीच बहती है। यहाँ हम एक स्कूल मे गये वहाँ आनंद मासाप प्राथमिक के बच्चों को पढ़ा रहे थे। क्या ही अदभुद मासाप थे वे। कक्षा एक और दो के बाल साथी भी लाख तक की संख्या को बता दे रहे थे। वे स्थानीय पिरवेश से किताब को जोड़ के बच्चों को पाठ्यक्रम समझा रहे थे। बहुत चिंतित थे कि बच्चे बहुत गरीब परिवारों से आते है और मैं एकल शिक्षक हूँ। उनकी अपनी विभाग से भी कुछ शिकायतें थी बोले, "मैं मास्टर बाद में पहले एक नागरिक हूँ। जो गलत होगा उसके ख़िलाफ़ बोलूंगा।" 

उन्होंने बताया कि वे पहले किसी दूसरे गाँव के स्कूल में शिक्षक थे वहाँ पूरा गाँव पलायन से परेशान है। चार बच्चे ही स्कूल में रह गये थे बाद में वह स्यालदे आ गये। उन्होंने अपने स्कूल के बच्चों को इतना चन्ठ बनाया था कि वे हमारे जाते ही सवाल पूछने लगे। उनमें एक नेपाली मजदूर का बालक भी था, सबने बताया कि यह नेपाली है मैंने उससे नेपाली में बात की तो वह खुश हो गया। यहाँ कुछ देर रहने के बाद हम देघाट की तरफ चले गये। 

देघाट को जाते हुए पूरे रास्ते मैंने देखा कि रास्ते भर हरे खेत-सेरे दिखते रहे। चोकोट का यह संपन्न इलाका है, इधर देघाट से आगे महलचैरी तक सड़क जाती है। यहाँ भी विनोद नदी बहती है और देघाट का समकोण में नायड़ नदी छूती है। यहाँ हमारे बेहद प्रतिभावान साथी कवि व शोधार्थी डाॅ0 नवीन जी हैं, जिन्होने अपने शिक्षक साथियों से मिलकर पढ़ने लिखने को लेकर और शिक्षा व शिक्षकों के संन्दर्भ में एक ग्रुप ’पहल’ का 2015 में निमार्ण किया। यह समूह समाजिक मुद्दों को लेकर व छात्रों को लेकर सजग मंच है। जब मैंने फेसबुक में मानीला की फोटो डाली तो उन्होंने तुरन्त मुझसे कहा कि यहाँ भी आओ हम सब लोग इन्तजार कर रहे हैं। हमारी टीम का मन था कि वह भकियासेंण से चैखुटिया से चली जायेगी पर रातोंरात हमने अपना प्लान बदला और देघाट की ओर चले आये। 

आकर बहुत अच्छा लगा भगवती मैम जा खुद भी शिक्षका है उनकी छत पर सोलह शिक्षक साथियों के साथ खूब फसक हुई आहा क्या ऊर्जा है इन साथियो में। ये साथी शिक्षकों के लिये गढ़ी गई नकारात्मक मान्यताओं की धज्जीयां उड़ा देते हैं और कहते हैं कि, जिन स्कूलों से हमने खुद पढ़ा हैं हम वहीं मास्टर हैं इन स्कूलों से हमारा वजूद जुड़ा हैं। हम उन्हें न बरबाद होने देंगे न ही उनमें पढ़ने आ रहे बच्चों को किसी चीज की कमी। नवीन जी ने बताया कि कई शिक्षक साथी कई किलोमीटर पैदल चल के स्कूल जाते हैं और लौट के वे सीधे मुझसे मिलने आये पर मैं कोई तोप चीज तो ठैरा नहीं मुझसे क्या ही मिला होगा उन्हें। उनसे मैंने जरूर यह समझा कि जब तक ऐसे शिक्षक हैं पहाड़ जवान रहेगा जो बीज वे लोग बो रहें वे निकट भविष्य में वे पहाड़ों के सर पर हरे बांस की मुरूली बजायेंगे। 

हम लोग मय टीम के साथ दो बजे देघाट पहुँचे टीम तो बाहर घूमती रही में गाड़ी के सीट पर करीब एक घण्टे सो गया। उठ के देखा तो महलचैरी जाने वाली गाड़ी के पीछे दो युवा लड़कियां लटक के जा रही हैं। गाड़ी का ड्राइवर कहने लगा कि दाज्यू देखा यहाँ गाड़ी के पीछे लड़कियां भी लटक के जाती है। हाँ! शिक्षक साथियों से औपचारिक मुलाक़ात से पहले करीब 18 शिक्षक साथियों से संग चाय पी। चाय तो इतनी पी दी कि पूछो ही मत। एक और गज्जब बात देघाट के बाजार में एक पागल मिला वो ऐसे ठसके ओर संकेत करता था कि पूछीए मत और चेहेरे के ऐसे हाव भाव कि भी कामाल के, मुंह से आवाज़ बिल्कुल भी नहीं। बाज़ार भी दुसानी है गढ़वाल और कुमाऊँ के व्यापारी हैं। जिनके आधे खेत गढ़वाल मण्डल मे और आधे कुमाँऊ में हैं यह हमें एक दुकानदार बोडा ने बाताया। बारहाल हम साथियों से मिलकर लौट आये। नवीन जोशी जी ने सन 1942 में आजादी के आन्दोलन में शहीद हुए हरकृष्ण और हीरा मणि की शहीद स्मारक के बारे में विस्तार से बताया और लगभग खण्डहर में बदल चुकी पुरानी अंग्रेजी के जमाने की चौकी दिखाई।

मैं सोच रहा था कि हमने भी मुख्यधारा की आज़ादी की लड़ाई लड़ी पर हम और हमारा पहाड़ कभी मुख्य धारा में नहीं आया। उल्टा इस आज़ादी ने पहाड़ों के संसाधनों को दुगना तेजी से छीना है। जबकि अग्रेजों के समय हमारा पानी हमारे पास था, हमारी नदियां हमारी थी। पर अब तो सबकुछ सरकारें हमसे छीन के बहुराष्ट्रीय कम्पनीयों को दे रही है। मुझे यहाँ नवीन जी ने चोकट के गांधी हर्षदेव बहुगुणा नाम की किताब भेंट की है मैं इसे पढ़ूंगा।

पता है पूर्वी रामगंगा! यह भी पचिश्मी रामगंगा के सहधाराओं के लोग है जैसे तुम्हारी सहधाराओं में लोग रहते ठीक वैसे ही। और हाँ, हम देर रात देघाट से भिकियासेंण लौट आये हैं और मैं अपने गुरूभाई जगदीश से मिलकर लौटा, सुबह मिलने का वादा करके। जगदीश हिंदी का प्रवक्ता है। हम पहले जब एक साथ नैनीताल में रहते थे तो कहा करते थे कि हम-तुम एक ही नदी के किनारे के लोग है मैं पूर्वी का और तुम पश्चिमी के। 

भिकियासेंण में रामगंगा जिला की मांग चल रही है। हमारे यहाँ तो तुम्हारे नाम से कुछ भी नहीं। आज हम एक अजीब पर महंगे होटल में रूके हैं यह होटल वीर चन्द्र गढ़वाली के नाम से बैंक लोन लेकर बना है। इस होटल का नाम 'तड़का' है। इसमें दीवारों पर सिमेन्ट के बाद पहाड़ी माटी से लेप दिया है। यह हमारे पहाड़ की असल औकात का परिचायक है और हाँ बाहर लगा वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली वाला साईनबोर्ड ऐसा लगता है जैसे वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली कोई खिलाड़ी रहा हो जो बैंकलोन का एड करता हो। 

बहरहाल रात को तड़के में 'तड़के' के सिवा कुछ विशेष तो मिला नहीं। सुबह देर से पानी गरम पानी मिला, जगदीश और इर्जा व छोटी बिटिया से देर तक बतियाने के समय पर कटौती करनी पड़ी। बस देल जैसी पूज के चला आया। जगदीश उस समय अशोक पाण्डे की किताब 'कशमीर नामा' पढ़ रहा था। बारहाल आज में गेवाड़ घाटी की तरफ बढने वाला था और रंगीली गेवाड़ के साथियों से मिलने की आतुरता को पंख मिले हम फिर एक बार रामगंगा के किनारे किनारे निकल पड़े।


अनिल कार्की, उत्तराखंड के कुमाऊँ के पहाड़ों में बसे समाज की ठसक लिए हिंदी के युवा कवि, कहानीकार और लेखक हैं। अपने अंचल की भाषा, संस्कृति, ज्ञान और समूचे जीवन को अपने कथन की विशिष्ट शैली में पिरोए उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नयी भाषा से रूबरू कराया है। anilsingh.karki@gmail.com पर उनसे संपर्क किया जा सकता है।