यात्रा: एक नदी से दूसरी नदी की क्षेम-कुशल (पहली किस्त)

यह यात्रा संस्मरण मैंने पश्चिमी रामगंगा के इलाकों में घूमते हुए लिखा है। मकसद स्पष्ट है कि मैं पूर्वीरामगंगा के इलाके से आता हूँ, मैंने सोचा कि क्यों न यात्रा के बहाने दोनों नदियों के सामाजिक, पर्यावणीय, ऐतहासिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक सन्दर्भों को वर्तमान के आईने में देखा जाय पता नहीं इसमें कहाँ तक सफल हो पाया पर इसी के मध्यनज़र यह एक कोशिश की है। इसे मैं पत्रशैली में लिख रहा हूँ जिसको मैंने नाम दिया है 'पूर्वी राम को पश्चिमी रामगंगा की कुशल बात'। 

Photo Credit : http://distancetravelling.com

(कोसी से रानीखेत , रानीखेत से ताडीखेत, सोनी, रीचि, भतरोजखान, मोहान, चिमटा और मरचुला, खुमाण मौलेखाल,जालजीखाल, मानीला, जैनल, भिकियासेंण, स्यालदे, देघाट, चैखुटिया, द्ववाराहाट से अल्मोड़ा वापसी!) 

जै हिमाल!
प्रिय पूर्वी राम! मैं जब तुम्हें देखता था तो सोचता था कि दुनिया में कोई भी दूसरा तुम्हारी तरह नहीं होगा। मेरा नंगा-भुतंगा बचपन इस वक्त कहीं अतीत से झाँक रहा है। इस वक्त में दुवा कर रहा हूँ कि मेरी प्यारी दादी रामगंगा तुम्हारी नीलीगात में कभी झुर्रियां न पड़े। मैं इस वक्त तुम्हें दिल से याद कर रहा हूँ। जानती हो क्यों? मैं ही बता देता हूँ, मैं तुम्हारी बहन पश्चिमी रामगंगा से मिल रहा हूँ और तुम्हें उसकी कुशलबात भेज रहा हूँ।

सुनो! पूर्वी यह पश्चिमी भी तुम्हारी तरह ही बूढ़ी हो गई है। तुमसे कुछ ज्यादा ही मंथर गति से चलती है। लगता है हर मोड़ पर सुस्ता सी रही हो। तुम्हारे साथ तो हिमालबूबू है जो तुम्हारी सेहत का ख़्याल रखता है। हिमाल खुद भी बूढ़ा नहीं होता न तुम्हें होने देता है। पश्चिमीरामगंगा के साथ खुश्क बेरोजगार पहाड़बूबू है, जहाँ इस साल बरखा के छीटे भी ढ़ग से नहीं पड़े। पहाड़बूबू खुद को जो सम्भाले या पश्चिमी को, इसीलिए पश्चिमी ह्यून (बर्फ़ के दिनों) में ही कमजोर सी दिखने लगी है, जेठ में जाने क्या होगा।

पश्चिमी के घाट बहुत चैड़े है। मुझे लगता है पश्चिमीरामगंगा बच्चों के साथ कमसे कम तुम्हारी तरह तो पेश नहीं आती होगी मैं यह यकीनन कह सकता हूँ। तुम्हें याद है जब में पहली बार तुम्हारे पानी में उतरा था, तुमने मुझे अपने बहाव से डराया था और मैं बमुश्किल तुम्हारे छाल पर पैर जमा पाया था। मुझे याद है मैं तब तक तुम्हारे पास नहीं आया जब तक मैंने तुमसे लगी रिठगाड़ में तैरना नहीं सीख लिया।

ओह! आज तुम्हें याद करते हुए मुझे वह छोटी सी गाड़ याद आ गई। पिछली बार जब तुम्हारी बहु और मैं तुमसे मिलने आये थे मैंने देखा कि तुम्हारे पास आने वाली यह रिठगाड़ लगभग सूख गई। मुझे कितना दुख हुआ था जब मैंने सुना कि इस गाड़ के सूखने का कारण पीछे ठांगागाँव के लोग हैं। इस गाँव के लोगों ने अपनी ज़मीनें खड़िया खदानों के मालिकों को बेच दी हैं और खान से पूरी गाड़ सूख गई है। बगल के गाँव गुरना के खेत बंजर हो गये है क्योंकि गाड़़ से आने वाली गूल भी खड़िया खदान में धंस गई।

खैर! तुमसे क्या शिकायत करूं गलती तो हमारी ही है। कल मैंने मरचूला में खाना खाया यह पश्चिमी रामगंगा का ’दोसानी’ इलाका है जहाँ हम ’कुमोगढ़’ हो जाते हैं। यहाँ से सामने दूसरी धार में जिला पौड़ी है। लोगों ने बताया कि सामने लगे गढ़वाल के इस इलाके के विधायक सतपाल महाराज हैं जो आजकल तुम्हें पंचेश्वर बाँध में बांधने के लिए अमादा हैं और उत्तराखण्ड राज्य के पर्यटनमंत्री है। मैं पश्चिमी रामगंगा से कह दूंगा कि वह उन्हें समझाये, पर पश्चिमी की क्या मजाल कि वह किसी को समझा सके। बेचारी खुद ही खनन माफियाओं के हाथों जगह-जगह उधेड़ी जा रही है। फिर भी कहूँगा।

मरचुला से धुमाकोट महज 36 किलोमीटर है। थलीसैण 102 और पौड़ी ज़िला मुख्यालय 206 किलोमीटर। लोकनिमार्ण विभाग के लगे इस हरे बोर्ड में सल्ट की दूरी को ढूंगे से घिस के मिटा दिया गया है, ऐसे ही दिगोलीखाल और भिकियासैंण की दूरिया भी ढ़ूंगे से घिस-घिस के मिटा दिया है। मुझे लग रहा सड़क विभाग ने इसे गल्त लिख दिया होगा। जानती हो पूर्वी, पश्चिमी के रिवाड़ के एक ढाबे में एक महिला खाना बेच रही थी। मैंने देखा कि वहाँ एक रीठगाड़ की तरह ही छोटी गाड़ थी, मरचुला नाम की। उसके किनारे खूब रिर्जोट है कुछ ज़मीनें बिक गई थी, कुछ और बिकेंगी।

मोहान उतरने से पूर्व जब हम ताड़ीखेत में थे (ताड़ीखेत आज़ादी के समय में आन्दोलनकारियों की अकादमी कहा जाता था।)  और तुम्हारी बहन पश्चिमी से मिलने हम जब नीचे उतर रहे थे तो मैंने देखा कि जिन जंगलों से निकले उनमें जो रूख डाले थे वही हमारी घाटी में भी पाये जाते हैं, लकिन यहाँ साल का पेड़ छोटा बुनिया होता है, सनसना सीधा नहीं। नीचे मोहान में उतर के जब जिमकार्बेट के आस पास आये तो लगा जैसे भाभर पहुँच गये वहाँ खूब मजदूरों की झोपडियों हैं, बांस के संटियों वाली। जिन झोपड़ियों को उन्होंने लाल गेरू से लीप के चमकाया है। यह झोपडियां रिर्जोटों को मुंह चिड़ाते हुए बताती हैं कि घर और होटल मेे क्या अन्तर है। और हाँ! यहाँ  के धार पहाड़ बहुत उदासिले हैं दूर-दूर तक यहाँ सड़क पहाड़ों के सर पर बनी है। जबकि पूर्वी तुम्हारे यहाँ तो बगड़-बगड़ तुम्हारे दगड़ बहुत लम्बा चलना होता है। तुम नज़रों से ओझल नहीं होती यहाँ तुम्हारी बहन एक कौने में मिलती है और उनता ही मिलती है जितना रास्ते में आ जाती है। इस अंतिम पंक्ति से मुझे आलोक धन्वा की यह कविता याद आ रही है..

इछामती और मेघना
महानंदा
रावी और झेलम
गंगा गोदावरी
नर्मदा और घाघरा
नाम लेते हुए भी तकलीफ होती है..
उनसे उतनी ही मुलाकात होती है
जितनी वे रास्ते में आ जाती हैं..
और उस समय भी दिमाग कितना कम
पास जा पाता है..
दिमाग तो भरा रहता है
लुटेरों के बाज़ार के शोर से।

बारहाल में गेवाड़ घाटी सालम और की तरफ बढूंगा। ओह मुझे याद आया हमारी बहन रजुला का क्या इस इलाके से कोई संबन्ध था? यहीं इसी तरफ तो था उसका मालूसाही। खैर! मैं अभी केवल उसे याद करूंगा। हम खुमाड़ में हैं, यह सल्ट है और सुनो पूर्वी यहाँ एक भौत भैंकर कक्षा एक से लेकर बीएड तक का प्राइवेट स्कूल है। यह स्कूल यहाँ के पूर्व विधायक रणजीत सिंह का है। बाप रे! इस डाँणे में इतना बड़ा उपक्रम मैं चकित हूँ। बगल में एक प्रायमरी है कुल गिन के 16 बच्चे हैं। जो लालबनीन लगा उछल-उछल के पीटी कर रहे हैं। ऐसे लग रहे जैसे कुछ थोड़े बुराँश पहाड़ के सर पे नाच रहें हों। बाँकी बुराँश कोई शहरी जादूगर तोड़ ले गया हो जूस बनाने को।

हम मौलेखाल नाम की जगह पर है। खाल नाम सुन लगता कि यहाँ कभी पुरखों ने पानी को रोकने के लिए खालें बनायी होंगी, क्योंकि पानी की दिक्कत इस इलाके में है। कोई कितना ही कुछ कर ले पानी और जवानी कहाँ रूक रही पहाड़ में? पानी रूक रहा है तो बाँध बनकर और जवानी रूक रही है तो ठेकदार बनकर। दोनों ही हमारे किस काम के? मौलेखाल नाम की जगह धार में है जिसके दोनों ओर पहाड़ों के आर-पार झांका जा सकता है। यहाँ पर भौत बड़े-बडे़ पहाड़ है वे भी लगभग नंगे। और हाँ उनके टूके एकदम ताम्खोरी की तरह चमक रहे हैं क्योंकि सूरज धरीता हो रहा है और धूप पहाड़ों-पहाड़ सिमट रही है। सूखा भूरा सिरूघास पीला स्वर्णपन लिए दमक रहा है। इन पहाड़ों को देख के लगा कि बाप रे! पुरखे भी बडे़ सनकी रहे होंगे हमारी तरह के ही जिन्होनें इन दूरूह पहाड़ों पर भी धान उगा लिये।

अरे ओ पूर्वी तुम सुन रही हो ना! नरैणा, झिमार और डोटियाल व मानीला के रास्ते में आते हुए नीचे घाटी में विपना गाँव भी है। मुझे पता चला कि चर्चित कफल्टा काण्ड में जो दलित मारे गये वे इसी गाँव से बारात ले के चले थे सो मन उदास हुआ कि अब भी लोग जात-पात पर अटके हैं। यहाँ भी डोटियाल नाम की एक जगह है। मेरे सर पर खुखरी लगी गोरख्याली टोपी देख मेरे साथ चल रहे दिवान दा मुझे चिड़ा रहे हैं, "भाई ये डोटियाल भी कहाँ से कहाँ पहुँच गये।" मैंने कहा "हिमाल के आर पार फैले डोटियाल।" सड़कों में बहुत जगहों पर डोटियाल नाम के पड़ाव मिलते हैं, लगता है यह सड़क निमार्ण के दौरान लोक निमार्ण विभाग के सुदूर पश्चिमी मजदूरों के यह पड़ाव रहे होगें। इस जगह का नाम सुनते ही मुझे शिरीष कुमार मौर्य की लिखी कविता ’गैंगमेट’ याद आ रही है।

बहुत शानदार है यह नाम
और थोड़ा अजीब भी
एक ही साथ
जिसमें वीर भी है
और बहादुर भी
यहाँ से आगे तक
22.4 किलोमीटर सड़क
जिन मजदूरों ने बनायी
उनका उत्साही गैंग लीडर रहा होगा ये
या कोई उम्रदराज मुखिया
लोनिवि की भाषा
बस इतनी ही
समझ आती है मुझे
दूर नेपाल के किन्हीं गाँवों से
आए मजदूर
उन गाँवों से
जहाँ आज भी मीलों दूर हैं
सड़कें
यों वे बनायी जाती रहेंगी
हमेशा
लिखे जाते रहेगे कहीं-कहीं पर
उन्हें बनाने के बाद
गायब हो जाने वाले कुछ नाम
1984 में कच्ची सड़क पर
डामर बिछाने आए
वे बाँकुरे
अब न जाने कहाँ गए
पर आज तलक धुंधलाया नहीं
उनके अगुआ का ये नाम
बिना यह जाने
कि किसके लिए और क्यों बनायी जाती हैं
सड़कें
वे बनाते रहेंगे उन्हें
बिना उन पर चले
बिना कुछ कहे
उन सरल हृदय अनपढ़.असभ्यों को नहीं
हमारी सभ्यता को होगी
सड़क की जरूरत
बर्बरता की तरफ जाने के लिए
और बर्बरों को भी
सभ्यताओं तक आने के लिए। 

पूर्वीराम अल्मोड़ा के लोग हम पिथौरागढ़ वालों को डोटियाल ही कहते हैं। मैंने कहा, हाँ है हम डोटियाल। अरूण नदी से लेकर कर्णाली, भेरी, रूपाली काली, गोरी, धौली, राम, रोंतीस तक न जाने कहाँ तक खैर यह तो मजाक की बात हुई। डोटियाल नाम की इस जगह से हिमालबूबू बहुत चमक रहा है। बांज बुराँश कुछ-कुछ ओट से लुक्कीपाल जैसी खेलता हुआ। मानीला पहुँचा तो लगा सरग पहुँच गया। वैसे भी हम बगड़ियों के लिए धूरे बहुत रोंमाचक होते हैं। नीचे बगड़ में तो जोर से बोलना पड़ता है। सुनो राम जब मैं पहली बार शहर आकर लोगों से बोलने लगा तो इतनी ज़ोर से घर्रा के बोला कि सबने कहा कि धीरे बोलो, मैने कहा हमारी राम ने हमें ज़ोर से बोलना सिखाया है, ताकि हमारी आवाज़ को उसके दोनों किनारे सुन सकें। तुम सोच नहीं सकती मुझे तुम्हारी सूसाट कितनी अच्छी लगती है। मैंने यहाँ पश्चिमी राम की आवाज सुनकर तुम्हारी आवाज़ को महसूस किया। यह मानीला क्या गज्जब जगह है। मैं यहाँ एक होटल में ठहरा हूँ और सामने दिखता है, हिमालबूबू मेरा पुरखा, नीचे पश्चिमी रामगंगा बांज-बुराँश का घना-गाझिन जंगल अभी बचा है, मंसूरी की तरह सिमेन्ट में नहीं बदला है। आहा! जैसे हमारी तरफ पूर्वी के गायक भानुराम ने काली के लिए लिखा है

तातो पानी तपोवन धारचुला में
ठंडो पानी कठै कालीगंगा मूलै में

या गंभीर दार्मिच ने
रानीरूमल मा गीत में जो लिखा है वैसा ही यहाँ के जनकवि गायक हीरा सिंह राणा ने भी अपनी मानीला पर लिखा है। जानती हो ना हीरा सिंह राणा को? नि:संदेह तुम जानती होगी। यह भी कि ’मेरी मानीला डांडी में तेर बलाई ल्ंिहलो’ उसी कवि का गीत है। मैं इस गीत को सुनता हुआ हिमाल को ताक रहा हूँ। साँझ में यह हिमाल कितना चमकन हो स्टैल मार रहा है पूछो मत।

मेरी मानीला डांडी हम तेरि बल्याई ल्हिलों
तु भगवती छै भवानी तेरि बल्याई ल्हिलों
ककलांसों राणखेत सोनी बिनैका उछयाणि
दुनगिरी नेधणा पालि पूरब उज्याणी
खुटा धुंछ गंगाको पाणी
हम तेरि बल्याई ल्हिलों
पश्चिम् सरद पारी गढ़वालो दुसान
धूमाकोट दिवायल गुलरक डान
यांका बीर सल्टिया मानी
हम तेरि बल्याई ल्हिलों
तली पूजी भूमिया थान
हरूहितै थात रामनगर भौनखाल छतेड़ा
सैणमानुरा माछ जितू पटवावे छानी
हम तेरि बल्याई ल्हिलों
मलि पूजिया दूधातोली
जोरासी देघाट सराई खेत चैनुली स्यालदे
चैखुट की फाट सब त्येकणी चानी
हम तेरि बल्याई ल्हिलों
द्वीथानों का बीचो बीच यो रूपसी डांनी
एक मा सरस्वति रूंछों एक मा भवानी
गाझन घनेला घानी
हम तेरि बल्याई ल्हिलों
मैं छू हिरूं डढोईको पीड़कि गढोई
तेर खुटां ताव ल्यरों यो पीड़ कें बटोई
मेरी बिनती जाय मानी
हम तेरि बल्याई ल्हिलों

ओ पूर्वी रामगंगा क्या मैं कभी तुम्हारे बारे में ऐसा लिख सकूंगा? न भी लिख सका तो तुम्हें जीने का सुख लिखने से बड़ा है। पर हमारी पूर्वी को भी एक हीरा सिंह राणा चाहिए। कब मिलेगा, कौन जानता है। यहाँ गायक ने साणमनुरा की माछ का ज़िक्र भी हुआ है। तुम्हें पता है पिछले दिनों यहाँ कुछ गरीब ग्रामीण मछुआओं को एक बड़ी मछली मारने के अपराध में जेल डाल दिया गया। तुम हंसोगी, पर यह सच है। तुम सोच रही होगी क्या बाँध में मच्छी न मरेंगी? क्या डायनामाइट से ठेकेदार मच्छी नहीं मारते या कि क्या रेता खनन से मछली के जीरे नहीं मरते? फिर वे भोले भाले पंरम्परागत मछैर ही मिले पर्यावरण के नाम पर पीड़ित करने के लिए सरकार को? वैसे तुम्हें पता है वह मच्छी चैमास के दिनों बिसौर से बेहाश थी, जिसे मछैर उठा लाये। उसके कनपोड़ों पर बजरी भर गई होगी, जैसे तुम करती हो चैमास में अपनी ताल की माछी के संग ठीक वैसे ही।

पता है मैं और हमारे एक साथी संदीप दा, हीरा सिंह राणा का गीत सुनते हुए नाच भी नाचे कान पर हाथ लगा के। ओह अब रात के खाने का टैम हो गया इससे आगे की कुशल बात कल करेंगे अगले मोड़ों पर।

.. जारी।

अनिल कार्की, उत्तराखंड के कुमाऊँ के पहाड़ों में बसे समाज की ठसक लिए हिंदी के युवा कवि, कहानीकार और लेखक हैं। अपने अंचल की भाषा, संस्कृति, ज्ञान और समूचे जीवन को अपने कथन की विशिष्ट शैली में पिरोए उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नयी भाषा से रूबरू कराया है। anilsingh.karki@gmail.com पर उनसे संपर्क किया जा सकता है।