आरक्षण के मूल आधार को अब भी आर्थिक नहीं बना पाएगा 'सवर्ण आरक्षण'

"इस बात से आशंकित होने की ज़रुरत मुझे कम लगती है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण का वर्तमान फैसला, आरक्षण के पूरे स्वरूप को आर्थिक आधारित बना देगा. क्योंकि आरक्षण के लिये मूल रूप में विद्यमान सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का मानक ना केवल संविधान में मौजूद है, बल्कि न्यायपालिका द्वारा भी अच्छी तरह स्वीकृत है. हालाँकि sc, st, obc के लिये 10% सीटें जिनमे वे लड़ सकते थे, अब मौजूद नहीं होंगी. लेकिन सामान्य वर्ग को इसका कोई विशेष फायदा नहीं होगा. क्योकि आय का जो मानक तय किया गया है, उसमें सामान्य वर्ग की लगभग 80 से 90% आबादी आ जायेगी और सामान्य वर्ग के वास्तव में गरीब वर्ग (के लोगों) को इसका नुक़सान उठाना पड़ेगा.." 



124वाँ संविधान संशोधन पारित हो चुका है और सामान्य वर्ग के आर्थिक रुप से पिछड़े वर्ग के लिये शिक्षा और नौकरियों में 10% आरक्षण की व्यवस्था का रास्ता तैयार है. इस संविधान संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी जा चुकी है, इस पूरे प्रकरण पर पढ़ें यह विश्लेषण.
  1.  संविधान के अनुच्छेद 15और अनुच्छेद 16 के अनुसार इस संशोधन से पहले ,राज्य अनुसूचित जातियों, जनजातियों और सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए नागरिकों के वर्ग को आरक्षण देता था, जिनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व ना हो लेकिन अब राज्य नये संशोधन से केवल आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग (के लोगों) को आरक्षण दे सकता है.
  2. हांलाकी पूर्व में यथासंशोधित संविधान में आर्थिक पिछड़ेपन की बात नही थी, लेकिन इसका यह मतलब नही है कि कोई आर्थिक पैमाना नही था. obc के लिये (अन्य पिछडा वर्ग ,जाति नहीं) इन्द्रा साहनी केस के बाद आर्थिक रूप से सीमा पहले से थी जो कि नकारात्मक रूप से आरक्षण पर मर्यादा लगाती है.
  3. इस बात से आशंकित होने की ज़रुरत मुझे कम लगती है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण का वर्तमान फैसला, आरक्षण के पूरे स्वरूप को आर्थिक आधारित बना देगा. क्योंकि आरक्षण के लिये मूल रूप में विद्यमान सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का मानक ना केवल संविधान में मौजूद है, बल्कि न्यायपालिका द्वारा भी अच्छी तरह स्वीकृत है. हालाँकि sc, st, obc के लिये 10% सीटें जिनमे वे लड़ सकते थे, अब मौजूद नहीं होंगी. लेकिन सामान्य वर्ग को इसका कोई विशेष फायदा नहीं होगा. क्योकि आय का जो मानक तय किया गया है, उसमें सामान्य वर्ग की लगभग 80 से 90% आबादी आ जायेगी और सामान्य वर्ग के वास्तव में गरीब वर्ग (के लोगों) को इसका नुक़सान उठाना पड़ेगा. 
  4. ओपन रहने वाली 10% सीटों के नुक़सान के अलावा sc, st, obc के लिये यह प्रावधान काफ़ी फ़ायदेमन्द हो सकते हैं अगर वो राजनीतिक और कानूनी लडाई ढंग से लड़ पाये तो, क्योंकि मौजूदा स्वरूप में सामान्य वर्ग का 10% आरक्षण sc, st, obc आरक्षण के कई पहलुओं के लिये रास्ता खोल सकता है जैसे-

  • यह 50% की सीमा को तोड़ देता है. अब obc आबादी के अनुपात में आरक्षण और जातिगत जन गणना को अधिक मुखर होकर मांग सकता है. 
  • यह केवल आर्थिक 'पिछड़े पन' की बात करता है. आरक्षण के लिये अब तक अनिवार्य अल्प प्रतिनिधित्व और कौशल के अप्रभावित रहने की शर्त इसमें नही है. ध्यान रहे क्वांटीफायेबल डाटा और कौशल के अप्रभावित रहने की बात sc, st के प्रोमोशन के पदों में आरक्षण के ख़िलाफ़ महत्वपूर्ण न्यायिक अड़चन है. अगर न्यायपालिका सामान्य वर्ग के आरक्षण को इन शर्तों के बिना लागू होने देती है तो sc, st का प्रोमोशन के पदों में आरक्षण का रास्ता भी साफ़ हो जायेगा, क्योकि न्यायपालिका ने जाति को आरक्षण का आधार पहले से माना है और वर्तमान आर्थिक आरक्षण जातिगत आरक्षण की कई बाधाओं को दूर कर सकता है. शायद इसलिये ही धुर आरक्षण विरोधी सवर्ण संगठन ने इसे न्यायपालिका में चुनौती दी है.

मोहन आर्या, टिप्पणीकार है. प्रैक्सिस के लिए नियमित लेख लिखते हैं.