उत्तरायणी पर एक और 'कुली बेगार' के ख़ात्मे का संकल्प

यदि इस बार प्राधिकरण के खिलाफ जनता उसी तरह संगठित हो सकी, जैसा कि प्राधिकरण हटाओ मोर्चा उम्मीद कर रहा है, तो यह निश्चित रूप में 1921 के कुली बेगार आन्दोलन की पुनरावृत्ति होगी.
-केशव भट्ट


98 वर्ष पहले उत्तरायणी (मकर संक्रांति) के अवसर पर कुमाऊँ की जनता ने 14 जनवरी 1921 को बागेश्वर में कुली बेगार के रजिस्टरों को सरयू व गोमती के संगम में बहाकर एक उत्पीड़क परम्परा का अन्त किया था. यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ पहली महत्वपूर्ण लड़ाई जीत थी. तब इस आन्दोलन का नेतृत्व बद्री दत्त पाण्डे ने किया था और आंदोलन के सफल होने के बाद उन्हें ’कुमाऊं केसरी’ की उपाधि भी दी गयी. महात्मा गांधी सहित देश के सभी बड़े नेताओं ने उत्तराखंड के सुदूर हिस्से में हुई इस अहिंसक क्रांति को हैरत भरी निगाह से देखा और सराहना की. आज एक बार फिर बागेश्वर में उत्तराखंड के लोग इस इतिहास को दोहराने के लिये कमर कसने लगे हैं. इस बार यह आन्दोलन विकास प्राधिकरणों के ख़िलाफ़ लड़ा जा रहा है.

इस वक्त बागेश्वर, अल्मोड़ा और प्रदेश के सभी पहाड़ी जिलों का माहौल गर्म है. नेताओं और अफ़सरानों ने ज़िला विकास प्राधिकरण के नाम पर काले क़ानून का ’विकास’ को जनता पर थोप दिया है. राज्य सरकार की ओर से जो प्राधिकरण जनता पर जबरन थोपा गया है वह किसी भी तरह से पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप सही नही है. पहाड़ी क्षेत्रों में बेतरतीब ढंग से बन चुके मकानों पर अब प्राधिकरण का काला कानून लादना किसी की समझ में नहीं आ रहा है. लोग अपने पुराने मकान की मरम्मत भी अब इस काले कानून की वजह से नहीं कर पा रहे हैं. जिन्हें इस प्राधिकरण के बारे में पता नहीं है, वो यदि अपने मकान की मरम्मत करना शुरू करते हैं तो प्राधिकरण वाले कुछ दिनों तक उसे चुपचाप काम करते हुए देखते रहते हैं. जैसे ही वह निर्माण पूरा होने को होता है प्राधिकरण वाले उसे नोटिस थमा देते हैं. अब यहीं से प्राधिकरण के खाने-पीने का असली खेल शुरू होता है. कुछ समय तक नियम-कानूनों का हवाला दे प्राधिकरण उसे डरा-धमका के अपना पेट भर फिर चुप्पी साध लेता है. लेकिन यदि किसी ने नियम-कानूनों के ख़िलाफ़ आवाज उठाई तो उसे प्राधिकरण वाले कोर्ट-कचहरी में पटक देते हैं.

प्राधिकरण के नियम व शर्तों की पूर्ण जानकारी जनता को न देकर शासन द्वारा जनता के ऊपर तुग़लकी फरमान थोप दिया गया है. सत्ताधारी दल के विधायकों की चुप्पी से जनता भी हैरान है कि वोट मांगते वक़्त तो ये बहुत ही नम्र होते हैं लेकिन जीतने के बाद ही इनके तेवर व्यवस्था को दुरुस्त करने के बजाय जनता के ख़िलाफ़ ही क्यों हो जाते होंगे? प्राधिकरण की ओर से थोपे गए, नियम इतने टेढ़े हैं कि पहाड़ में आम आदमी अपनी छत की कल्पना कभी पूरी नही कर सकता. जनता भी समझती है कि सत्ता तक पहुंच वालों के लिए ये नियम भी कोई मायने नहीं रखते हैं. वो अपने काम आराम से कर लेते हैं.

प्राधिकरण के नियम हिटलशाही की ही तरह हैं. अल्मोड़ा की जनता प्राधिकरण के लागू होने के बाद से ही लगातार आंदोलन कर रही है. इस बीच बागेश्वर में भी जब आम जनता को अपने मकानों के नक्शे बनाने में दिक्कतें आनी शुरू हुई तो उन्हें प्राधिकरण के नियम-कानून दैत्य के तीखे दांतों की तरह महसूस हुए. बागेश्वर में प्राधिकरण हटाओ मोर्चा का गठन कर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ें बुलंद होने लगी है. जनता का कहना है कि सरकार द्वारा जो प्राधिकरण लागू किया गया, वह पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थियों के अनुरूप नहीं है. जनता जबरन थोपे गए इस प्राधिकरण को वापस करवाने की मांग पर आंदोलन पर डटी हुई है.

प्राधिकरण हटाओ मोर्चा का कहना है कि बागेश्वर जिले सहित पूरे प्रदेश में थोपे गए विकास प्राधिकरण से आम जनता त्रस्त है. कई जगह आंदोलन हो रहे हैं. विधानसभा में भी यह प्रकरण उठाया जा चुका है. इस मुद्दे के खिलाफ लोग आंदोलित हैं. इसे ज्यादा दिन तक दबाया नहीं जा सकता है. उन्होंने पत्र के माध्यम से जनप्रतिनिधियों से जनता को इस काले कानून से मुक्त करवाने के लिए अपने स्तर से कार्रवाही करने और इसके खिलाफ आंदोलित लोगों के पक्ष में आने की मांग की है.

उन्होंने कहा कि मोर्चा मकर संक्रांति के दिन दोपहर 12 बजे कुली बेगार की तर्ज पर प्राधिकरण के बजट नोटिफिकेशन की प्रतियों को सरयू नदी में प्रवाहित करेगे. इसके बाद भी यदि जनप्रितिनिधि अपनी भूमिका में खरे नहीं उतरे तो उनके ख़िलाफ़ भी माहौल तैयार किया जाएगा. लोगों को जागरूक करने के लिए नुक्कड़ सभाएं आयोजित होंगी और राज्य स्तर के आंदोलनकारियों से भी सहयोग लिया जाएगा.

इस आन्दोलन को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखें. अंग्रेजों के अपने स्वःसुखाय नियमों में से एक नियम था, 'कुली बेगार.' आम आदमी से कुली का काम कराया जाता था और इसके लिए ग्रामों के प्रधानों को इसकी ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी कि वो एक निश्चित अवधि के लिये निश्चित संख्या में कुलियों को शासक वर्ग की सेवा में हाजिर करवाए. इसके लिए बाकायदा एक रजिस्टर भी बनाया गया था, जिसमें सभी ग्रामीणों के नाम दर्ज़ थे. सभी को बारी-बारी यह काम करने के लिये बाध्य किया जाता था.

प्रधानों, जमींदारों और पटवारियों की मिलीभगत के साथ ही आपसी भेद-भाव के कारण लोगों में असन्तोष बढ़ता गया. गांव के प्रधान और पटवारी अपने व्यक्तिगत हितों को साधने और खुन्नस निकालने के लिये इस कुरीति को खूब बढ़ावा देते थे. अकसर इस काम में लगे कुली बेगारों को फिरंगियों की कमोड के अलावा उनके गंदे कपड़ों को भी ढोना पड़ता था. इसके अलावा फिरंगी कुलियों का शारीरिक व मानसिक शोषण भी करते रहते थे.

लोगों का गुस्सा फूटा तो 14 जनवरी 1921 को बागेश्वर में मकर संक्रांति के दिन बद्रीदत्त पांडे समेत कई दिग्गज क्रांतिकारी नेता पहुंचे. उत्तरायणी मेले में जुलूस प्रदर्शन के सांथ ही सभाओं का दौर चला. जनता ने कुली बेगार के रजिस्टर सरयू में बहाने के बाद बेगार नहीं देने की शपथ ली. तब आंदोलन का इतना गहरा असर हुआ कि बागेश्वर आए असिस्टेंट कमिश्नर डायबिल और अन्य अधिकारियों को कुली तक नहीं मिले. इस आंदोलन के बाद कुली बेगार प्रथा खत्म हो गई.

जनता के इस आंदोलन को तब महात्मा गांधी ने 'रक्तहीन क्रांति' का नाम दिया था. वे 1929 में बागेश्वर आए और चौक बाज़ार समेत नुमाइश खेत मैदान में लोगेां से रूबरू हुए. उस वक़्त कुली बेगार का आन्दोलन कुमाऊँ परिषद के नेतृत्व में चला था, जिसका बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांगेेस में विलय हो गया. तब से हर वर्ष मकर संक्रांति पर सरयू बड़ में कांग्रेस द्वारा मंच लगाकर लोगों में जन जागरण की परम्परा भी शुरू की गई. यह परम्परा अब कांग्रेस वाले ही नहीं, बल्कि सारे राजनैतिक दल ढो रहे हैं. अब यह मंच जनता को बरगलाने की औपचारिकता मात्र रह गया है.

यदि इस बार प्राधिकरण के खिलाफ जनता उसी तरह संगठित हो सकी, जैसा कि प्राधिकरण हटाओ मोर्चा उम्मीद कर रहा है, तो यह निश्चित रूप में 1921 के कुली बेगार आन्दोलन की पुनरावृत्ति होगी.

जनता का कहना है कि पहाड़ में इस काले कानून से हर कोई त्रस्त है. लोगों के पास ज़मीन काफी है लेकिन फिर भी प्राधिकरण के काले कानून ने उन्हें आदिवासी जैसा बनने पर मजबूर कर दिया है.