गर्म होते यूरोप का मतलब

"..लगातार गर्म हो रही इस दुनिया में, यूरोप में इसे समझना और आसान हो जाता है क्योंकि मूलत: ठंडे मुल्कों में जब गर्मी बढ़ी है तो उसका असर साफ़ दिखाई दे रहा है. यूरोप में भी आज तक दर्ज सर्वाधिक 10 गर्म वर्ष में से 9 वर्ष सन् 2000 के बाद के ही रहे हैं. और 1965 के बाद से ऐसा कोई साल नहीं रहा है जो कि सबसे ठंडे सालों में शामिल रहा हो। दसियों हज़ार लोग यूरोप में पिछले एक दशक में हीट वेव्स की चपेट में आकर मारे गए हैं.."

-रोहित जोशी



2016 में यह कोई मार्च का महीना रहा होगा, जर्मनी के बॉन शहर में उस रोज़ तेज़ धूप थी. लंच का समय हो चला था, मैं डॉयचे वैले के दफ़्तर में अपने सहयोगियों के साथ, पास ही मौजूद डीएलएफ की कैंटीन में लंच के लिए जा रहा था. यूरोप की ठंडी तासीर के लिहाज़ से मार्च की शुरुआत का यह कोई एक दिन, अप्रत्याशित तौर पर उमस भरा था.

डॉयचे वैले के दक्षिण एशियाई भाषाओं की सेवा के प्रमुख ग्राहम लुकस ने मार्च के महीने में यूरोप में इस तरह की गर्मी पर चिंता जताते हुए कहा, "यह साल काफी गर्म होने वाला है." उन्होंने हाल ही में किसी पर्यावरण पत्रिका में यूरोप में लगातार बढ़ रही गर्मी पर कोई आलेख पढ़ा था और उसके हवाले से उनका कहना था, "अगर यूरोप में आने वाले सालों में इस तरह गर्मी बढ़ती रहेगी तो जल्द ही यह महामारी का रूप भी ले सकती है."

उन्होंने ज़िक्र किया कि गर्म जलवायु से होने वाली कई ऐसी बीमारियां जो यूरोप में अब तक नहीं होती आई हैं उनका प्रवेश यूरोप में हो जाने की आशंका है और क्योंकि यूरोप में बसी नृजाति का इम्यून सिस्टम, वंशानुगत तौर पर इन बीमारियों से लड़ने के लिए इवॉल्व नहीं हुआ है, इसलिए यह आने वाले समय में यूरोपीय देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाला है. उन्होंने इन बीमारियों में डेंगू का भी ज़िक्र किया था.

हालांकि मेरे लिए यह आश्चर्य की बात थी कि डेंगू जैसी बीमारियां जो हमारे देश में सालाना हज़ारों मौतों का सबब बनती हैं, यूरोप उनसे नावाक़िफ है. और यह बात तब मुझे और ज्यादा आश्चर्य में डालने वाली बन गई जब मेरे अपार्टमेंट में मेरी एक पड़ोसी से किसी शाम कॉफी की चुस्कियों के साथ हो रही बातचीत में उन्होंने बताया कि डेंगू जैसी किसी बीमारी के बारे में उन्होंने आज तक सुना ही नहीं था.

यूरोप में गर्मी की लहर

इस साल यूरोप ने जबरदस्त गर्मी झेली है. कई इलाक़ों का तापमान सामान्य ये अप्रत्याशित तौर पर बढ़ गया जिसने जन-जीवन को काफी परेशानी में डाल दिया. हम हिंदुस्तानियों के लिए हालांकि 30 डिग्री तापमान कोई खासा गर्म नहीं है लेकिन ब्रिटेन और आयरलैंड जैसे देशों के लिए यह तापमान काफी ज्यादा है, जहां कि सामन्यतया जून के महीने में भी तापमान 20 डिग्री से ज्यादा नहीं होता है.

इस साल 28 जून को स्कॉटलैंड के ग्लासगो में तापमान 31.9 डिग्री जा पहुंचा जो कि अब तक के दर्ज तापमानों में सबसे गर्म दिन था. और इसी तरह आयरलैंड के शैनन शहर का तापमान अब तक के सर्वाधिक तापमान 32 डिग्री तक जा पहुंचा. उधर जर्मनी में मई और जून के महीनों में तापमान सामान्यतया 30 डिग्री तक पहुंचा रहा और जॉर्जिया में 4 जुलाई को सारे रिकॉर्ड तोड़ता हुआ पारा 40.5 डिग्री सैल्सियस तक जा पहुंचा.

हालांकि यह साल ना सिर्फ यूरोप बल्कि पूरी दुनिया में चिंताजनक स्थिति तक गर्म रहा है लेकिन क्योंकि मूलत: ठंडे माने जाने वाले यूरोप के वातावरण में इस गर्मी को जिस तरह महसूस किया गया है उसने पूरी दुनिया का ध्यान ग्लोबल वॉर्मिंग की बढ़ती चुनौती की ओर खींचा है.

क्लाइमेट चेंज है वजह

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस गर्मी की वजह ग्लोबल वार्मिंग रही है, जो कि मौजूदा दुनिया में तमाम राजनैतिक विचारधारों के परे जाकर सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है.

क्लाइमेट चेंज के चलते साल दर साल गर्मी बढ़ती जा रही है. आज तक दर्ज सर्वाधिक 10 गर्म वर्ष में से 9 वर्ष सन् 2000 के बाद के ही रहे हैं. अमेरिका के नैश्नल क्लाइमेटिक डाटा सैंटर (NCDC) के मुताबिक 1911 के बाद से ऐसा कोई साल नहीं आया है जो कि सबसे ठंडे सालों में शामिल रहा हो.

ऐसे में लगातार गर्म हो रही इस दुनिया में, यूरोप में इसे समझना और आसान हो जाता है क्योंकि मूलत: ठंडे मुल्कों में जब गर्मी बढ़ी है तो उसका असर साफ़ दिखाई दे रहा है. यूरोप में भी आज तक दर्ज सर्वाधिक 10 गर्म वर्ष में से 9 वर्ष सन् 2000 के बाद के ही रहे हैं. और 1965 के बाद से ऐसा कोई साल नहीं रहा है जो कि सबसे ठंडे सालों में शामिल रहा हो। दसियों हज़ार लोग यूरोप में पिछले एक दशक में हीट वेव्स की चपेट में आकर मारे गए हैं.

गर्मी के अगले 4 और साल

उधर वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी लगातार 4 सालों तक इसी तरह गर्मी बरकरार रहेगी। फ्रैंच और डच शोधकर्ताओं ने यह भविष्यवाणी की है, ''अगले चार साल गर्मी भरे रहेंगे'' और जिसमें ''तापमान अप्रत्याशित रूप से बढ़ सकता है.''

फ्रांस की ब्रेस्ट यूनिवर्सिटी के लैबोरेट्री ऑफ़ ओसियन फिज़िक्स एंड रिमोट सेंसिंग और नीदरलैंड्स के रॉयल निदरलैंड्स मेटेरॉलॉजिकल इंस्टिट्यूट ने एक ऐसा वैज्ञानिक मॉडल तैयार किया है जिससे कि आगामी वर्षों के वैश्विक तापमान का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इन्हीं वैज्ञनिकों ने घोषणा की है कि 2018 से लेकर 2022 तक गर्मी और बढ़ती जाएगी.

वैज्ञानिकों की यह भी राय है कि मानवीय हस्तक्षेप और लापरवाही यूरोप के बढ़ते तापमान की वजह है और अगर इसकी रोकथाम करनी है तो बेशक मानवीय समाजों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होकर इसके ह्रास में योगदान देने वाले अपने हस्तक्षेप को कम करना होगा. हालांकि इसके लिए सभी देश अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सम्मेलनों में शपथ तो लेते दिखते हैं लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस काम होता नहीं दिखाई देता है.