वीडियो : इतिहास ख़ुद को दोहराता है, तानाशाह भी!


यह 'कविता फिल्म' हिंदी के प्रतिनिधि कवि मंगलेश डबराल की कविता 'तानाशाह' पर आधारित है. इसमें चार्ली चैप्लिन की फिल्म 'The Great Dictator' के विजुअल्स का इस्तेमाल किया गया है. हम समूचे विश्व सिनेमा की तरह चार्ली चैप्लिन और उनकी टीम के आभारी हैं.



: तानाशाह :

मंगलेश डबराल 
"तानाशाह को अपने किसी पूर्वज के जीवन का अध्ययन नहीं करना पड़ता। वह उनकी पुरानी तस्वीरों को जेब में नहीं रखता या उनके दिल का एक्स-रे नहीं देखता। यहस्वतःस्फूर्त तरीके से होता है कि हवा में बंदूक की तरह उठा हुआ उसका हाथ या बंधी हुई मुट्ठी के साथ पिस्तौल की नोंक की तरह उठी हुई अंगुली किसी पुराने तानाशाह की याद दिला जाती है या एक काली गुफा जैसा खुला हुआ उसका मुंह इतिहास में किसी ऐसे ही खुले हुए मुंह की नकल बन जाता है।वह अपनी आंखों में काफी कोमलता और मासूमियत लाने की कोशिश करता है लेकिन क्रूरता कोमलता से ज्यादा ताकतवर होती है इसलिए वह एक झिल्ली को भेदती हुई बाहर आती है और इतिहास की सबसे ठंडी क्रूर आंखों में तब्दील हो जाती है। तानाशाह मुस्कराता है भाषण देता है और भरोसा दिलाने की कोशिश करता है कि वह एक मनुष्य है,लेकिन इस कोशिश में उसकी मुद्राएं और भंगिमाएं उन दानवों-दैत्यों-राक्षसों की मुद्राओं का रुप लेती रहती हैं जिनका जिक्र प्राचीन ग्रंथों-गाथाओं-धारणाओं-विश्वासों में मिलता है।
वह सुंदर दिखने की कोशिश करता है,आकर्षक कपड़े पहनता है, बार-बार सज-धज बदलता है ,लेकिन इस पर उसका कोई वश नहीं कि यह सब एक तानाशाह का मेकअप बनकर रह जाता है।
इतिहास में तानाशाह कई बार मर चुका है लेकिन इससे उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उसे लगता है उससे पहले कोई नहीं हुआ है।"