​ईसाईयों के बिना क्रिसमस का मौसम



-संजय श्रीवास्तव

'द हिन्दूसे आशुतोष उपाध्याय द्वारा साभार अनूदित

"...भारत में क्रिसमस की लोकप्रियता से धार्मिक भिन्नताओं का आदर करने की वृत्ति को बढ़ावा नहीं मिला. बल्कि यहां कुछ उल्टा ही नज़ारा दिखाई देता है. उपभोक्तावाद के तहत अस्तित्व के विभिन्न रूपों का उत्पादन व उपभोग तथा विभिन्नताओं का वास्तविक दमन साथ-साथ चलता है. इसलिए हम क्रिसमस के केक का लुत्फ़ लेते हुए हैंमगर चर्चों को जलाए जाने की घटनाओं से परेशान नहीं होते..."

ambassadors.net से साभार
न्यू गुड़गांव में, जहां मैं रहता हूं, क्रिसमस बहुत मायने रखता है. आप मुझे यह बताने के लिए क्षमा करेंगे कि इस बार भी भारतीय जनता पार्टी को वोट देने वाले बहुत सारे लोग अचानक ईसाई बन गये. समूचे गुड़गांव में रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशंस ने क्रिसमस मेले लगाए, बच्चों ने वहां कैरल गीत गाए, सांताओं ने उपहार बांटे और हर उम्र के लोग लाल टोपियां पहनकर एक-दूसरे को क्रिसमस की बधाइयां देते पाए गए. 

गुड़गांव का क्रिसमस, यकीनन, अब राष्ट्रीय दिवस की शक्ल ले चुका है. मेरा वह विवरण इन दिनों देश के कई शहरों में चर्चित 25 दिसंबर के (घर वापसी) आयोजनों पर भी लागू होता है. दूसरी ओर, जब मैं केरल में अपने एक दोस्त को 'मैरी क्रिसमस' कहने के लिए फोन करता हूं तो दूसरी ओर से जवाब ठंडी प्रतिक्रिया मिलती है. दोस्त कहता है कि आज सुबह किसी और ने उसे फोन पर बधाई देते हुए याद दिलाया कि शायद भारत में यह आखिरी क्रिसमस हो. 

हालांकि यह बात (हाल की ईसाई विरोधी हिंसा के मद्देनज़र) मजाक के अंदाज़ में कही गयी, मगर यह उस उफान से कतई मेल नहीं खाती, जहां गैर-ईसाईयों की बड़ी आबादी क्रिसमस मनाती दिखाई दे रही हो. क्या यह संभव है? क्या ऐसा हो सकता है कि हमें बगैर ईसाईयों के क्रिसमस पसंद हो? जिस तरीके से क्रिसमस हम सब के साथ जुड़ गया है, एक बहु-धार्मिक समाज में परिणामविहीन नहीं रह सकता.

मैं जब छोटा था, क्रिसमस एक ख़ास समुदाय से जुड़ा दिन हुआ करता था. उत्तर भारत के ज्यादातर शहरों में लोग इसे 'बड़ा दिन' कहते थे. मुझे सिखाया गया था कि 25 दिसंबर को अगर तुम्हें राह चलते कोई इसाई दिखाई दे तो उसे 'बड़ा दिन मुबारक' कहना न भूलना. 

याद नहीं कि तब शायद किसी को मुबारकबाद देने का मौका मिला. इसलिए यह सबक व्यवहार का हिस्सा बनने के बजाय किताबी बना रहा. लेकिन इसने मुझे एक बात ज़रूर सिखाई, सचेत धर्मनिरपेक्ष तरीके से नहीं बल्कि रोजमर्रा के आम जीवन से- कि यह ख़ास धार्मिक दिन व एक ख़ास धार्मिक समुदाय आपस में जुड़े हुए हैं और भारतीय जीवन का ही एक वैधानिक पहलू हैं. 

एक बच्चे के रूप में, चूंकि क्रिसमस मेरा त्यौहार नहीं था, मैं और मेरे जैसे कई दूसरे इस त्यौहार को एक अन्य समुदाय के त्यौहार के रूप में पहचानते थे. हम मानते थे कि यह हमारे त्यौहार जितना ही वास्तविक और वैधानिक है. मेरी कल्पना में क्रिसमस मेरे जैसे हाड़-मांस के इंसानों द्वारा मनाया जाने वाला एक त्यौहार था, जो एक वास्तविक समुदाय से ताल्लुक रखते थे. 

उनके लिए बड़ा दिन उतना ही महत्वपूर्ण त्यौहार था, जितना मेरे लिए मेरे त्यौहार थे. तब हिन्दू और ईसाई एक-दूसरे के विरोधी नहीं माने जाते थे बल्कि सुपरिभाषित समुदायों के रूप में मौजूद थे. मेरे लिए यह समुदाय वास्तविक था, क्योंकि क्रिसमस और ईसाई एक दूसरे से जुड़े हुए थे.

हाल के दिनों में, जब से हिन्दुओं ने क्रिसमस को अपनाकर मनाना शुरू किया है, हम एक नए युग में प्रवेश कर गए हैं. अब वैधानिक फर्क वाला एक त्यौहार, मौज-मस्ती और जीवनशैली के कर्मकांड में तब्दील हो गया. यह किसी विदेशी अवकाश को अपनाने या एक फ्रिज खरीदने जैसी बात है. अब यह हमें उस समुदाय की वैधानिक पहचान की याद नहीं दिलाता, जिसके लिए क्रिसमस 'शॉपिंग मॉल फेस्टिवल' से कहीं ज्यादा अहमियत रखता है. 

उनके लिए यह अपने समुदाय को परिभाषित करने का आधारभूत तरीका है. किसी दूसरे समुदाय के रीति-रिवाजों और परम्पराओं को मानना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं, मगर यह किसी और दिशा में बढ़ रहा है. जब क्रिसमस 'हमारा' त्यौहार बन जाता है, यह बड़े ही दुखद रूप से औरों को मान्यता देने, सम्मान करने और भिन्नता को स्वीकार करने की हमारी क्षमता को कमजोर कर रहा है. 

क्रिसमस को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने की प्रक्रिया ईसाईयों के प्रति बढ़ती बेरुखी साथ-साथ चल रही हैं. मानो हम कहना चाहते हों कि हम भी इसे उनकी तरह मना सकते हैं और हमें उनकी ज़रुरत नहीं है. साफ़ तौर पर यह ऐसे दौर का प्रतीक है जब ईसाईयों के बिना क्रिसमस संभव है.

एक शॉपिंग फेस्टिवल

एक शॉपिंग फेस्टिवल के रूप में क्रिसमस की खोज का इतिहास पश्चिम में बहुत पुराना है. ख़ास तौर पर 19वीं सदी के उत्तरार्ध के ब्रिटेन में. भारत में इसकी हालिया पुनरावृत्ति का गहरा सम्बन्ध यहां राजनीतिक और उपभोक्ता संस्कृतियों में आये बदलावों से है. 

ठीक यही बात योग के बारे में भी कही जा सकती है, जिसका पश्चिम में जीवनशैली से जुड़ी गतिविधि के रूप में 20वीं सदी में कायांतरण हो गया. उन्होंने योग को इसके दार्शनिक तत्वों से अलग कर दिया. पश्चिम में योग के प्रसार ने भारतीयों के प्रति सहिष्णुता में किसी किस्म की बढ़ोतरी नहीं की. 

इसी प्रकार भारत में क्रिसमस की लोकप्रियता से धार्मिक भिन्नताओं का आदर करने की वृत्ति को बढ़ावा नहीं मिला. बल्कि यहां कुछ उल्टा ही नज़ारा दिखाई देता है. उपभोक्तावाद के तहत अस्तित्व के विभिन्न रूपों का उत्पादन व उपभोग तथा विभिन्नताओं का वास्तविक दमन साथ-साथ चलता है. इसलिए हम क्रिसमस के केक का लुत्फ़ लेते हुए हैं, मगर चर्चों को जलाए जाने की घटनाओं से परेशान नहीं होते.

यह अजब विरोधाभासी स्थिति है. मेरे बचपन से बिलकुल अलग. पहले क्रिसमस हिन्दुओं का त्यौहार नहीं था, लेकिन ईसाईयों को दुश्मन समुदाय के रूप में नहीं देखा जाता था. हालांकि समुदायिक सौहार्द्य का कल्पनालोक तब भी मौजूद नहीं था, लेकिन स्थितियां आज जैसी भी नहीं थीं. 

आज, क्रिसमस बहुसंख्यक समुदाय में जबर्दस्त स्वीकृति पा रहा है- शब्द उस ईमानदारी को व्यक्त नहीं कर पा रहे, जिस ईमानदारी के साथ मेरे मोहल्ले के बच्चे 'साइलेंट नाईट' गा रहे हैं- मगर दहाड़ की बात तो छोड़िये, ईसाई विरोधी भावनाओं और कृत्यों के खिलाफ मुख्यधारा में फुसफुसाहट भी नहीं सुनाई पड़ती. 

The burnt altar of St. Sebastian’s Church at Dilshad Garden in East Delhi on Monday. Photo: S. Subramanium
दिसंबर की शुरुआत में दिल्ली में सेंट सेबेस्टियन चर्च का जला हुआ अहाता
 फोटो साभार : S. Subramanium (THe Hindu)
मुझे याद नहीं मैंने बचपन में कभी 'साइलेंट नाईट' गाया हो या बड़े दिन की मुबारकबाद देने के लिए किसी ईसाई के गुजरने के इन्तजार किया हो, मगर मुझे किसी चर्च को जलाए जाने या घर वापसी कराने जैसी किसी बात की भी याद नहीं है.

यहां जो कुछ दांव पर लगा है वह धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता की थकाऊ नारेबाजी से कहीं बड़ा है. ये वर्गीकरण उस वर्तमान को समेट पाने में नाकाम हैं, जहां एक बहुसंख्य समाज अल्पसंख्यक समुदायों के रीति-रिवाजों को तो अपना रहा है लेकिन उन्हीं अल्पसंख्यकों के वजूद को स्वीकार करने को तैयार नहीं. 

जब हम 'शॉपिंग मॉल ईसाई' बन जाते हैं- मेरे मोहल्ले का क्रिसमस समारोह तम्बोला के खेल तक सिमट जाता है- तब हम भूल जाते हैं कि धार्मिक त्यौहार वस्तुओं के उपभोग से कहीं बड़ी चीज़ है; ये हमें हमारी सामाजिक बहुलता का बोध कराते हैं. 

क्रिसमस मनाने का मौजूदा उफान खतरनाक रूप से उस मनोवृत्ति को बढ़ा रहा है, जो साल के एक दिन ईसाईयत को मनाने के हमारे अधिकार का दावा तो करती है लेकिन बाकी दिन जब हम किसी अन्य वस्तु के उपभोग में डूबे हुए हों, ईसाईयों के भले-बुरे की कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं.


(संजय श्रीवास्तव जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

नई दिल्ली में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं.)