कुंठाओं के बंद गलियारे में : The piano teacher

-उमेश पंत

http://profile.ak.fbcdn.net/hprofile-ak-ash4/371599_596263424_340334600_n.jpgद पियानो टीचर को देखना उस मनोवैज्ञानिक जुगुप्सा से भरी दुनिया से रुबरु होना है जहां आप अपनी इच्छा से जाना पसंद नहीं करते और जब लौटते हैं तो एक अजीब सी वितृष्णा के साथ लौटते हैं। उस पूरी यात्रा में आप असहज होते हैं, कई बार उस यात्रा के खिलाफ होते हैं पर उस यात्रा को आप बीच में छोड़ नहीं पाते। ये एक अरुचि भरे आकर्षण जैसा कुछ है। या फिर खुद के किसी किसी घाव को कुरेदने जैसा कुछ जिसमें उस क्षण में आप आत्मपीड़ा में आनंद का अनुभव करते हैं।
मारे ही अन्दर भावनाओं के कई ऐसे गलियारे होते हैं जिनकी ओर जाने वाले दरवाज़े हम अक्सर बंद करके रखते हैं। उन अदृश्य गलियारों में प्रवेश निशेध के अदृश्य बोर्ड हम खुद ही चस्पा कर देते हैं। माइकल हेनेके की द पियानो टीचर उन असुविधाजनक गलियारों की तरफ धकेलती सी फिल्म है।
माइकल हेनेके के सिनेमा से मेरा पहला-पहला परिचय मुंबई के उन शुरुआती रतजगों में मेहदी जहां नाम के मेरे एक दोस्त ने करवाया। मेहदी फिल्मी दुनिया के उस अंधेरे कोनों के न जाने कौन कौन गलियों से वाकिफ हैं जिनकी तरफ आमतौर पर सिनेमा के मुरीदों की नज़र तक नहीं जाती। मेहदी के कहने पे द व्हाइट रिबन और हिडन जैसी कमाल की फिल्मों से रुबरु हुआ और फिर मुंबई फिल्म फेस्टिवल में हेनेके की मास्टरपीस आमौर भी देखने को मिली।
द पियानो टीचर को देखना उस मनोवैज्ञानिक जुगुप्सा से भरी दुनिया से रुबरु होना है जहां आप अपनी इच्छा से जाना पसंद नहीं करते और जब लौटते हैं तो एक अजीब सी वितृष्णा के साथ लौटते हैं। उस पूरी यात्रा में आप असहज होते हैं, कई बार उस यात्रा के खिलाफ होते हैं पर उस यात्रा को आप बीच में छोड़ नहीं पाते। ये एक अरुचि भरा आकर्षण जैसा कुछ है। या फिर खुद के किसी किसी घाव को कुरेदने जैसा कुछ जिसमें उस क्षण में आप आत्मपीड़ा में आनंद का अनुभव करते हैं।
एरिका नाम की एक पियानो टीचर अपने ही घर में अपनी मां द्वारा दमित एक अधेड़ औरत है। उसकी कुंठाएं अब अपने चरम पर हैं। कुंठाओं का एक समग्र रुप है जिसने उसके व्यक्तित्व का रुप ले लिया है। मां उस जीवन के हर निजी पहलू पर अपनी निगरानी चाहती है। दरअसल वो निगरानी भी एक तरह की असुरक्षा का बोध देती है। उस दमन में एक खास किस्म की असहायता ही है जो एक मां को अपनी बेटी के जीवन में अशिष्ट हो जाने की हद तक दखल देने के लिये मजबूर करती है। एरिका की कुंठाओं में सेक्स के अभाव की एक अहम भूमिका है। एक साथी के अभाव से उपजा अकेलापन भी उन कुंठाओं को पैदा कर रहा है। एक पियानो वादक के रुप में सफलता के चरम पर न पहुंच पाने की कुढ़न भी उस कुंठा में कहीं मिल गई है।
अपनी इन कुंठाओं को एरिका एक खड़ूस और सख्त पियानो टीचर बनकर दमित करती है। अपने छात्र-छात्राओं को प्रताडि़त करने में उसे एक खास आनंद मिलता है। निजी जीवन के अंतरंग क्षणों में वो अपनी यौनकुंठाओं के दमन के लिये आप्मप्रताड़ना की हद तक जा पहुंचती है। पोर्न पार्लर्स में जाकर कूड़दान में पड़े वीर्य की खुशबू वाले नेपकिन को सूंघने से लेकर अपने जननांग को ब्लेड से छीलने तक। उसकी कुंठाओं की ये दुनिया एक दर्शक के रुप में आपमें जुगुप्सा के भाव पैदा करने लगती है।
इस बीच एरिका के जीवन में वाल्टर नाम का एक आकर्षक जवान लड़का आता है जो केवल इसलिये पियानो की क्लास में एडमिशन लेता है क्योंकि वो एरिका के प्रति आकर्षण महसूस करने लगा है। शुरुआत में एरिका अपने जीवन में उसके आगमन को नकारती है लेकिन वाल्टर हार नहीं मानता। और आंखिरकार वाल्टर एरिका के नज़दीक जाने में कामयाब हो ही जाता है। ऐसे ही एक अंतरंग क्षण में एरिका को उसे सताने का मौका मिलता है। और वो उसे आदेश देने लगती है। अंानंद के चरम क्षणों में वो उसे छोड़ देती है तरसता हुआ। अगले दिन जब वाल्टर लगभग जबरदस्ती उसके अपार्टमेंट में जा पहुंचता है तो वो उसे एक चिटठी सौंपती है। ये चिटठी उसकी दमित इच्छाओं का एक पुलिंदा है जिसमें एरिका ने लिखा है कि वाल्टर को उसके साथ अंतरंग क्षणों में किस तरह का बर्ताव करना है। उसमें उसे पीड़ा पहुंचाये जाने का जि़क्र है। ये भी कि ये सब इस तरह से किया जाये कि उसकी मां को ये दिखाई और सुनाई दे। इस चिट्ठी को पढ़कर वाल्टर वितृष्णा से भर जाता है। उसका एरिका के लिये सारा आकर्षण जैसे समाप्त हो जाता है। वो उसे पागल औरत कहकर वहां से लौट आता है।
ये वो क्षण है जहां प्रभुत्व का स्थानान्तरण हो जाता है। अब एरिका एक लाचार औरत की भूमिका में है। वो वाल्टर के सामने गिड़गिड़ाती है और उससे माफी मांगती है। वाल्टर जो अब तक दमित की भूमिका में था शोषक की भूमिका में आ जाता है। एरिका की मनोवैज्ञानिक लाचारी के क्षण उसे प्रभुत्वशाली होने का अहसास कराते हैं और उसका एरिका के लिये बर्ताव एकदम बदल जाता है।
सत्ता का अहसास कैसे हमारे व्यक्तित्व को एकदम बदलकर रख देता है द पियानो टीचर ये मनोवैज्ञानिक सच जैसे उधेड़कर सामने रख देती है। एक औरत जो अपनी मां से दमित है अपने छात्रों के दमन से अपनी कुंठा शांत करती है। एक लड़का जो अपनी टीचर के लियेे आकर्षित है वो तब तक लाचार नज़र आता है जब तक वो याचक की भूमिका में है। उसकी याचनाएं उस टीचर को सत्ताशाली होने का अहसास देती हैं। और सत्ता का ये अहसास उसे परपीड़ा का सुख देता है। लेकिन जैसे ही वाल्टर का आकर्षण खत्म होता है समीकरण बदल जाते हैं और अब वो शोषक की भूमिका में आ जाता है क्योंकि अब उसे समझ आ गया है कि सामने वाला लाचार है।
जीवन दरअसल प्रभुत्व के इन्हीं समीकरणों पर टिका हुआ है। हमारे सामाजिक/पारिवारिक और व्यावसायिक सम्बंध कितने महीन पावर इक्वेशन पर टिके हुए होते हैं द पियानो टीचर एकदम नग्न रुप में इसका आइना पेश करती है।
द पियानो टीचर को नारीवादी फिल्मों में शुमार किया जाता है। ये फिल्म एक औरत के पक्ष में खड़ी रहकर उसकी मनोवैज्ञानिक पीड़ाओं और कुठाओं की अनछुई दुनिया में कदम रखती है। वो दुनिया जिसकी बात तक करना सभ्य समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता। वो दुनिया जो असहज करती है। जिसके बारे में जानने पर असुविधा महसूस होती है। जो कोई बड़ी सामाजिक समस्या की बात नहीं करती। लेकिन जिस समस्या की बात फिल्म करती है वो समस्या तभी समझी जा सकती है जब उसे जटिल मानवीय संवेदनाओं को समझने के नजरिये से देखा जाये। फिल्म एक दर्शक के रुप में आपसे बहुत गहरी संवेदनशीलता की मांग करती है।
इस साइकोसेक्सुअल थ्रिलर को विश्व सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में शुमार किया जाता है तो उसकी अपनी मुकम्मल वजहें हैं। माइकल हेनेके का सिनेमा मानव संबंधों के उन बंद गलियारों की पड़ताल करता है जिनको सिनेमा के फलक में मुश्किल से जगह मिल पाती है। द पियानो टीचर उस मुश्किल जगह को भरने वाली एक अहम फिल्म है जिसे वही सिनेप्रेमी पसंद करेंगे जिन्हें असुविधाजनक स्पेस में ले जाकर छोड़ देने वाली फिल्में भी पसंद आती हैं।

उमेश लेखक हैं. कहानी, कविता और पत्रकारीय लेखन.गुल्लक नाम से एक वेबसाइट चलाते हैं.संपर्क- mshpant@gmail.com