तराई के बांग्ला विस्थापितों के प्रश्न

भास्कर उप्रेती 

-भास्कर उप्रेती

"...असल समस्या 71 के बाद आए बंगालियों की रही. पहला उन्हें यहाँ आने के बाद किसी तरह की (रजिस्टर्ड या लीज) जमीन नहीं मिली. दूसरा उन्हें भारत की नागरिकता भी नहीं मिली. शरणार्थी का दर्जा भी नहीं मिला, जैसा कि तिब्बती नागरिकों को प्राप्त है. ‘शरणार्थी’ दर्जा प्राप्त विस्थापितों को संयुक्त राष्ट्र संघ का संरक्षण और सुविधाएं मिलती हैं..."

भारतवर्ष की आज़ादी के साथ ही विभाजन का भी दंश साथ में मिला. विभाजन का नक्शा तैयार करने वाले रेडक्लिफ ने कुछ ऐसा नक्शा खींचा कि देशतीन टुकड़ों में नज़र आने लगा. हालाँकि टुकड़े तो दो ही थे, भारत और पाकिस्तान. मगर पाकिस्तान भारत के पूर्व और पश्चिम में छितर गया. पाकिस्तान के इन दो टुकड़ों की बुनियाद तो इस्लामिक राष्ट्र के रूप में पड़ी लेकिन पूर्व और पश्चिम की इस्लामिक संस्कृति एक सी नहीं थी. खान-पान, जीवन शैली, वेश-भूषा, रंग-रूप और भाषा सब जुदा. ऐसे ही जैसे दक्षिण भारत के हिन्दू और उत्तर भारत के हिन्दू.


राजनीति में प्रभुत्व रखने वाले पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों ने जब पूर्वी पाकिस्तान पर उर्दू भाषा थोपी तो यह सांस्कृतिक भिन्नता विद्रोह कर उठी. पाकिस्तान 1972 में फिर से विभाजित हुआ. बांग्ला देश का जन्म हुआ. बांग्ला देश में जो लोग इस बात से खफा थे कि हिन्दुस्तानियों ने इस्लामिक राष्ट्र को तोड़ने में मदद दी वे बांग्ला देश के हिन्दुओं पर जुल्म ढाने लगे.1947 के बाद ही अफवाहथीकि अब बंगाली हिन्दुओं को मुसलमान बनना पड़ेगा. इस अफवाह ने लाखों बांग्ला देशी हिन्दुओं को हिंदुस्तान में शरण लेने के लिए मजबूर किया. ये लोग सबसे पहले जात-भाई पश्चिमी बंगाल पहुँचने शुरू हुए. लेकिन बंगाल में इतने शरणार्थियों को ठहराने की जगह बची नहीं थी. 1947 में भी पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी तादात में शरणार्थी पश्चिम बंगाल आये थे.

सो देश के दूसरे हिस्सों में इनको बसाने की तैयारी होने लगी. वैसे तैयारी कम थी, अफरातफरी ज्यादा थी. करीब 16 राज्यों में ये विस्थापित बंट गए. असम, उड़ीसा, त्रिपुरा,कर्नाटक, उत्तर प्रदेश के लेकर अंडमान-निकोबार तक.

उत्तर प्रदेश के जिस हिस्से को बंगाली विस्थपितों को ठहरने के लिए दिया गया, वह थी पीलीभीत से रुद्रपुर तक फैली तराई. तराई में 1972 से पूर्व आए पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों का सबसे संतोषजनक पुनर्वास हो चुका था. देश की सबसे उर्वर भूमि, पानी की शुलभता, रेल, सड़क नेटवर्क, दिल्ली से नज़दीकी, स्थानीय थाडू-बुक्सा समुदाय का भोलापन ऐसे कई वजहें थीं, जो विस्थापितों के लिए फायदेमंद साबित हुईं. पश्चिमी पाकिस्तान से आये विस्थापितों से बंगालियों ने खेती-किसानी के गुर सीख लिए. पंजाबी समुदाय जैसे-जैसे उद्योग लगाने की ओर उन्मुख होता गया, वैसे-वैसे बंगालियों के लिए रोजगार के मौके भी बढ़ते चले गए.

हालाँकि(1947-48में) पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान से आये लोगों के विस्थापन में बहुत अंतर और भेदभाव देखा गया. पश्चिमी पाकिस्तान से आये लोगों को सामान्यतया 25 एकड़ जमीन और एक लाख मुआवजा दिया गया. पूर्वी पाकिस्तान से आए विस्थापितों को इससे तीन गुना कम जमीन दी गयी और मुआवजा नहीं मिला.

तराई में इस तरह पहुंचे बांग्लादेशी विस्थापित

  • जो लोग 50-52 तक आ गए थे, उन्हें सरकार ने आठ एकड़ कृषि जमीन दी. यह रजिस्टर्ड श्रेणी की है.
  • जो लोग 1957 में आये उन्हें शक्तिफार्म में पांच एकड़ जमीन पट्टे (लीज) पर दी.
  • जो लोग 1964 तक आये उन्हें तीन या पांच एकड़ जमीन दी गयी, बिना रजिस्ट्री की.
  • 70 तक आये लोगों को एक से लेकर तीन एकड़ तक भूमि मिली, लीज पर.
  • 71 और 71 के बाद आये लोगों को किसी प्रकार की भूमि नहीं मिली.

तो असल समस्या 71 के बाद आए बंगालियों की रही. पहला उन्हें यहाँ आने के बाद किसी तरह की (रजिस्टर्ड या लीज) जमीन नहीं मिली. दूसरा उन्हें भारत की नागरिकता भी नहीं मिली. शरणार्थी का दर्जा भी नहीं मिला, जैसा कि तिब्बती नागरिकों को प्राप्त है. ‘शरणार्थी’ दर्जा प्राप्त विस्थापितों को संयुक्त राष्ट्र संघ का संरक्षण और सुविधाएं मिलती हैं.

उधमसिंह नगर में तीन लाख से अधिक आबादी

बंगाली विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहे डॉ. सुनील हाल्दर बताते हैं कि विभाजन और विस्थापन के लिए शासक वर्ग जिम्मेदार था. लेकिन आज़ादी की लड़ाई तो पूर्वी बांग्ला देश के नागरिकों ने भी उसी तरह लड़ी (शायद कुछ ज्यादा ही) जैसे अन्य देशवासियों ने. तब सब भारतीय बराबर थे. अब ये भेदभाव क्यों? हाल्दर कहते हैं बंगालियों ने कभी विभाजन को स्वीकार नहीं किया, जिस कारण उन्हें ये सिला मिला.

उत्तराखंड की तराई यानी उधमसिंह नगर में इस समय बंगाली नागरिकों और विस्थापितों की कुल तादात तीन लाख से ऊपर है. इनमें आधे से अधिक बंगाली(गैर नागरिक) भूमिहीन हैं. जिला मुख्यालय रुद्रपुर से 16 किलोमीटर दूर दिनेशपुर में पहला सेटलमेंट हुआ था. उसके बाद शक्तिफार्म में इन्हें बसाया गया. बाद के दिनों में ये गदरपुर, किच्छा, गुलरभोज, तुमडिया डैम आदि इलाकों में बसे. 

1970-71 में रुद्रपुर में इनके विस्थापन के लिए जिस जगह ट्रांजिट कैम्प लगा, पुनर्वासअधिकारी की विफलता से बाद में यही जगह विस्थापितों का अड्डा बन गयी. अब ट्रांजिट कैम्प, रुद्रपुर नगर में बंगाली विस्थापितों का घना क्षेत्र बन चुका है. उधमसिंह नगर के विस्थापितों की मांग है कि अब उनका बांग्लादेश लौटना संभव नहीं, क्यूंकि वे अपने भाई-बिरादरों के साथ बसने के लिए ही यहाँ आये थे. न वे बांग्ला देश लौटने की इच्छा रखते हैं, न ही बांग्ला देश की सरकार हमारी वापसी की इच्छुक है. फिर जो लोग 71 के बाद यहाँ आये, उन्हें भी यहाँ बसे हुए चार दशक से अधिक हो गए हैं.

विभिन्न राज्यों में बंगाली विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ने वाले (बंगालियों के गाँधी कहे जाने वाले) स्व. पुलिनविश्वास के पुत्र (दिनेशपुर निवासी) पद्दोलोचन विश्वास बताते हैं कि तराई में बसे बंगालियों की प्रमुख मांग है कि जो लोग 1971 के बाद तराई में बसे उन्हें इससे पूर्व आये बंगालियों की तरह भारतीय नागरिकता प्रदान की जाय. 1957 और उसके बाद जिन बंगालियों को लीज पर जमीन दी गयी, उन्हें भूमिदरी अधिकार दिया जाए.

रतनपुर(शक्तिफार्म) निवासी रविन्द्रनाथ सरकार की शिकायत है कि भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके वजूद के साथ खिलवाड़ किया. 40 साल से नए भारतवर्ष में रहने के बाद भी उन्हें नागरिक नहीं माना गया. उनकी नयी पीढ़ी एक अजीब की कश्मकश में है. जब बच्चे बड़े होते हैं और उन्हें मालूम पड़ता है कि वे भारत के नागरिक नहीं हैं तो वह विचलित हो उठते हैं. स्कूल-कॉलेज में प्रवेश को जाते हैं तो उनके हाथ में बांग्लादेशीविस्थापित की पहचान होती है. सरकार कहते हैं नेताओं ने हमें वोट और आधार कार्ड का अधिकार जरूर दिया है. और पिछली आधी सदी से बंगाली वोट-बैंक की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं. जिन लोगों के पास लीज की थोड़ी बहुत-जमीन है भी, वह बैंक से इस पर कर्ज नहीं उठा सकते. जो71 के बाद आये उन्हें सरकारी नौकरी पाने में भी दिक्कत आती है.

तीन-तीन बार बंगाली विधायक

मालूम हो कि नए प्रदेश उत्तराखंड में भी बंगालियों ने तीन बार एक-एक विधानसभा सदस्य दिए हैं. पंतनगरसीट से पहली बार (बसपा से) प्रेमानंद महाजन विधायक बने, पहली चयनित विधानसभा के लिए. दूसरा चुनाव भी वे जीते. तीसरा चुनाव उन्होंने गदरपुर सीट से लड़ा जो वे हार गए. लेकिन इस बार सितारगंज सीट से किरन मंडल (भाजपा) चुनकर आए. मंडल ने बाद में कांग्रेस का दामन थामकर यह सीट मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लिए खाली कर दी. बहुगुणा यहाँ से निर्वाचित हुए और अब भी सितारगंज के विधायक हैं. जबकि कुमाऊं मंडल विकास मंडल के अध्यक्ष बनाये गए हैं. रोचक बात ये है कि बंगाली विस्थापितों को नागरिकता और भूमिदरी के अधिकार दिलाने की बात कहकर जो लोग विधानसभा पहुंचे, उन्होंने वहां ऐसा कोई भी सवाल नहीं उठाया. जरूर(पूर्व) मुख्यमंत्री बहुगुणा ने बंगाली बच्चों को उनकी मात्र मातृभाषा यानी बंगाली में पढ़ने का अधिकार देने की बात कही, लेकिन वह भी बाद में मौखिक ही साबित हुई.

अनुसूचित जाति का दर्जा प्रमुख मांग

बंगाली विस्थापितों की एक और प्रमुख मांग है उन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा देने की. बांग्ला देश से जो लोग तराई में आकर बसे वे (99 फीसद) नमोशूद्र समुदाय के थे. नमोशूद्र होना ही शायद एक वजह थी, जिस कारण पश्चिमी बंगाल के भद्रलोक ने उनकी पीड़ा में कभी रुचि नहीं दर्शायी. और शायद इसी वजह से उन्हें बंगाल में बसने भीनहीं दिया गया और सुदूर तराई में उन्हें आना पड़ा. रुद्रपुर निवासी शंकर चक्रवर्ती बताते हैं कि बौद्धिक और राजनीतिक रूप से प्रभावी पश्चिमी बंगाल के लोगों ने कभी बांग्लादेश से आए विस्थापितों के दर्द को मुखरित करने का उत्साह नहीं दिखाया.

विस्थापन पश्चिमी पाकिस्तान से आये लोगों का भी हुआ, जो अपने आप में कम पीड़ाजनक नहीं है, लेकिनपूर्वी पाकिस्तान के लोगों के विस्थापन को दोयम तरीके से देखा गया. बंगाल के विख्यात इतिहासकारों और फिल्मकारों ने पश्चिमी पाकिस्तान के विस्थापन पर जितना काम किया, उतना पूर्वी पाकिस्तान के विस्थापन पर कभी नहीं किया. यह ब्राह्मणवादी मानसिकता है. 

उसी प्रकार तराई से कई बार हमारे प्रतिनिधिमंडल पश्चिम बंगाल के बड़े नेताओं के पास गए, लेकिन कभी भी उन्होंने हमें गंभीरता से नहीं लिया. चक्रवर्ती आगे कहते हैं बंगाली नागरिकों(और विस्थापितों) को अनुसूचित जाति में शामिल करने का अधिकार संसद को है, लेकिन संसद तक यह मांग राज्य सरकार के माध्यम से ही पहुँच सकती है. जो फ़िलहाल संभव नहीं लगता. 1970 में पूर्वी बंगाल से आये सभी विस्थापितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग संसद में जरूर उठी थी, लेकिन यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया. लेकिन बंगाल, उड़ीसा, त्रिपुरा और असम ने इसके ड्राफ्ट के आधार पर बाद में केंद्र से अपने-अपने राज्यों में इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के कानून पारित करवा लिए.

थोड़ी जमीन का मालिकाना खोने का डर

तराई में 1971 के बाद आए बांग्लादेशियों के सम्मुख नागरिकता जैसा प्रमुख संकट तो है ही लेकिन 1948 से 1952 के बीच तराई में जो बांग्लादेशी बसे उनके संकट भी कम नहीं. ये भारतीय नागरिक हैं और इनको पुनर्वास के समय आठ एकड़ जमीन मय रजिस्ट्री हासिल हुई थी. ऐसे लोग केवल दिनेशपुर क्षेत्र में हैं. लेकिन कृषि करना आदत में न होने और कृषि उपकरणों की कमी के कारण इनमें से कई लोगों ने तब बहुत मामूली कीमतों पर अपनी जमीनें पंजाबी किसानों को बेच दीं. जो पैसा मिला वह बिजनेस में लगा दिया और बहुत कम को ही बिजनेस में कामयाबी हासिल हो पायी. तो अब ऐसे लोगों के पास घर-मकान की थोड़ी सी जमीन के अलावा कुछ भी नहीं.

और जिन लोगों ने पहले जमीनें नहीं बेचीं उन्हें 2005 में शुरू हुए सिडकुल (एकीकृत औद्योगिक क्षेत्र) ने जमीन बेचने का उकसावा दिया. पहले इन लोगों ने उद्योगों के लिए खेत की मिट्टी बेचना शुरू किया, फिर खेत ही बेच दिए. जो रहे-सहे बंगाली किसान बचे थे, वे प्रॉपर्टी डीलर्स के प्रलोभन में आ गए. जमीन बेचकर पक्के मकान बनवाने,गाड़ी खरीदने, दुकान डालने, मोबाइल खरीदने, घर में लक्जरी आइटम जुटाने में ये पैसा खप गया. कुल मिलाकर दिनेशपुर में बहुत कम बंगाली अब किसान रह गए हैं और वे भी कब तक रहेंगे, कहना मुश्किल है.

उधर दूसरी बड़ी बसासत शक्तिफार्म में भूमिदरी अधिकार देने की मांग भी भू-माफिया द्वारा प्रायोजित लगती है. दिनेशपुर और आस-पास के अन्य किसानों को देखकर यहाँ के बंगाली किसानों को लगता है कि वे अगर भूमिदरी अधिकार पा जाएँ तो जल्द अमीर बन सकते हैं. क्यूंकि यहाँ भी पास में सिडकुल निर्मित हो गया है और जमीन के दाम उछाल मार रहे हैं. भूमि के आधार पर लोन लेना याभूमि बेच देना प्रमुख सपने हैं. यादरहेशक्तिफार्म ही अब बंगालियों का एकमात्र इलाका तराई में बचा है जहाँ अभी रविन्द्र संगीत, नजरूल गान, बाउलआदि सुनाई पड़ जाता है. उधमसिंह नगर का शेष बंगाली समुदाय मुख्यधाराके मोनो-कल्चर का शिकार बन चुका है. ऐसा भी नहीं कि शक्तिफार्म के बंगाली किसान बिना रजिस्ट्री की जमीन बेच ही नहीं रहे, लेकिन अब तक यह केवल छोटे-मोटे प्लाट के लिए था,जब कि कलोनाइजर्स बड़े-बड़े भू-खंड चाहते हैं.

वर्तमान में कोलकाता में पत्रकार (दिनेशपुर निवासी) पलाश विश्वास चिंता जताते हैं कि तराई के बहुत कम बंगाली शिक्षा ग्रहण कर पाए हैं. और उच्च शिक्षा में तो इनकी भागीदारी निम्नतम है. दूसरा औद्योगिक वातावरण ने इस शांत और विनम्र समुदाय में खलबली मचा दी है. युवा चकाचौंध में दिग्भ्रमित हो रहे हैं.समुदाय की मांगें मुखरितकरने में विफल रहे आन्दोलनकारी-वामपंथी नेतृत्व में युवाओं की रुचि नहीं रही. कुल मिलाकर वोट बैंक की राजनीति करने वाली पार्टियाँ ही इनकी भाग्य विधाता हैं. यूज होना ही बंगाली समुदाय की नियति बन गयी है.

क्या होगी आगे की राह


बंगाली विस्थापितों (नागरिक और गैर नागरिक) की समस्याएं प्रदेश के राजनीतिक दलों और प्रशासन की नज़र में क्या अहमियत रखती हैं, यह कहना भी मुश्किल है. पुलिन विश्वास के बाद बंगालियों के बीच से भी कोई विश्वसनीय नेतृत्व नहीं उभर पाया. जबकि तराई में ही पुनर्वासित पश्चिमी पाकिस्तान से आए लोगोंने खुद को न सिर्फ कृषि और बिजनेस में सिरमौर बना डाला, उत्तराखंड की राजनीति में भी उनका खासा दखल दीखता है.यानी सफल पुनर्वास. जबकि बंगाली समाज दोराहे पर ही खड़ा दीखता है.एक तरफ, वे बंगाली जो भारतीय नागरिक हैं, वेखुद को गैर-भारतीय बंगालियों से अलग नहीं कर सकते. ये सब एक ही मूल और एक ही जात से भारत आए थे. दूसरी तरफ,गैर-नागरिक बंगाली- जो संख्या में नागरिक बंगालियों के ही बराबर हैं, वे त्रिशंकु की तरह आसमान में लटके हैं. क्या भारत सरकार अब इन बंगालियों को भविष्य में कभी बाहर जाने के लिए कह पाएगी?अगर नहीं तो ऐसा कब होगा कि इन्हें सम्मानजनक रूप से भारतीय नागरिकता दे दी जाएगी. नागरिकता के बराबर की चुनौती उन बंगाली-भूमिवानों की जमीन को बचाए रखने की है.