'सफाई' और स्वच्छ भारत अभियान

सुनील कुमार
-सुनील कुमार

"…असल में सफाई करने वालों के साथ हमारा बर्ताव क्या रहा है? सफाई कर्मियों को नियमित क्यों नहीं किया जाता? उनके कार्य स्थलों को श्रम कानून के दायरे में क्यों नहीं लाया जाता? क्या इस आधे-अधूरे मन से सफाई हो पायेगी? स्वच्छ भारत अभियान किन लोगों के लिए लागू किया जा रहा है? क्या इससे कूड़े में जीवन यापन करने वाली जनता की जिन्दगी में कोई बदलाव आने वाला है? जनता की 62,000 करोड़ रु. किसके जेब में जायेंगे?…"

कार्टून साभार- mysay.in
भारत के प्रधानमंत्री ने लाल किले के प्राचीर से ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के लिए संदेश दिया था और इस कार्यक्रम के लिए 2 अक्टूबर का दिन निर्धारित किया। प्रधानमंत्री ने वाल्मीकि बस्ती से ‘स्वच्छ भारत अभियान’ कि शुरूआत की क्योंकि इस बस्ती में महात्मा गांधी ने कुछ समय बिताया था। 2 अक्टूबर से पहले ही इस बस्ती को साफ-सुथरा, डेंटिग-पेंटिग कर चमकाने का अभियान शुरू हो चुका था। दिल्ली की बसों, मेट्रो में सफाई दिवस का जिक्र हो रहा था। इससे ज्यादा दुखी सरकारी कर्मचारी थे जिनको आॅफिस जाना पड़ा लेकिन यह प्राइवेट कम्पनियों के लिए भी एक मौका है जो मजदूरों को छुटी देना नहीं चाहती हैं। 

सफाई हम सभी को बहुत पसंद आती है, सभी चाहते हैं कि हमारा घर, हमारे आस-पास, काम की जगह साफ-सुथरी हों, लेकिन हम यह सफाई दूसरे की मेहनत के बल पर चाहते हैं। सफाई के काम को समाज में एक छोटे स्तर का कार्य माना जाता है। मध्यमवर्गीय और उच्च वर्गीय तक के घरों में सफाई के कार्य के लिए पार्ट टाइम या फुल टाइम मेड रखी जाती हैं, जो कि आस-पास की बस्तियों से आती हैं। उनको वेतन बहुत कम दिया जाता है किसी तरह के श्रम कानून को लागू नहीं किया जाता। बस्ती में रहने के नाम से ही छुआ-छूत होने लगती है। काॅलोनियों, सड़कों, शिवरों की सफाई का काम ज्यादातर एक विशेष समुदाय के लोग ही करते आये हैं, जिसको समाज अछूत की नजरों से देखता है। 

ज्यादातर सफाईकर्मी ठेके पर होते हैं और श्रम कानून को ताक पर रख कर काम करवाया जाता है। घर में काम करने वाले सफाईकर्मी हों या सड़कों के, उनमें समानताए हैं- 
  • उनके साथ छुआ-छूत होता है; 
  • श्रम कानून लागू नहीं होते; 
  • उनको न्यूनतम मजदूरी नहीं दी जाती है; 
  • उनसे बिना सेफ्टी (दस्ताने, मास्क इत्यादी) के ही काम करवाया जाता है। 

जिस दिन (2 अक्टूबर) को पूरी भारतीय मीडिया वाल्मीकी बस्ती की लाइव कवरेज और ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का प्रचार के लिए आतुर थी, गलियों चैराहों पर मंत्रियों-नेताओं के हाथो में झाड़ू लिये फोटो दिखाये जा रहे थे, मैं दिल्ली के एक किनारे मदनपुर खादर में था। मदनपुर खादर वह जगह है जहां दिल्ली के साफ करने वालों की एक बड़ी आबादी रहती है। यह आबादी दिल्ली के अलग-अलग काॅलोनियों में जाकर कूड़ा उठाने का काम करती है और कम से कम एक दिन में 300 टन कूड़ा घरों से उठाती (निःशुल्क) है और इस तरह से घरों व दिल्ली को स्वच्छ बनाने में बड़ा योगदान करती है। 

वह खुद कूड़े के बीच में रहते हैं, वहीं खाते-पीते हैं, बच्चे उसी में खेल कर बड़े होते हैं। इनमें से ज्यादातर कबाड़ी वाले पहले भोगल और बटला हाउस में रहते थे जिन्हें एक माह पहले ही बटला हाउस से उजाड़ दिया गया और उन्होंने अपना नया आशियाना मदनपुर खादर में बना लिये। पहले उनका कार्य करने का स्थल (कालकाजी, गोविन्दपुर, डिफेन्स काॅलोनी, लाजपतनगर) नजदीक था जिससे वह और ज्यादा घरों का कूड़ा इकट्ठा कर पाते थे। 

कार्टून साभार- www.santabanta.com
अब उन्हें आने-जाने में करीब तीन घंटे लग जाते हैं जिससे वह कम कूड़ा इकट्ठा कर पाते हैं। मैंने देखा जहां ये लोग रहते हैं उनके आस-पास की बस्तियों कि नालियां बजबजा रही हैं, सड़कों पर नाली की गन्दगी और कूड़ा पड़ा हुआ है। जब बस्ती के लोगों को स्वच्छता अभियान के बारे में बताया तो बोले ‘‘यहां कोई कर्मचारी, अधिकारी, मंत्री-संतरी नहीं आते हैं। सफाई अभियान तो केवल उन्हीं इलाकों के लिए है जो पहले से ही साफ है।’’ यह बात बिल्कुल सही लगी किसी भी बस्ती में कोई नेता, मंत्री, अधिकारी नहीं देखे गये। वे उन्हीं ईलाकों में दिखते हैं जहां साफ-सफाई पहले से हो। 

क्या ‘स्वचछ भारत अभियान’ केवल सड़कों की सफाई के लिए है जिसके लिए हजारों करोड़ रु. खर्च किये जा रहे हैं। ‘स्वचछ भारत अभियान’ के दूसरे दिन ही दशहरा पर्व था जिसमें रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले फूंके जाते हैं, जिसमें पटाखे फोडे़ जाते हैं, जिससे हवा में कार्बन मोनो अक्साईड की मात्रा बढ़ जाती है। इसका उद्घाटन भी सबसे पहले प्रधानमंत्री लालकिले पर रावण पर तीर चलाकर करते हैं। क्या भारत के प्रधानमंत्री इसके लिए कोई संदेश नहीं दे सकते थे? दुर्गा की मूर्तियों का नदियों में विसर्जन किया जाता है। इन मूर्तियों के रंग से जल प्रदूषण होता है। हम किस तरह की स्वच्छता की बात कर रहे हैं?

प्रधानमंत्री जिस नवरात्री पर्व में 9 दिन उपवास रखते हैं, उसी पर्व में हजारों टन निकला कचरा नदियों में प्रवाहित किया जाता है। क्या हम केवल सड़क साफ दिखाकर अपने को स्वच्छ कह सकते हैं? हम वायु और जल प्रदूषण की बात छोड़ भी दें तो धरती की सफाई केवल सड़क ही होती है? असल में सफाई करने वालों के साथ हमारा बर्ताव क्या रहा है? सफाई कर्मियों को नियमित क्यों नहीं किया जाता? उनके कार्य स्थलों को श्रम कानून के दायरे में क्यों नहीं लाया जाता? क्या इस आधे-अधूरे मन से सफाई हो पायेगी? स्वच्छ भारत अभियान किन लोगों के लिए लागू किया जा रहा है? क्या इससे कूड़े में जीवन यापन करने वाली जनता की जिन्दगी में कोई बदलाव आने वाला है? जनता की 62,000 करोड़ रु. किसके जेब में जायेंगे?

सुनील सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं.
समकालीन विषयों पर निरंतर लेखन.
संपर्क- sunilkumar102@gmail.com