उन्मादी एजेंडे के बीच बनारस के अंदरूनी प्रश्न

 -अंशु शरण


"...लम्बे अरसे से बनारस भाजपा का मजबूत गढ़ है शहर में सभासद से लेकर सांसद तक भाजपा का ही रहता है जो मुख्य रूप से  इस बदहाली के लिए जिम्मेदार भी है हालाँकि अब मिनी पीएमओ के खुलने के बाद भाजपाई इन मुद्दों पर शोर मचाते दिख रहे हैं और इनका ये रवैया अभी भी ध्यान भटकाने वाला ही है जैसे की जल संरक्षण के बजाय गंगा का महिमामंडन, गंगा को पूजनीय बनाना जबकि वरुणा और अस्सी नदी पर होने वाले अतिक्रमण और प्रदुषण पर चुप्पी, क्या बनारस को वाराणसी नाम देने वाली वरुणा और अस्सी नदी अपने पूजनीय ना हो होने की कीमत उठा रही है।..."

साभार- thehindu.com


विश्व के प्राचीनतम शहरों में शामिल यह शहर, एक लम्बे सांस्कृतिक क्रमिक विकास के बदौलत ही आज बहुलतावादी साझा सांस्कृतिक विरासत का गवाह बना हुआ है इसके अलावा भी बनारस पूर्वांचल और पश्चिमी बिहार का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र भी हैं | और यही वजह है की बनारस का चयन लोकसभा चुनावों में पूर्वांचल के सम्प्रेषण केंद्र के तौर पर हुआ और भाजपा के पूर्व घोषित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनारस से सांसद चुने गए। जिसके बाद जहाँ एक ओर लोगो की उम्मीदें बढ़ी है वहीँ दूसरी ओर बनारस में राष्ट्रवाद का शोर भी जोर पकड़ रहा है।

बहुलतावादी संस्कृति बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

सांस्कृतिक, स्थात्पय और जीवनशैली के विभिन्न रंगों से भरा बनारस ना सिर्फ भारत बल्कि दुनिया भर के लोगों में आकर्षण पैदा करता है, हर साल लाखों में देसी विदेशी सैलानी इसी आकर्षणवश खींचे चले आतें हैं। बनारस का अल्हड़पन यहाँ के जीवनशैली के अलावा नगर स्थात्पय में भी दिखाई देता है। लेकिन पिछले कई वर्षों की उपेक्षा और आबादी के बढ़ते दबाव का असर अब बनारस पर दिखने लगा है। नगर स्थात्पय में जर्जरता तो जीवनशैली में झुंझलाहट दिखाई दे रही है। बनारस की इस बदहाली के पीछे जिम्मेदार एक ही राजनैतिक दल जिम्मेदार है , जिसके जनप्रतिनिधियों की 2014 से पूर्व की शिथिलता, नगर की जर्जरता और जीवनशैली में आये बदलाव के पीछे जिम्मेदार है और अब उनकी अति-सक्रियता लगातार बहुलतावादी संस्कृति को छेड़ रही है।
बनारस शहर का घाटों गलियों मंदिरो से पटा पुराना हिस्सा अपनी ही जर्जर और बदहाली अवस्था को देखने को विवश है. यहाँ के ज्यादातर निवासीयो ने भी इस स्थिति को स्वीकार लिया है और शायद यही बनारस है जहाँ हर फ़िक्र लोग मौज में उड़ाते हैं| गंदगी का आलम तो यूँ है की शहर की ज्यादातर गलियां सूखे नाले का रूप ले चुकी हैं जो बरसात में या तो बहने लगती है या बजबजाने| धार्मिक नगरी काशी की गलियों में वेस्ट मैनेजमेंट यानि की कूड़ा निवारण का काम गौ माता और सांडो की मौजूदगी से आसान हो जाता है, घाटों पर की गंदगी गंगा मैया में बहा दी जाती है। 

लम्बे अरसे से बनारस भाजपा का मजबूत गढ़ है शहर में सभासद से लेकर सांसद तक भाजपा का ही रहता है जो मुख्य रूप से  इस बदहाली के लिए जिम्मेदार भी है हालाँकि अब मिनी पीएमओ के खुलने के बाद भाजपाई इन मुद्दों पर शोर मचाते दिख रहे हैं और इनका ये रवैया अभी भी ध्यान भटकाने वाला ही है जैसे की जल संरक्षण के बजाय गंगा का महिमामंडन, गंगा को पूजनीय बनाना जबकि वरुणा और अस्सी नदी पर होने वाले अतिक्रमण और प्रदुषण पर चुप्पी, क्या बनारस को वाराणसी नाम देने वाली वरुणा और अस्सी नदी अपने पूजनीय ना हो होने की कीमत उठा रही है। ये सारी बातें बनारस के राष्ट्रवाद के असर को बताती हैं| बहुलतावादी संस्कृति को छद्म सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से उससे भी बड़ा खतरा है।

घोषणायें : काशी से क्योटो तक

उत्तर प्रदेश में 80 में से 73 सीटें जीतने के बाद भाजपा का पूरा ध्यान अब 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर है और पूर्वांचल में इस उत्साह को बरक़रार रखने के लिए काशी से प्रधानमंत्री को जोड़े रखने भी जरुरी था फलस्वरूप मिनी पीएमओ का खोला गया जो असल में लोकसभा 77 वाराणसी का जनसंपर्क कार्यालय है। जहाँ शिकायतें सुनी तो जाती है लेकिन निदान नहीं होता है और हो भी कैसे जब गृह मंत्रालय की फाइलें पीएमओ हो के जाती हैं तो भला इस मिनी पीएमओ की क्या बिसात और ये हमें वहाँ पर देखने को भी मिला जहाँ कार्यालय प्रभारी शिव शरण उपाध्याय किसी भी औपचारिक बयान देने से कतराते दिखे। 

मिनी पीएमओ के खुलने के माह भर भीतर ही लोग इसे आश्वासन केंद्र की संज्ञा देने लगे हैं जिसकी पुष्टि भाजपा महासचिव राम माधव का बयान "मिनी पीएमओ ना बन जाय समस्याओं का संग्रहालय" करता है। अभी हाल में उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनाव में प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र की रोहनिया विधानसभा में भाजपा-अपना दल को मिली हार यहाँ के जनमानस के
मोहभंग को भी दर्शाता है।
अभी हाल में ही प्रधानमंत्री ने अपनी जापान यात्रा के दौरान काशी के कायाकल्प के लिए क्योटो शहर में घोषणा की | बनारस शहर की मूल समस्याये को समझे बगैर इलाज के लिए क्योटो मॉडल का ये प्रत्यारोपण बनारस के मूल स्वरुप के साथ छेड़छाड़ साबित हो सकता है| सम्पूर्ण भारत के सारे रंगों को परावर्तित करने वाले जिले बनारस में किसी एक मॉडल का प्रत्यारोपण या विकास का कोई एक एप्रोच यहाँ के लिए अनुकूल नहीं होगा मैग्सेसे पुरुस्कार विजेता, आइ० आइ० टी० बी एच यू (bhu) के प्रोफेसर संदीप पाण्डेय  ने बताया की "बनारस शहर के 85 % नाले बिना ट्रीटमेंट के गंगा में जा गिर रहें है वरुणा और अस्सी नदी प्रदुषण के अलावा अतिक्रमण
का दोहरा मार झेल रही है । शहर के विस्तार के नाम पर पूंजीपतियों द्वारा जल और जमीन दोंनो पर कब्जा जारी है । ऐसे में नमामि गंगा और क्योटो माडल जैसी महत्वकांक्षी योजनायें बनारस के साथ बेईमानी साबित हो सकती है। "

नारों से फ़ैल रहा उन्मादी संक्रमण, मीडिया से फ़ैल रहा नियोजित प्रोपेगंडा, बनारस में एक नए तरह के वैचारिक प्रदुषण को जन्म दे रहा है।  जैसे काशी और गँगा को लेकर मचाये जाने वाला राष्ट्रवादी शोर जो बहुत सारे स्थानीय मुद्दों की आवाज़ दबा रहा है । अधिकतर मीडिया घराने एक खास राजनैतिक दल का मुखपत्र बने पड़े हैं और बनारस के अल्हड़पन को छद्म राष्ट्रवादी दिशा देना चाहते हैं । लेकिन बनारस में किसी भी तरह के विकास कार्यक्रम के क्रियान्वन पर गंभीर हुए बिना, सिर्फ विकास मॉडल की ब्रांडिंग से कोई भी बदलाव संभव नहीं है।

अंशु शरण 
anshubbdec@gmail.com