सौ दिन की हकीकत

सत्येंद्र रंजन
-सत्येंद्र रंजन

"...‘अच्छे दिन’ चाहने वालों में उन तबकों का बड़ा हिस्सा है- जिनकी पहचान मोदी ने नव-मध्य वर्ग के रूप में की थी। उनके लिए असली मुद्दे महंगाई और रोजगार हैं। महंगाई के मुद्दे पर भाजपा सरकार लगभग यू-टर्न ले चुकी है। यानी वो वही भाषा बोलने लगी है, जो यूपीए के मंत्री और नेता बोलते थे। ऐसे में आम आदमी का यह भरोसा टूटता जा रहा है कि उनके पास महंगाई पर काबू पाने का कोई विशेष फॉर्मूला है। बल्कि रेल किराया बढ़ा कर और पेट्रोलियम की कीमतों पर अनियंत्रित छोड़ कर उसने यही संकेत दिया कि आम लोगों को तुरंत राहत देने की उसकी कोई इच्छा या तैयारी नहीं है। करोड़ों रोजगार सरकार कैसे पैदा करेगी, इसका भी कोई खाका उसने नहीं रखा है।..."

साभार- ndtv.com
रेंद्र मोदी सरकार के पहले 100 दिन का ठोस विश्लेषण करना हो, तो पहले 2014 के आम चुनाव में उभरे जनादेश के स्वरूप को समझना आवश्यक होगा। मतलब यह कि भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर जिन 31 प्रतिशत लोगों ने वोट दिए, वे कौन थे तथा उन्होंने किन अपेक्षाओं के साथ नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री चुना?

चुनाव उपरांत सर्वेक्षणों और सामान्य विवेक से बनी समझ के मुताबिक इन मतदाताओं में पहला तबका उनका है, जो बहुसंख्यक वर्चस्व यानी हिंदुत्व की विचारधारा के लगभग स्थायी समर्थक बने हुए हैं। 8-10 प्रतिशत ऐसे मतदाता तो बाबरी मस्जिद ध्वंस आंदोलन के पहले भी थे। इस आंदोलन ने इनकी संख्या में खासा विस्तार किया। आज अनुमान लगाया जा सकता है कि इनकी संख्या 15 प्रतिशत तक है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के साथ ऐसे मतदाताओं का स्वाभाविक ध्रुवीकरण हो गया। इसकी वजह गुजरात के मुख्यमंत्री के बतौर मोदी की छवि थी। मोदी की यह विशेषता उनके विरोधी भी मानते हैं कि वे मुखौटे के भीतर से सियासत नहीं करते। बल्कि जो मानते हैं, उसे कहते हैं और फिर वैसा ही आचरण करते हैं। एक दौर में लालकृष्ण आडवाणी की भी ऐसी छवि बनी थी। लेकिन बाद में अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने के चक्कर में उन्होंने खुद ही इस छवि को फीका कर लिया। इससे राजनीति में कट्टर हिंदुत्ववादी नेतृत्व का जो स्थान उन्होंने बनाया था, वह खाली हो गया। मोदी ने 2002 के गुजरात दंगों के बाद अपनी ऐसी छवि उभारी, जिससे इस जगह को भरने में वे कामयाब रहे। अतः उनके नाम से हिंदुत्ववादी मतदाताओं या जन समूहों का उत्साहित होना स्वाभाविक घटनाक्रम है। पिछले चुनाव में मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की उद्देश्य भावना इन समूहों में प्रबलता से उभरी, जिसके परिणास्वरूप ये ऐसे तमाम मतदाता मजबूती से लामबंद हुए और मतदान केंद्रों तक पहुंचे।

मोदी के समर्थन आधार का दूसरा बड़ा वर्ग वो है, जो अच्छे दिन’ के प्रचार अभियान से इकट्ठा हुआ। हर वर्ग, हर तरह के पेशे के लोगों में बेहतर दिन आने का भरोसा मोदी के प्रचार अभियान ने प्रभावी ढंग से भरा। आने वाले समय में संचार के अध्ययनकर्ताओं के लिए यह शोध का विषय होगा कि इतने लोगों के मन में विकास के गुजरात मॉडल का मिथक इतने दृढ़ ढंग से बैठाने में सफलता आखिर कैसे हासिल की गई। अधिकांश लोग ऐसे हैं, जो कभी गुजरात नहीं गए। लेकिन उनकी जुबान पर यह बात चढ़ गई कि मोदीजी ने गुजरात में यह या वह कर दिखाया है। राज्य में निवेश की वास्तविकता, सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में गुजरात का औसत प्रदर्शन और मानव विकास सूचकांकों पर उसकी निराशाजनक स्थिति के आंकड़े मोदी विरोधी पार्टियों और सामाजिक संगठनों ने रखे, लेकिन इतने विस्तार और सूक्ष्मताओं में जाने की किसे फिक्र थी! बहरहाल, इस तबके को लेकर मोदी और भाजपा को चिंतित रहने की जरूरत है, क्योंकि इसके ज्यादातर हिस्सों में अच्छे दिन का लंबे समय तक इंतजार करने सब्र नहीं है।

मोदी के समर्थन आधार का तीसरा हिस्सा उद्योग जगत, उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग का है, जो यूपीए सरकार के सामाजिक एजेंडे और उसके कार्यकाल में आखिरी वर्षों में आर्थिक वृद्दि दर गिरने और रुपये की कीमत में गिरावट से खफा थे। इन तबकों ने यूपीए के सामाजिक एजेंडे को संसाधनों की बर्बादी माना और उसे राजकोषीय घाटे की वजह बताया गया। विभिन्न कारणों से विकास दर में आई गिरावट को पॉलिसी पैरालिसिस (नीतिगत निर्णय के लकवाग्रस्त होने) का परिणाम बताया गया। इन तबकों को यूपीए का विकल्प चाहिए था, जो उन्हें मोदी के रूप में दिखा। मोदी की सुपर ह्यूमन (अति मानवी) छवि गढ़ने में इन वर्गों ने अपने संसाधन और मेधा झोंक दिए। इस क्रम में उन्होंने अपने लिए भी कुछ भ्रम बुने, जिनमें एक यह था कि सत्ता में आते ही मोदी समाजवादी जकड़नों से उद्यमियों, निवेशकों और कुल मिला कर अर्थव्यवस्था को मुक्ति दिला देंगे।

मोदी सरकार की आगे कैसी छवि रहेगी, यह इसी से तय होगा कि कि इन तीनों तबकों की कितनी उम्मीदें पूरी होती हैं। बाकी जन समहूों में बड़ा हिस्सा उन लोगों का है, जो स्वतंत्रता के बाद जो भारत अस्तित्व में आया अथवा जो भारत का विचार (आइडिया ऑफ इंडिया) मुख्यधारा रहा (bit.ly/1uasqEW), मोदी को उसका प्रतिवाद (एंटी थीसीसी) मानते हैं। वे मोदी को अकेली शख्सियत के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्र की धारणा एवं उसकी सकल परियोजना के हिस्से के रूप में देखते हैं। उनके लिए यह मुद्दा नहीं है कि मोदी कैसे अच्छे दिन लाएंगे। उनकी असली चिंता यह है कि मोदी के सत्ता में आने के साथ भारत का वह विचार हाशिये अथवा द्वितीयक स्थल पर चला गया है, जिसके प्रतीक पुरुष दादा भाई नौरोजी, महात्मा गांधी, रवींद्र नाथ टैगोर, अमर शहीद भगत सिंह, बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर और जवाहर लाल नेहरू रहे हैं। अनगिनत समाजवादी एवं साम्यवादी विचारकों एवं कार्यकर्ताओं ने भी भारत के इस विचार का सींचा। इसके विपरीत मोदी उस भारत के प्रतीक हैं, जिसकी धारा विनायक दामोदार सावरकर (bit.ly/1rG3E2H), गुरु गोलवरकर आदि के साथ शुरू होकर आगे बढ़ी। उपरोक्त दोनों धाराओं में कोई मिलन बिंदु नहीं हो सकता। अतः अपनी छवि और वोट समर्थन आधार के संदर्भ में मोदी अगर इन तबकों की फिक्र ना करें, तो यह स्वाभाविक ही है।

दूसरी तरफ वे उन समूहों को लेकर निश्चिंत रह सकते हैं, जो हिंदुत्व का स्थायी वोट आधार हैं। उनके लिए मोदी सरकार की सफलता-विफलता के आकलन की कसौटी आर्थिक या विकास अथवा सामाजिक समावेशन के क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन नहीं होगा। उनके लिए फिलहाल यही काफी है कि हिंदुत्व या संघ की धारा से आया व्यक्ति देश में राजकाज के सर्वोच्च पद पर है और वहां वह हिंदू प्रतीकों को स्थापित करने में कोई हिचक नहीं दिखा रहा है।

बहराहल, अच्छे दिन की उम्मीद में पिछले चुनाव में बढ़-चढ़ कर भाजपा के हक में मतदान करने वाले तबकों को लेकर मोदी निश्चिंत नहीं हो सकते। उद्योग जगत तथा उच्च और मध्यम वर्गों को लेकर भी उन्हें सचेत रहना चाहिए। दरअसल पहले 100 दिनों में मोदी सरकार के इरादों और क्षमता को लेकर अगर कहीं सबसे ज्यादा संदेह पैदा हुआ है, तो वह इन वर्गों का दायरा है। इन वर्गों की निम्नलिखित उम्मीदें टूटी हैं-
  • मोदी की सरकार में टेक्नोक्रेट्स अधिक होंगे, जो वोट की चिंता किए बगैर फैसले लेंगे और उन पर अमल कराएंगे।
  • मोदी सरकार बनते ही भूमि अधिग्रहण कानून, पर्यावरण संरक्षण कानून, वनाधिकार कानून आदि जैसे विकास की राह में कथित रूप से रोड़ा बने अधिनियमों को खत्म करने की पहल कर दी जाएगी।
  • श्रम कानूनों में तुरंत आमूल बदलाव लाए जाएंगे, जिससे कंपनियों के लिए कर्मचारियों को मनचाहे ढंग से रखना और हटाना आसान हो जाएगा।
  • मोदी सरकार एक झटके से निवेश और व्यापार की राह के तमाम बंधन हटा देगी।
  • वह पूंजी के लिए ऐसा अनुकूल माहौल बना देगी, जैसा शायद दुनिया में कहीं नहीं है।
ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार ने उपरोक्त कार्यों को ना करने का एलान किया हो। मगर पूंजी क्षेत्र की शिकायत यह है कि उसने सिर्फ इरादा दिखाया है, वास्तव में अब तक कुछ नहीं किया। फिलहाल यह क्षेत्र अगले बजट तक इंतजार करने को तैयार दिखता है। लेकिन अगर तब तक मोदी ने अपनी सरकार कोन्यूनतम और निवेशकों के लिए मौके को अधिकतम नहीं किया, तो फिर इन तबकों की मायूसी सक्रिय रूप से जाहिर हो सकती है। (मोदी सरकार के बारे में इन तबकों समझ को ब्रिटिश पत्रिका द इकॉनोमिस्ट के दिल्ली स्थित संवाददाता ऐडम रॉबर्ट्स ने द इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में बखूबी व्यक्त किया, जिसे इस वेबलिंक पर जाकर पढ़ा जा सकता है- (bit.ly/1zO4EQE ) यहां ये नहीं भूलना चाहिए कि इन तबकों के हाथ में मीडिया का मजबूत तंत्र है, जिसने पिछले चुनाव में यूपीए को खलनायक और मोदी को महानायक के रूप में पेश करने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी।

अच्छे दिन चाहने वालों में उन तबकों का बड़ा हिस्सा है- जिनकी पहचान मोदी ने नव-मध्य वर्ग के रूप में की थी। उनके लिए असली मुद्दे महंगाई और रोजगार हैं। महंगाई के मुद्दे पर भाजपा सरकार लगभग यू-टर्न ले चुकी है। यानी वो वही भाषा बोलने लगी है, जो यूपीए के मंत्री और नेता बोलते थे। ऐसे में आम आदमी का यह भरोसा टूटता जा रहा है कि उनके पास महंगाई पर काबू पाने का कोई विशेष फॉर्मूला है। बल्कि रेल किराया बढ़ा कर और पेट्रोलियम की कीमतों पर अनियंत्रित छोड़ कर उसने यही संकेत दिया कि आम लोगों को तुरंत राहत देने की उसकी कोई इच्छा या तैयारी नहीं है। करोड़ों रोजगार सरकार कैसे पैदा करेगी, इसका भी कोई खाका उसने नहीं रखा है।

भ्रष्टाचार, काला धन और स्वच्छ सार्वजनिक छवि के मोर्चों पर भी मोदी सरकार के दौर में यू-टर्न ही ज्यादा देखने को मिले हैं। इससे अबकी बार सबसे अलग सरकार की आशाएं कमजोर पड़ी हैं। इस बिंदु पर यह उल्लेख जरूर किया जाना चाहिए कि नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के क्रम में लोगों के बीच अयथार्थ आशाएं जगाईं। इस बिंदु पर उनकी तुलना अरविंद केजरीवाल से हो सकती है। जैसे केजरीवाल ने दिल्ली में ऐसे वादे किए, जिन्हें वे पूरा नहीं कर सकते थे, वैसा ही राष्ट्रीय स्तर पर मोदी ने किया। दोनों ने यह ख्याल नहीं रखा कि ऐसे वादे काठ की हाड़ी होते हैं, जो एक बार ही आग पर चढ़ते हैं।

बहरहाल, यहां मोदी के साथ एक सुविधा जरूर है, जो केजरीवाल के साथ नहीं थी। उनके पीछे आरएसएस की ताकत है। मशहूर विद्वान और स्तंभकार क्रिस्टोफे जेफ्रेलॉ ने इसका बेहतर विश्लेषण किया है (bit.ly/1tILFqZ )। उनके मुताबिक मोदी के लिए विकास का विमर्श उनका प्लान-ए है। इससे उन्होंने उन तबकों को जोड़ने में सफलता पाई, जो विकास की मृग-मरीचिका के बगैर उन्हें वोट नहीं देते। मोदी उन्हें जोड़े रखने के लिए कुछ करेंगे और सफल हुए तो उनका वोट आधार सुरक्षित बना रहेगा। लेकिन विकास के मोर्चे पर फेल हुए (जिसकी संभावना अधिक है, क्योंकि उनकी घोषणाएं दिखावटी अधिक और जमीन पर कम हैं, जैसाकि जन-धन योजना के मामले में जाहिर हुआ है- bit.ly/1qQ7rEg ) तो उस हाल के लिए उनके पास प्लान-बी है। यह हिंदुत्व का प्लान है। तब हिंदुत्व से जुड़े उग्र या उग्रतम मुद्दे उछाले जाएंगे। उत्तर प्रदेश में लव जिहाद  को सियासी मुद्दा बना कर इसका खासा सफल प्रयोग हो रहा है। ऐसे मुद्दे कैसा जुनून पैदा करते हैं, इतिहास इसका साक्षी रहा है (bit.ly/1lxtHXq )। यह खबर भी अप्रासंगिक नहीं है कि भाजपा उत्तर प्रदेश के अगले महीने के उपचुनावों के लिए योगी आदित्यनाथ (bit.ly/1oucgl9को अपना स्टार प्रचारक बनाने वाली है। अमित शाह पहले से मौजूद हैं। क्या इसमें किसी को शक है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा ने पूरी तरह से (उग्र) हिंदुत्व के मुद्दे को अपना लिया है यानी प्लान-ए और प्लान-बी पर साथ-साथ अमल जारी है। गौरतलब है कि हमेशा के लिए तो नहीं, लेकिन एक लंबी अवधि तक जज्बाती या सांप्रदायिक मुद्दों से चुनावी बैतरणी जरूर पार की जा सकती है। मोदी सरकार के 100 दिनों का अनुभव का संदेश यह है कि ऐसे मुद्दे देश के एजेंडे में खासे ऊपर आ गए हैं। क्या वे सबसे ऊपर जाएंगे, यह जानने के लिए अभी हमें कुछ और इंतजार करना होगा।


लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.
स्वतंत्र लेखन के साथ ही फिलहाल 
जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के एमसीआरसी में 
बतौर गेस्ट फैकल्टी पढ़ाते हैं.