चियर्स फॉर फ्रीडम !

-केशव भट्ट

"...रात के भोजन के वक्त मीठा भाई ने वोदका से भरे पैमाने को हवा में हमारी ओर लहराते हुए जब ‘चियर्स फॉर फ्रीडम’ कहा तो हमारे लिये असमंजस की स्थिति हो गई। नशे में धुत होने के बावजूद मीठा भाई हमारे चेहरे पर आये भावों को समझ गये और फिर जोर-जोर से ठहाके लगा बातों को बदलने और माहौल को सामान्य बनाने की कोशिश में लग गये।..."

श्रीनगर में डल झील के किनारे साईबर कैफे के साथ परचून व सब्जी की छोटी सी दुकान चलाने वाला वह व्यक्ति आस्ट्रेलियाई महिला पत्रकार के टेढ़े-मेड़े सवालों का उत्तर देते-देते भन्नाकर दुकान के बाहर आ गया। मुझ से मुखातिब हो कर वह बोला, काश! भारत दो साल बाद आजाद होता, तो ये समस्या नहीं होती…. बात करते हैं साले….! अब हम क्या बताएँ इस अंग्रेजन को……हमारी कौम पर आरोप लगा रही है कि हम भारत के साथ रहने में सहयोग नहीं कर रहे हैं…. भारत धर्मनिरपेक्ष देश है… तुम लोग पाकिस्तान की ओर झुके हो। तंज कस रही है कि, तुम्हारी कौम परेशान रहेगी। 
इधर-उधर के दुकानदारों से बातें करने के बाद महिला पत्रकार चली गई तो उन्होंने एक गहरी साँस छोड़ी। पूछने लगा, भाईजान! आप बताइए क्या आतंकवाद इस्लाम या हिंदू की कोख से पैदा होता है ? अरे, इसे तो राजनीति ही पैदा करती आई है। और इस सबमें दोषी हमें ठहराया जा रहा है। मेरी चुप्पी पर उन्होंने गौर से मुझे देखा तो मैं हड़बड़ाते हुए इतना ही बोल पाया, भाईजान! इस बारे में तो आप कश्मीरी ही बेहतर जानते हैं। आप ही भोग रहे हो ये सब। अब चाहे ये अच्छा हो या बुरा। मेरे जवाब से उन्हें शायद शंका हुई कि कहीं मैं भी तो उसी महिला पत्रकार जैसा या हिन्दुस्तान सरकार का एजेंट तो नहीं हूँ। लेकिन मैं भी काम-धंधे वाला हूँ, यह जान कर वे निश्चिन्त हो गये। फिर उनके साथ बतियाते हुए वक्त कब खिसका पता ही नहीं चला।

अपने शुरूआती तर्क को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, भाई जान मुहम्मद अली जिन्ना तो बीमार था। टीबी का मरीज था जिन्ना ….बँटवारे के एक साल बाद 11 सितंबर 1948 को अपनी मनमर्जी की कर के वो तो कब्र में सो गया…..और उसके किये की सजा अब हम भुगत रहे हैं तब से….। दो-एक साल तक अंग्रेज अगर भारत का बँटवारा न करते तो आज शायद कश्मीरी अमन-चैन से रहते। खैर, भाईजान! एक बात कहूँ बुरा न मानियेगा, कश्मीर के हालात के लिये हिन्दुस्तानी फौज भी कम जिम्मेदार नहीं है। फौज और सरकार जितना दबाएगी उससे भारत के खिलाफ यहाँ के अवाम में नाराजगी बढ़ना लाजिमी है। हम बिजनेस वालों का तो नुकसान ही हो रहा है। हमारा कारोबार तो टूरिस्टों को लेकर ही है। यहाँ दहशतगर्दी का माहौल रहेगा तो वो कैसे आएगा ? इस साल तो कारोबार ठंडा हो गया….. आगे क्या होगा अल्ला जाने!

डल झील में जिस हाउस बोट में हम रह रहे थे, उसके मालिक का नाम मोहम्मद अशरफ था, लेकिन हर कोई उन्हें मीठा भाई के नाम से पुकारता था। मसखरापन लिए वह एकदम अलमस्त इन्सान थे। इस बार कश्मीर में टूरिस्ट कम थे। डल झील भी खामोश सी थी। दो-एक शिकारे आ-जा रहे थे। बूढ़ी अम्मा को अपनी पोती को स्कूल छोड़ने की जल्दी थी। वह पतवार को तेजी से खे रही थी। कुछ कामगार अपने खेतों के लिए झील में से मिट्टी, घास निकाल रहे थे।

डल झील में अकेले शिकारा चलाते हुए मैं मीठा भाई को देख रहा था और वे मुझे। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। मैं रह-रह कर उस दुकानदार की बातें याद कर सोच रहा था कि जिन्ना के अडि़यल रुख से हुए बँटवारे के बाद आज कश्मीर के ये हालात हैं! जिन्ना का मानना था कि हिंदुस्तान कभी सही मायने में एक कौम नहीं रहा, सिर्फ नक्शे पर देखने में वह एक लगता है। उनका कहना था कि हिंदू और मुसलमानों में एक ही चीज समान है और वह है अंग्रेज की गुलामी। इस जिद ने बँटवारा करवा कर ही छोड़ा, जिससे हजारों लोग दंगे-फसाद में मारे गए और करोड़ों लोग बेघरबार हुए। बँटवारे के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर को अपने कब्जे में लेने के लिए जंग छेड़ दी, जिसके बाद तेजी से घटे घटनाचक्र में कश्मीर का भारत में विशेष राज्य के रूप में विलय हुआ। उस वक्त किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह विलय किस तरह की परेशानियों का सबब बनेगा।

कश्मीर की जनता का कहना है कि भारत सरकार ने कश्मीर की स्वायतत्ता में कई बार दखलअंदाजी कर अलगाववादी धारा को मजबूत किया। वैसे देखा जाए तो कश्मीर समस्या 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत सेना की वापसी के बाद ज्यादा जटिल हुई। पाकिस्तान उसके बाद अफगान मुजाहिदीन की तरह गुरिल्ला लड़ाई कर कश्मीर को भारत से छीन लेने की रणनीति पर जुट गया। और अब अफगानिस्तान से अमरीकी की वापसी के संकेत मिल रहे हैं तो पाकिस्तान ने फिर से कश्मीर के हालात खराब कर दिये हैं। अब तो सांप्रदायिक ताकतों का भारत के हर क्षेत्र में बोलबाला हो जाने की वजह से कोई कश्मीरी भी देश के अन्य भागों में अपने आप को सुरक्षित नहीं समझता है।

रात के भोजन के वक्त मीठा भाई ने वोदका से भरे पैमाने को हवा में हमारी ओर लहराते हुए जब ‘चियर्स फॉर फ्रीडम’ कहा तो हमारे लिये असमंजस की स्थिति हो गई। नशे में धुत होने के बावजूद मीठा भाई हमारे चेहरे पर आये भावों को समझ गये और फिर जोर-जोर से ठहाके लगा बातों को बदलने और माहौल को सामान्य बनाने की कोशिश में लग गये।

दिन में डल झील में शिकारा चला रहे एक बुजुर्ग की बात भी मुझे याद आई, ‘‘साहब, कश्मीरी खुद भी नहीं चाहेगा कि कश्मीर की समस्या सुलझे…… इसे कुछ इस तरह से समझें……कश्मीर को एक ओर जहाँ भारत से सुरक्षा व पर्यटन के साथ अन्य विशेष पैकेजों की सौगात मिलती है तो वहीं पाकिस्तान से भी अपरोक्ष रूप से यहाँ की कौम के रहनुमाओं को रुपया-पैसा सहित अन्य कई सहूलियतें मिल जाती हैं। अब भला वे क्यों चाहेंगे कि उनकी ऐयाशी में कमी आए…..!

http://1.bp.blogspot.com/-s7i89NaPRDo/TzDBlOfOeVI/AAAAAAAAARQ/_QwYT5wBYhg/s1600/keshav+bhatt.jpgकेशव भट्ट पत्रकार भी है और यात्री भी.
पत्रकारिता इनका पेशा है और यात्राएँ शौक.
उच्च हिमालय की ढेरों यात्राएं रही हैं और उन पर निरंतर लेखन.
संपर्क- keshavbhatt1@yahoo.com