'नये दौर' और 'नये मोदी' की तफतीश...

अभिनव श्रीवास्तव
-अभिनव श्रीवास्तव

"...ऊपर दिये गये विवरणों के आधार पर ये प्रश्न सहज उठ सकता है कि आखिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार बगैर कोई राजनीतिक कीमत चुकाये ऐसे निर्णय क्यों ले पा रही है? कुछ टिप्पणीकारों और विश्लेषकों ने जिसे 'सत्ता का अति सकेन्द्रण' और 'लोकतांत्रिक कायदे-कानूनों का उल्लंघन' कहा है, उस पर सार्वजनिक विमर्श के एक बड़े दायरे में लगभग मौन सहमति का माहौल क्यों है? निश्चित तौर पर इसका एक बड़ा कारण नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा और उसके सहयोगियों को मिला संगठित जनादेश है, लेकिन इससे भी बड़ा कारण इस जनादेश के साथ जुड़ा हुआ खास सन्देश और वह विशिष्ट पृष्ठभूमि और हालात हैं, जिनमें 'भाई नरेंद्र मोदी' की मसीहा और भाजपा की एक 'उत्थानवादी पार्टी' जैसी छवि तैयार की गयी..."

साभार; द हिन्‍दू
गर कोई पिछले कुछ महीनों में देश के राजनीतिक हालातों पर नजर डाले तो स्वभाविक रूप से इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि 'राजनीति' की जमीन एकाएक बहुत उर्वर हो गयी है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार लगभग हर रोज अपने 'ताजे' फैसलों से यह सन्देश देने की कोशिश में जुटी हुयी है कि देश की राजनीति, संस्कृति और अर्थव्यवस्था को वह किसी पुरानी जकड़न से बाहर निकाल रही है। सरकार के लगभग हर फैसले पर मीडिया का बड़ा तबका इस सन्देश को इसी रूप में ग्रहण करके प्रचारित-प्रसारित करने में लग जाता है। नतीजतन, सार्वजनिक दायरों में यह भ्रम बहुत आसानी से बना हुआ है कि मोदी सरकार वास्तव में कोई 'बदलाव वाली' और 'उत्थानवादी परिघटना' है।
इससे पहले कि इस अंर्तविरोध की तह में जाया जाये, सरकार द्वारा अपने शासन के शुरुआती कार्यकाल में लिये कुछ बड़े फैसलों पर नजर डालते हैं-

1) सबसे ताजा फैसला बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाने का है। खबर है कि सरकार की आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति बजट सत्र में बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा को 29 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने का मन बना चुकी है। गौर करने वाली बात ये है कि साल 2008 में बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव यूपीए सरकार ने रखा था, लेकिन तब स्वयं भाजपा और विपक्षी दलों के विरोध के चलते संबंधित संशोधन विधेयक राज्य सभा में नहीं रखा जा सका था। भाजपा राज्य सभा में इस संशोधन का विरोध करने वाली पार्टियों में बढ़-चढ़कर शामिल थी। वैसे मोदी सरकार का कुछ इसी तरह का रुख तब भी सामने आया था जब वाणिज्य और उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमन ने आधिकारिक तौर पर मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश के फैसले को वापस लेने से इंकार किया था। याद दिलाने की जरुरत नहीं कि यूपीए सरकार द्वारा लिये गये इस फैसले पर विरोध का सबसे मजबूत झंडा भाजपा ने ही बुलंद किया था। वैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमा को खुलकर बढ़ाने की मोदी सरकार की पहलकदमियों और संघ और भाजपा की देसी संस्कृति और स्वदेशी अपनाओ की मांगों को साथ में रखकर किस तरह देखा जाना चाहिये?

2) काले धन को वापस लाना भाजपा के लिये यूपीए शासन के दौरान तत्कालीन और पूर्ववर्ती सरकारों को घेरने का एक सदाबहार मुद्दा रहा। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार एम बी शाह की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन कर यह दिखाने की कोशिश भी की कि वह इस मामले के प्रति गंभीर है। हालांकि समय बीतने पर इस पहल की वास्तविकता और खोखलापन खुद सरकार के मंत्रियों के मुंह से ही जाहिर होने लगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में दिये गये एक लिखित जवाब में यह स्वीकार किया कि सरकार के पास देश के अन्दर और बाहर जमा काले धन का कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है। इस आंकलन के लिये नेशनल इंस्टीट्यूट आफ पब्लिक फाइनेंस एंड पालिसी और नेशनल काउंसिल आफ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च द्वारा साल 2011 में शुरू किये गये स्वतंत्र अध्ययन भी किसी निष्कर्ष पर पहुंच नहीं पाये हैं। भाजपा के ही एक अन्य सांसद निशिकांत दुबे फाइनेंस बिल पर चर्चा के दौरान काले धन पर अपनी खीझ का इजहार ये कहते हुये कर चुके हैं कि इस जीवन में सरकार स्विट्जरलैंड के बैंको में जमा काला धन वापस नहीं ला पायेगी। दुबे ने मामले की पेचीदगी की ओर संकेत करते हुये बताया कि स्विट्जरलैंड के बैंकों में खाताधारकों ने वहां के नागरिकों के साथ ट्रस्ट बनाये हुये हैं और जब तक सम्बंधित ट्रस्टियों के नाम की सूची सरकार को उपलब्ध नहीं होती, काला धन वापस लाने की कोई कोशिश कामयाब नहीं हो सकती। इससे पहले संसद में एक प्रश्न के जवाब में अरुण जेटली स्विस सरकार की ओर से चार जुलाई को आयी जानकारी को भी साझा कर चुके हैं जिसके अनुसार-"स्विटज़रलैंड के वित्तीय संस्थानों में अपने नाम से या किसी अन्य संरचना के तहत कर संपत्ति रखने वाले भारतीय करदाताओं और नागरिकों की कोई सूची तैयार नहीं की गयी है"। इसके बावजूद वित्त मंत्री अरुण जेटली आये दिन बयानबाजी कर देश को ये आश्वासन दिलाने में जुटे हैं कि सरकार जल्द ही काला धन वापस ले आयेगी। क्या ऐसे बयान सिर्फ माहौल बनाये रखने की कोशिश का हिस्सा नहीं है?

3) विपक्ष में रहते हुये भाजपा और देश में मीडिया के एक तबके ने यूपीए सरकार की साल 1962 में हुये चीन युद्ध से संबंधित विवादित हेंडरसन रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करने के लिये जमकर आलोचना की थी। खुद वर्तमान रक्षा और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तब संसद में दो टूक शब्दों में रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को कहा था। हालांकि सत्ता में आने के बाद जेटली को सांप सूंघ गया और उन्होंने हेंडरसन रिपोर्ट को यह कहते हुये सार्वजनिक करने से मना कर दिया कि संबंधित रिपोर्ट को सार्वजनिक करना ‘राष्ट्रीय हितों’ के लिये खतरनाक होगा। जेटली के इस बयान से एक बार फिर भाजपा के दोहरे और अवसरवादी रवैये का पता चलता है।   

4) एक चर्चित विवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वर्तमान मुख्य सचिव नृपेन्द्र मिश्रा की नियुक्ति को लेकर भी रहा। मिश्रा साल 2006-2009 तक ट्राई के अध्यक्ष रहे और ट्राई अधिनियम 1997 के प्रावधान 5 (एच) के तहत मुख्य सचिव पर पर उनकी नियुक्ति नहीं हो सकती थी। इस एक्ट के अनुसार ट्राई के अध्यक्ष पद पर रहा कोई भी व्यक्ति भविष्य में केंद्र और राज्य सरकारों के अंतर्गत किसी पद पर कार्यरत नहीं हो सकता था। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने आनन-फानन में अध्याधेश लाकर इस एक्ट में संशोधन का रास्ता तैयार कर दिया। कांग्रेस ने सरकार के इस कदम पर उचित ही यह ध्यान दिलाया कि भाजपा ही वह पार्टी थी जिसने भ्रष्टाचार-विरोधी विधेयक और खाद्य सुरक्षा विधेयक पर कुछ महीनों पहले यूपीए सरकार द्वारा अध्याधेश के जरिये अफसर नियुक्त करने की प्रक्रिया को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक बताया था।

5) नरेंद्र मोदी सरकार के छोटे से कार्यकाल में ही ऐसे उदाहरणों की एक लम्बी सूची तैयार हो गयी है, जिनसे बरसों के संघर्ष और जद्दोजहद के बाद हासिल किये गये कई कानूनी प्रावधान सर के बल खड़ा होने को तैयार दिख रहे हैं। इस दिशा में सबसे ताजी और आपत्तिजनक पहलें महिला और बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने की हैं। पहले उन्होंने यह बयान दिया था कि 18 वर्ष से कम उम्र के किशोर निर्भय हो कर बलात्कार कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम रहता है कि बाल न्याय कानून के कारण उन्हें कड़ी सजा नहीं मिलेगी। हाल में यह खबर भी आई है कि वे घरेलू हिंसा कानून में भी ऐसे संशोधन का मन बना रही हैं जिसके तहत बहू की हिंसा से सास को भी सुरक्षा हासिल हो सके। तमाम जानकार इस ओर ध्यान खींच चुके हैं कि बाल न्याय कानून के दायरे में 18 वर्ष से कम के आयु किशोरों को लाना समस्या का समाधान नहीं है और ऐसा कोई भी संशोधन तमाम वैज्ञानिक निष्कर्षों की उपेक्षा करने की कीमत पर ही लिया जा सकता है। घरेलू हिंसा कानून के सन्दर्भ में भी मेनका गांधी की मंशा पर सवाल लग सकते हैं, क्योंकि सासों को बहु की हिंसा के खिलाफ अधिकार देने की सोच अंततः एक परिवार में बाहरी महिला की हैसियत से आयी बहू के लिये स्थितियों को और मुश्किल बनायेगी। बहुत संभव है कि ऐसे प्रावधान का व्यवहारिक इस्तेमाल सांसें बहु पर अत्याचार करने के बाद कानूनी संरक्षण के लिये करें।

6) मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही विदेशी धन से चलने वाले गैर सरकारी संस्थानों (एनजीओ) की गतिविधियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के संकेत दिये थे। इसे देखकर ऐसा लग सकता था कि सरकार इन संगठनों की कार्यप्रणाली को जवाबदेह बनाने के लिये  कदम उठा रही है, लेकिन जल्द ही ये जाहिर हो गया कि इस कदम के पीछे सरकार का ऐसा कोई सरोकार नहीं है, बल्कि वास्तविक मंशा असहमति और प्रतिरोध के समूहों का गला दबाने की है। मोदी सरकार ने आईबी से देश की आर्थिक सुरक्षा के लिये खतरा बने विदेशी धन प्राप्त एनजीओ पर रिपोर्ट तैयार करवायी, लेकिन इस रिपोर्ट में एनजीओ समूहों के साथ गुजरात के कई जनसंगठनों को भी शामिल किया गया। भूमि अधिग्रहण आदि मुद्दों पर आंदोलनरत जन संगठनों को रिपोर्ट में शामिल करने के तुरंत बाद नर्मदा कंट्रोल आथारिटी ने सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई सत्रह मीटर बढ़ाने की इजाजत दी, जिसके फलस्वरूप बड़ी संख्या में आदिवासी विस्थापित होने वाले थे। सवाल उठता है कि आईबी की इस रिपोर्ट के आने के तुरंत बाद ही बांध की ऊंचाई बढ़ाने का निर्णय क्यों लिया गया? वहीं खबरों से यह सामने आया कि आईबी ने अपनी रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी के एक पूर्व भाषण के अंशों को उठाकर ज्यों का त्यों शामिल कर लिया है। आईबी की इस रिपोर्ट के बारे में गृह मंत्रालय को कोई खबर नहीं थी और यह सीधे गृह मंत्री राजनाथ सिंह को दी गयी थी। ये सभी इस बात के संकेत थे कि गैर सरकारी संगठनों को जवाबदेह बनाने की आड़ में मोदी सरकार ने देश में असहमति की आवाजों को सन्देश दिया है।

7) नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जब एनडीए को जनादेश मिला था तो इस बात को लेकर ख़ास तौर पर आशांकायें थीं कि कहीं भाजपा अपने ‘एक धर्म एक राष्ट्र’ के अभियान को नयी सरकार के नेतृत्व में लागू करने की कोशिश तो नहीं करेगी। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बतौर शासक पहचान और वैधता पर भी कई तरह के सवाल थे। कहा ये भी गया कि मोदी एक बदले हुये दौर के शासक हैं और वह ये सन्देश देने का अवसर हाथों से जाने नहीं देंगे। लेकिन नयी सरकार के कार्यकाल में भी ऐसे कई मामले और विवादित निर्णय लिये गये जिनसे यह भ्रम टूटता रहा-
अ) इस दिशा में सबसे विवादित फैसला इन्डियन काउंसिल आफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएआर) के अध्यक्ष पद पर सनातन हिन्दू धर्म के पैरोकार कहे जाने वाले वाई सुदर्शन राव की नियुक्ति का  रहा। आईसीएआर की स्थापना सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1972 के तहत देश में इतिहास से जुड़े हुये वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा देने के लिये हुयी थी। राव की नियुक्ति पर देश की नामी और बरसों से  कार्यरत हस्तियों ने यह कहकर आपत्ति दर्ज की कि राव की पहचान मुख्यतः एक इतिहासकार की नहीं है और न ही उनकी पृष्ठभूमि वैज्ञानिक शोध कार्यों को बढ़ावा देने की रही है। खबरों में यह भी सामने आया कि वे पौराणिक हिन्दू ग्रन्थ महाभारत की तिथि निर्धारण के कार्य में लगे हैं, जिसका  देश के अधिकांश इतिहासकारों की राय में वैज्ञानिक निर्धारण नहीं किया जा सकता है। इस संबंध में इतिहासकार और आईसीएआर के पूर्व अध्यक्ष रहे इरफ़ान हबीब की यह टिप्पणी गौर करने वाली रही-“ यह सही है कि आईसीएआर के अध्यक्ष पद के लिये किसी योग्यता का प्रावधान नहीं है, लेकिन ऐसी नियुक्ति के समय संस्था की स्थापना के उद्देश्यों का ध्यान रखा जाता है। नये अध्यक्ष को सीधे संस्था के मूल उद्देश्यों को खत्म करने की ओर नहीं बढ़ना चाहिये "। 
ब) एक अन्य ताजा और चौकाने वाला मामला गुजरात में शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति के प्रमुख और कुछ महीनों पहले वेंडी डोनिगर की किताब 'दि हिन्दूज- एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री' की प्रतियां पेंगुइन प्रकाशन को नष्ट करने के लिये मजबूर करने वाले  दीनानाथ बत्रा से जुड़ा है। खबर है कि बीती 30 जून को गुजरात सरकार ने राज्य के 42,000 प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को दीनानाथ बत्रा की हिन्दी से गुजराती में अनुदित की गयी नौ किताबों को बतौर पूरक साहित्य पाठ्यक्रम में शामिल करने का आदेश दिया है। इन नौ किताबों में लिखी गयी कुछ बातें इतनी आपत्तिजनक हैं कि उनको सार्वजानिक मंचों पर दोहराने में भी किसी प्रगतिशील और आजादी पसंद व्यक्ति को हिचक हो सकती है। इन किताबों में अपने जन्म दिन पर बर्थ दे केक काटने से मना करने की बात कहते हुये इसे पश्चिमी संस्कृति बताया गया है। इतना ही नहीं नौनिहालों को यह शिक्षा दी गयी है कि वह भारत का मानचित्र खींचते समय पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश को भी अखंड भारत का हिस्सा दिखाये। इसके अलावा पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस चौदह अगस्त को छुट्टी घोषित करने और अखंड भारत स्मृति दिवस के रूप में भी मनाने की भी मांग की गयी है। खबर ये भी है कि गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल राज्य के स्कूलों में महिला अध्यापकों के जींस और टी शर्ट पहनने पर पाबंदी लगाने और इसके स्थान पर साड़ी या सलवार पहनने को अनिवार्य बनाने की तैयारी में हैं। गुजरात राज्य सरकार के इन फैसलों का जिक्र इसलिये जरूरी है क्योंकि हाल ही में दीनानाथ बत्रा ने यह दावा किया है कि उनकी सलाह पर मानव एवं संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पहले ही शिक्षा नीति और पाठ्यक्रमों में बदलाव का भरोसा उन्हें दे चुकी हैं। बत्रा ने यह भी जोड़ा है कि एनसीईआरटी, एनसीटीई पहले ही पाठ्यक्रमों के मूल्यांकन का काम शुरू कर चुके हैं। राज्य सभा में बीती 23 जुलाई को बोलते हुये गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी यह संकेत कर चुके हैं कि नैतिक मूल्यों के गिरते स्तर के चलते सरकार पाठ्य पुस्तकों में बदलाव पर विचार कर रही है। 
स) महाराष्ट्र सदन में कुछ शिव सेना सांसदों द्वारा एक मुस्लिम मैनेजर के साथ की गयी कारगुजारियों की अंतर्कथा ने इस समय देश में चर्चा का विषय है। खबरों में और सोशल मीडिया पर जारी किये गये वीडियो में यह साफ तौर पर सामने आया है कि शिव सेना सांसद ने महाराष्ट्र सदन के मेस में अपनी पसंद के खाने के उपलब्ध नहीं होने से नाराज होकर मेस के मुस्लिम मैनेजर के मुंह में जबरन रोटी डाल दी, जबकि वह कर्मचारी अपने खुद के रोजा (व्रत) पर होने की जिरह कर रहा था। इतनी गंभीर घटना पर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सरकार ने कोई अफसोस जाहिर नहीं किया है। संसद में कुछ भाजपा सांसदों ने शिव सेना सांसद की कोशिश को अनुचित सार्वजनिक व्यवहार जरूर कहा है, लेकिन कुल मिलाकर इन सांसदों का रुख रक्षात्मक ही है।

ऊपर दिये गये विवरणों के आधार पर ये प्रश्न सहज उठ सकता है कि आखिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार बगैर कोई राजनीतिक कीमत चुकाये ऐसे निर्णय क्यों ले पा रही है? कुछ टिप्पणीकारों और विश्लेषकों ने जिसे 'सत्ता का अति सकेन्द्रण' और 'लोकतांत्रिक कायदे-कानूनों का उल्लंघन' कहा है, उस पर सार्वजनिक विमर्श के एक बड़े दायरे में लगभग मौन सहमति का माहौल क्यों है? निश्चित तौर पर इसका एक बड़ा कारण नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा और उसके सहयोगियों को मिला संगठित जनादेश है, लेकिन इससे भी बड़ा कारण इस जनादेश के साथ जुड़ा हुआ खास सन्देश और वह विशिष्ट पृष्ठभूमि और हालात हैं, जिनमें 'भाई नरेंद्र मोदी' की मसीहा और भाजपा की एक 'उत्थानवादी पार्टी' जैसी छवि तैयार की गयी। 

यूपीए राज में फैली नीतिगत निरंकुशता, दुनिया भर में पूंजीवादी व्यवस्थाओं द्वारा अपने विस्तार के नये ढांचों की तलाश में की गयी जोर-आजमाइश और उसके नतीजे में मध्य वर्ग के भीतर बढ़े असंतोष की परिस्थितियों का इस्तेमाल कर भाजपा ने भारतीय राजनीति के सन्दर्भ बिंदु को बदलने में सफलता हासिल की। साथ ही बीते दो दशकों से सांस्कृतिक स्वायत्तता की तलाश कर रहे हिन्दू मध्य वर्ग की स्थिति को भांपकर नरेंद्र मोदी ने संघ और भाजपा की स्वीकार्यता को सर्वथा नये मुकाम पर पहुंचा दिया। यहीं से भाजपा और भाई नरेंद्र मोदी ने 'परिवर्तन' और उत्थान के लिये सत्ता में आयी पार्टी का सन्देश और भाव तैयार किया। यह अकारण ही नहीं था कि भाजपा समर्थक तबकों के बुद्धिजीवी कहे जाने वाले वर्ग ने इस बात का जोर-शोर से प्रचार किया कि नरेंद्र मोदी की जीत से भारतीय राजनीति के पुराने और बने-बनाये समीकरण बदल गये हैं। 

एक दैनिक अंग्रेजी अखबार में चुनाव नतीजों के ठीक अगले दिन स्तंभकार भानु प्रताप मेहता ने 'इलेक्शन दैट ब्रोक एवरी नोन रूल आफ इंडियन पोलिटिक्स' शीर्षक से लिखे गये अपने लेख में कहा-" नरेंद्र मोदी की जीत ने भारतीय राजनीति के हर बने-बनाये समीकरण को बदल दिया है। देश के सभी वर्गों ने जाति और वर्ग के समीकरणों से ऊपर उठकर नरेंद्र मोदी को स्वीकार्यता दी है।" गौर से देखा जाये तो भानु प्रताप मेहता की तरह ही नरेंद्र मोदी की जीत के बाद जाति और पहचान के समीकरणों के अप्रासंगिक हो जाने की घोषणा कई बुद्धिजीवियों ने की। हालांकि ऐसा कहते हुये स्वयं भानु प्रताप मेहता और उनके जैसे कई विचारक ये भूल गये कि संभवतः सोलहवीं लोकसभा का चुनाव भारतीय संसदीय इतिहास में एक मात्र ऐसा चुनाव था जिसमें प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत माने जाने वाले उम्मीदवार की 'जाति' ही केन्द्रीय मुद्दा बनी हुयी थी। नरेन्द्र मोदी ने लगभग हर चुनावी सभा में अपनी जातीय पृष्ठभूमि का उल्लेख किया। जाहिर है कि भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका ने पुर्नआकार लेकर नये रूप तो लिये हैं, लेकिन उसकी प्रासंगिकता पूरी तरह खत्म हो गयी,ये तथ्यों और हालातों की उपेक्षा करने की कीमत पर ही कहा जा सकता है।

ऐसा बिलकुल नहीं है कि इन बुद्धिजीवी जमातों ने किसी नासमझी के चलते राजनीति के बने-बनाये नियमों की विदाई की घोषणा कर दी। वास्तव में 'परंपरागत समीकरणों की विदाई' जैसे विमर्शों के बार-बार दोहराये जाने से ही यह भ्रम और भाव तैयार होता है कि 'भाई नरेंद्र मोदी' किसी 'मसीहा' की तरह देश को नये दौर में लेकर जा रहे हैं। आज ये सन्देश इतने गहरे से सरकार के हर निर्णय और पहलकदमी के साथ गुथा हुआ है कि इन कदमों पर विरोध जताने की कोई सामान्य कोशिश भी नजर नहीं आ रही है। इस रूप में आज देश के प्रगतिशील धाराओं के ऊपर ऐतिहासिक जिम्मेदारी आ गयी है। अगर आज इन समूहों ने हालातों को समझने और लड़ने का माद्दा नहीं दिखाया तो देश की राजनीति लम्बे समय के लिये प्रतिगामी दिशा की ओर मुड़ जायेगी।


अभिनव पत्रकार हैं. पत्रकारिता की शिक्षा आईआईएमसी से.
राजस्थान पत्रिका (जयपुर) में कुछ समय काम. अभी स्वतंत्र लेखन.
इन्टरनेट में इनका पता  abhinavas30@gmail.com है.