'अच्छे दिनों' का टूटता भ्रम : उत्तराखंड उप-चुनाव परिणाम


-रोहित जोशी

"...दरअसल, इस हार में छिपे संकेत और निहितार्थ सिर्फ उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति के लिए ही नहीं बल्कि देश की राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी हैं. मोदी चुनाव प्रचार अभियान के दौरान अपनी सफल प्रचार रणनीति के चलते, लोगों के बीच ऐसे सपने बो पाने में सफल हुए थे, जिसने उनपर वोटों की भारी बरसात कराई और बीजेपी ने अप्रत्याशित तौर से 284 सीटों का आंकड़ा पा लिया था. लेकिन सरकार बनाने के बाद जिस तरह मोदी सरकार हर मोर्चे पर असफल हुई है और जनता को दिखाए गए जादुई सपनों की कलई जब उतरने लगी है तो इस पर जनता की प्रतिक्रिया उत्तराखंड के इन चुनावों में देखने को मिली है..."

कार्टून- गोपाल शून्य की फेसबुक वाल से साभार
त्तराखंड उपचुनावों में कांग्रेस की तीनों सीटों में हुई जीत की खबर तो तब भी राष्ट्रीय मीडिया में दिखी है, लेकिन इन सीटों में बीजेपी की करारी हार के तौर पर यह खबर मीडिया से बिलकुल नदारत है. जबकि पत्रकारिता के नजरिये से बीजेपी की हार की खबर की न्यूज वेल्यू, 'मोदी की लहर/आंधी/सुनामी से लोकसभा चुनावों में मिले 284 के आंकड़े के चलते, ज्यादा है. लेकिन यह खबर कोई मीडिया नहीं छू रहा. वह अब भी मोदी महिमा-मंडन में ही व्यस्त है. 

उत्तराखंड में - धारचूला, सोमेश्वर और डोईवाला - इन 3 सीटों में उपचुनाव हुए. जहाँ डोईवाला और सोमेश्वर सीटों के विधायक, रमेश पोखरियाल 'निशंक' और अजय टम्टा के, लोकसभा चुनाव में जीत जाने से खाली हुई इन सीटों पर उप चुनाव हुए, वहीँ धारचूला में उत्तराखंड के वर्तमान सीएम हरीश रावत के लिए उनके विश्वासपात्र विधायक हरीश धामी ने अपनी सीट छोड़ी थी.


मोदी की भयंकर लहर के बाद बनी भाजपा सरकार के अभी दो महीने ही गुजरे हैं. ऐसे में उस प्रदेश से इस तरह उसके क्लीन स्वीप हो जाने को कैसे देखा जाना चाहिए, जहां से दो महीने पहले ही वह लोकसभा की पाँचों सीटों को जीत कर आई है. क्या यह मोदी के 'अच्छे दिनों' के मीडिया प्रचारित वादों की दो महीने में ही कलई खुल जाने की प्रतिक्रिया है?

इन चुनावों में धरचूला सीट में हरीश रावत ने बीजेपी प्रत्याशी बीडी जोशी को 20000 मतों से हराया। वहीँ पूर्व मुख्यमंत्री और डोईवाला सीट से बीजेपी के विधायक रमेश पोखरियाल 'निशंक' की इस सीट में बीजेपी को हार का मुह देखना पड़ा. यहाँ कांग्रेस प्रत्याशी हीरा सिंह बिष्ट ने बीजेपी प्रत्याशी त्रिवेन्द्र सिंह रावत को 3000 वोटों से मात दी. त्रिवेन्द्र बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव हैं और वे लोकसभा चुनावों में उत्तरप्रदेश में अमित शाह के साथ सह-प्रभारी भी रह चुके हैं, जहाँ बीजेपी ने जबरदस्त प्रदर्शन किया था. इसी तरह सोमेश्वर सीट में जहाँ बीजेपी के अजय टम्टा पिछले दो बार से लगातार जीतते आ रहे थे वहां भी कांग्रेस की रेखा आर्या ने  बीजेपी के मोहन लाल आर्या को भारी मतों से मात दी है.

मोदी नाम की इतनी बड़ी आंधी और भारत विजय जैसी घोषणाओं के तुरंत दो महीने बाद, उत्तराखंड के इन उपचुनावों में बीजेपी की इस हार के गहरे निहितार्थ हैं. यह हार जिन तीन सीटों में हुई है उनमें से दो सीटें तो बीजेपी की रही हैं जिन्हें कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में अपनी ऐतिहासिक हार के बाद भी भाजपा से छीना है. यह कैसे संभव हुआ?

कार्टून- गोपाल शून्य की फेसबुक वाल से साभार
दरअसल, इस हार में छिपे संकेत और निहितार्थ सिर्फ उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति के लिए ही नहीं बल्कि देश की राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी हैं. मोदी चुनाव प्रचार अभियान के दौरान अपनी सफल प्रचार रणनीति के चलते, लोगों के बीच ऐसे सपने बो पाने में सफल हुए थे, जिसने उनपर वोटों की भारी बरसात कराई और बीजेपी ने अप्रत्याशित तौर से 284 सीटों का आंकड़ा पा लिया था. लेकिन सरकार बनाने के बाद जिस तरह मोदी सरकार हर मोर्चे पर असफल हुई है और जनता को दिखाए गए जादुई सपनों की कलई जब उतरने लगी है तो इस पर जनता की प्रतिक्रिया उत्तराखंड के इन चुनावों में देखने को मिली है. यूँ तो उत्तराखंड के लोगों के कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही सरकारों के साथ के एक जैसे ही अनुभव रहे हैं लेकिन फिर भी बीजेपी और मोदी के हवाई सपनों का उसके पास जो भी विकल्प था उसने उसे चुनकर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर दी.

मोदी सरकार बनने के बाद बेकाबू महंगाई, सब्जी-तेल से लेकर रेल किरायों में बढ़ोत्तरी, अटपटा बजट, और एक भी जनपक्षीय योजना के बजाय बुलैट ट्रेन जैसे गैर-जरूरी 'विकास अभियान' की ओर जोर, साथ ही अपने एक एक कदम का बेजा प्रोपगेंडा. लोगों के पास यही सब कुछ पहुंचा है. और अब वे इससे दो महीनों में ही आजिज आ चुके हैं. अगर वे लें तो उत्तराखंड में तीनों सीटों में मिली यह हार, बीजेपी और मोदी दोनों को एक सबक है. क्योंकि अभी आगे और कई चुनाव होने हैं.