मृत्‍युदंड के नकार का तर्क

-डाॅ. प्रभात उप्रेती

डाॅ. प्रभात उप्रेती
बैंगलौर में एक बच्ची के साथ और लखनऊ में एक महिला के साथ हुए जघन्य बलात्कार के बाद उभरे आंदोलनों ने भी दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ उमड़े आंदोलन की ही तरह समाज को झकझोरने की कोशिश की है. इतने व्यापक आन्दोलनों और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा-परिचर्चा के बावजूद भी रेप की घटनाओं में कोई रोकथाम नहीं है. वह कौन सी वजहें हैं जिसके चलते रेप जैसे अपराध और भी अधिक वीभत्सता के साथ लगातार सामने आ रहे हैं?

 दिल्ली गैंग रेप के बाद praxis ने इस विषय पर आलेखों के जरिए इस विमर्श के विविध पहलुओं पर ठोस बात करने की कोशिश की. praxis में प्रकाशित आलेखों और कुछ नए आलेखों का संकलन कर उन्हें 'उम्मीद की निर्भयाएँ' नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित कराया। इसी किताब से कुछ आलेखों को हम, इस विमर्श को और मुकम्मल ढंग प्रसार देने के लिए यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं. 

अक्‍सर इन घटनाओं की प्रतिक्रिया में जो आंदोलन उभरते हैं. उनमें 'बलात्‍कारियों को फांसी दो' का नारा आम तौर पर सुनाई देता है. लेकिन क्‍या बलात्‍कारियों को फांसी इस समस्‍या से निजात दिलाने की तरफ एक मामूली सा भी कदम साबित हुआ है/हो सकता है. या उलटे यह हमारी न्‍याय व्‍यवस्‍था के विकासक्रम में उभरे 'मृत्‍युदंड के नकार' के एक प्रबल विचार को और भी पीछे धकेलता है. इस विषय पर एक गंभीर चर्चा करता राजनीतिशास्‍त्री डाॅ. प्रभात उप्रेती का यह आलेख 'उम्‍मीद की निर्भयाएं' से लेकर हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं.  
-संपादक

साभार- http://www.thehindu.com/
सुकरात को जब एथेंस की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने मृत्युदंड दिया था तो उन्होंने कहा था- ‘‘सोचना, खतरनाक हो सकता है, पर ‘नहीं सोचना’ अंततः सबसे अधिक खतरनाक हो जाता है...।’’ यह उन्होंने लोकतंत्र के उत्तेजनात्मक खतरे को देख कर कहा था। दिल्ली गैंग रेप के बाद भी जब एक अनिवार्य आंदोलन उभरा तो यह भी एक घटना की उत्तेजनात्मक प्रतिक्रिया ही थी। जो दो वैचारिक धाराएं वहां आंदोलनरत थी उनका स्पष्ट अंतर दोषियों को फांसी देने या न देने के उनके तर्काधार में दिखाई दिया। यहीं सुकरात के कथन के ‘सोचने’ और ‘ना सोचने’ को इन तर्काधारों के संदर्भ में देखा जा सकता है। जिस उन्माद में चारों तरफ से फांसी की सजा के नारे उछले (या मीडिया द्वारा इसे हवा दी गई) वह इस बात पर बिना सोचे समझे ही उभरे कि दुनिया भर में मृत्युदंड के नकार का एक प्रबल विचार भी मौजूद है, जिसका अपना मजबूत तर्क है। साथ ही ऐसा भी नहीं था कि मृत्युदंड के नकार के इस विचार के समर्थक इस आंदोलन में नहीं थे, अपितु इस विचार के वाहकों ने ही आखिरकार आंदोलन को ‘फांसी के प्रतिगामी नारों’ के बजाय ‘महिलाओं की समूची आजादी के नारों’ का रास्ता दिखाया था। जो अंतत आंदोलन का प्रतिनिधि नारा बना।

लेकिन बावजूद इसके अगर हम अब भी फांसी के बारे में सामान्यतया हमारे समाज के नजरिए की पड़ताल करें तो पाएंगे कि फांसी एक सर्वमान्य सजा है। अधिकतर आबादी तो जघन्यतम अपराध करने वालों को भीड़ के हवाले कर देने से बिलकुल सहमत होती है। और बहुत हुआ तो कुछ प्रगतिशील लोग हमारे न्यायिक प्रावधानों से ही सहमत होते हुए यह कह देते हैं कि ‘रेयरेस्ट आॅफ द रेयर केस’ में फांसी की सजा मान्य हो सकती है। दरअसल ये समूची मानसिकता हमारे समाज की सभ्यता के विकासक्रम की पैरामीटर है। इस पैरामीटर में भारतीय समाज का एक बड़ा तबका तो दरअसल ‘सजा’ और ‘बदले’ के मूलभूत फर्क को ही नहीं जानता। इसलिए वह सजा के तौर पर बदला लेने की शक्ल में, अपराधी को भीड़ में सौंप देने, लिंग काट देने, रसायनिक बंधियाकरण और फांसी की सजा/मृत्युदंड को स्वाभाविक तौर पर जायज मानता है।  

यहां इस आलेख में मृत्युदंड के प्रति समग्र समझ बनाने के उद्देश्‍य से इसे इसके ऐतिहासिक संदर्भों में देखने की कोशिश की जाएगी। इसलिए इसे सिर्फ अपराधियों को दिए गए मृत्युदंडों तक ही सीमित नहीं रखा जाएगा, वरन् इतिहास के उन नायकों को भी इस विश्‍लेषण में शामिल किया जाएगा जिन्हें तत्कालीन राज-व्यवस्थाओं ने अपराधी बता कर ही मृत्युदंड दिया। इतिहास में तलाशने पर मृत्युदंड शब्द के साथ सुकरात, ईसा मसीह से लेकर भगतसिंह और जरा सा दूसरे संदर्भों में गांधी तक का नाम भी साथ पैबस्त मिलता है। यह उदाहरण इतिहास व समाज के सर्वोच्च आदर्श व्यक्तियों के उदाहरण हैं।

मृत्युदंड प्रारम्भ से ही कबीलाई संस्कृति और उसके बाद की संस्कृतियों में भी न्याय की ‘नायब’ चीज मानी गयी। नैतिकता के मापपंदड के आधार पर न्याय की धारणा बनी। सत्ता ने हमेशा ही न्याय का आकलन अपने मापदंडों के आधार पर किया। इसमें यह स्पष्ट था कि मृत्युदंड पाने वाला तात्कालिक न्याय व्यवस्था के मानदंडों को पूरा नहीं कर पाया। यही कारण रहा कि समाज में प्रचलित कुरीतियों और अंधविश्‍वासों के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज उठाने वाले अनगिनत नायकों को भी राज-सत्ताओं ने लगातार मृत्युदंड दिया।

कबीलाई व्यवस्था से ही धर्मो ने न्याय का स्वरूप लगातार अपनी नैतिकता, इलहाम के अनुसार रखा और न्याय व्यवस्था को कायम रखने के लिए दंड व्यवस्था को ‘आंख के बदले आंख और दांत के बदले दांत’ सरीखा अमानवीय बनाए रखा। इसलिए किसी को मारने पर या ‘देशद्रोह’ करने पर, मृत्यदंड को अनिवार्य व घोर ‘नैतिक’ बनाए रखा। देशभक्ति के अर्थ भी इस मृत्युदंड की व्यवस्था से खतरनाक ढंग से ‘नैतिक’ बन गए। यह विचार कभी आया ही नहीं कि मृत्युदंड अमानवीय है। जबकि उसे ही न्याय का प्रमुख आधार माना गया। 

न्याय के बर्बर कबीलाई नुस्खों के इतर यूनानी व रोमन समाज व्यवस्थाओं में जैसे-जैसे कानून और न्याय की अवधारणाओं में तरक्की हुई, प्राकृतिक अधिकारों और आदमी के जीवन के अधिकार केा लेकर प्रर्याप्त बहसें होने लगीं। ‘जस्टजैनसियम जस सिविली’ जैसे कानूनों ने नियमों-कानूनों को अधिक मानवीय बनाया। परंतु यूनानी विचारधारा ने न्याय व्यवस्था की एक बेहतर धारणा दी। प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक रिपब्लिक का नाम ही ‘कंसर्निंग जस्टिस’ रखा। यद्यपि उसकी विचारधारा में न्याय कानूनी धारणा नहीं, सामाजिक समरसता की धारणा थी। उसने यह शास्‍वत सत्य उजागर किया -जब तक राजा दार्शनिक नहीं हो जाते, दार्शनिक राजा नहीं हो जाते तब तक राज्य पूर्ण नहीं होंगे। वह राज्य को पूर्ण समझदारी से भरे लोगों का संगठन मानता है। यह भी कहा गया कि राज्य वहां रहने वाले लोगों के चरित्र पर निर्भर करता है। उसकी बौद्धिक तानाशाही से भले ही हम इंकार करें पर यह अवश्‍य है उसने जिस तरह से प्रबुद्धता व जन-साझेदारी समझदारी की बात की, वह आधुनिक राज्य के लिए भी आदर्श न्याय का अहम चिंतन है। उसने साफ कहा- ‘न्याय का मतलब प्रत्येक नागरिक को उसका देय प्राप्त होना है।’ अर्थात उसकी योग्यता के अनुसार समाज में जगह प्राप्त करना है। यह एक बहुत बड़ा दर्शन था जिसे अभी तक आधुनिक समाज में भी नहीं समझा पाया है। उसका न्याय मनोवैज्ञानिक व समाजिक समझ का एक भाग है। यह दृष्टि ही सही न्याय को समझ सकती है। यदि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी गुणवत्ता के अनुसार समाज में स्थान मिलता हो तभी समाज पूर्ण होगा। 

यूनानी विचारकों ने लोकतंत्र का व्यंग्यात्मक चित्र भी खींचा। प्लेटो ने तो ऐथेंस के लोकतंत्र को कभी माफ नहीं किया जिसने उसके गुरू को मृत्युदंड दिया। वहां लोकतंत्र की उपमा ऐसी व्यवस्था से की गई जैसे किसी जहाज में एक-एक कप्तान को डाकुओं ने मस्तूल से बांध दिया है और उस जहाज का निर्देशन एक ऐसा डाकू कप्तान कर रहा है जो डाकू है पर उसे न जहाज कला का ज्ञान है और वह कमजोर आंख वाला है। यानी कप्तान के सारे गुणों से वंचित वह राज्य को गलत दिशानिर्देशन दे रहा है। यूनानियों ने समझ, प्रबुद्धता पर जोर दिया। और मध्ययुग में जैसे ही यह प्रबुद्ध चितंन खत्म हुआ सारा यूरोप पंद्रहवीं शताब्दी तक अंधकार युग में चला गया। यूनानी पूर्व चितंन, यह मनोवैज्ञानिक सत्य बार-बार अपने दर्शन में दुहराता है कि जब तक आम आदमी में भी समझदारी न आये और सबसे बड़ा समझदार राजा न हो, तब तक राज्य का कल्याण नहीं होने वाला। भले ही यह दर्शन आदर्शवादी हो पर आदमी का लक्ष्य यही है। यह दर्शन आम जीवन में उतर नहीं पाया और यह आज के राज्यों की समस्या बनी है।

बहरहाल इस छोटे से विषयांतर, जो कि आलेख के मूल प्रविषय का ही एक विस्तार था, हम दुबारा मूल विषय की और लोटते हैं। न्याय की अवधारणा धर्मग्रन्थों ने अपने नैतिक व हवाई चिंतन द्वारा उपलब्ध करायी। लेकिन हर धर्म ग्रन्थ में मृत्युदंड को आंखरी दंड माना गया। दंड की धारणा जब तक आदम रही, मृत्युदंड उसका आवश्‍यक तत्व रहा। लेकिन बाद के दौर में भी मृत्युदंड अब तक अमान्य नहीं हो पाया है। मृत्युदंड की शुरूआती अधारणा कबीलाई समाज से उभरी। बाद के समाजों में भी इसे पर्याप्त प्रशय मिला। धर्म और राज्य सत्ताओं ने भी अपने विरोधियों को खत्म करने के एक ढंग के तौर पर इसे इस्तेमाल किया। प्रत्येक क्रान्ति अथवा विद्रोह में यह अपने विरोधियों को खत्म करने का साधन रहा। फ्रांस की क्रांति हो, रूस की क्रांति या अमेरिका की क्रांति यह दंड सबसे अधिक प्रचलित अपने विरोधियों को खत्म करने में रहा। यहाँ इसका सबसे बड़ा आधार देशद्रोह रहा। प्रतिक्रांतियों ने लोकतंत्र के क्रांतिकारियों यथा राॅब्स्पीयर तक को भी गिलोटिन पर चढ़ा दिया। उनको जब गिलोटिन पर चढ़ाया गया तो उनसे पूछा गया कि ‘सिर किस तरफ रखना चाहेंगे।’ तो उन्होंने कहा- ‘सिर कहीं भी रखा जाय, हृदय सही जगह होना चाहिए।’

न्याय की धारणा निरंतर अपनी-अपनी नैतिकता के अनुसार बदलती रही। उसका मानवीय व सर्वमान्य नियम विश्‍व के इतिहास में कहीं नहीं रहा। लेकिन मृत्युदंड लगातार न्याय के एक शाश्‍वत औजार के बतौर बरकरार रहा। मूलतः यह एक तरह से बदला लेने की प्रवृत्ति रही। वह बदला कई शक्लों में था। इसमें आदमी में जो सुधार की सम्भावना थी उसे सिरे से इनकार कर दिया गया। और साथ ही इसमें अपराधी को अपराध के लिए, समाज के वातावरण से इतर प्रशिक्षित मान, समाज ने एक अपराधी के अपराधी बनने की प्रक्रिया में अपनी भूमिका और उत्तरदायित्वों से पल्ला झाड़, मृत्युदंड को जायज माना।  

इंगलेंड में ‘कानून के शासन’ की धारणा ने न्याय व्यवस्था व कानून के संबंधों को गहरा किया और न्याय की ऊर्जा को आगे बढाया। टी.एच.ग्रीन ने न्याय दण्ड व्यवस्था को और भी विस्तृत किया और उसने कहा- ‘एक उदारवादी राज्य के लिए एक उदारवादी समाज की जरूरत है, एक ऐसे मंच की जरूरत है जहां समाज का हर व्यक्ति अपनी विचारधारा के अनुसार अपने को व्यक्त कर सके।’ यह लोकतांत्रिक आदर्शवाद था जो जर्मन आदर्शवाद का ब्रिटेनीकरण था। राज्य निर्माण के समझौते के सिद्धांत के तीन पुरोधा, हाॅब्स, लाॅक और रूसो, आजादी, समानता व व्यक्ति के जिंदा रहने के अधिकार को अपने-अपने कारणों से सामने लाए। उन्होंने राज्य को कृतिम माना। राज्य का आधार, स्वतंत्रता समानता, सम्पत्ति का अधिकार माना। उनका दर्शन यद्यपि दार्शनिक नहीं था पर इस विचारधारा ने आदमी के जीने के अधिकार को बहुत महत्व दिया।

औद्यौगिक क्रांति के बाद बैंथम मिल की जिस लेसेफैयर की व्यक्तिवादी विचारधारा ने न्याय व्यवस्था में सुधार किये, उसने भी न्याय व कानून की धारणा को नये ढंग से सोचने के लिए विवश किया। नरक जैसी जेल व्यवस्था में सुधार की बात की। इंगलेंड में जहां एक पैन चुराने पर भी बच्चों को मृत्युदंड दिया गया, वहां इन सब नाकारा कानून का विरोध किया। माॅनटैस्क्यू के सत्ता की क्रूरता, उसके तानाशाही दुरूप्रयोग को रोकने के दर्शन ने न्याय व दंड व्यवस्था में सुधार किया। औद्याोगिक क्रांति के बाद बेंथम ने जहां न्याय को सुखवाद व उपयोगितावाद के आधार पर रखा वहां जाॅन स्र्टुअट मिल ने इसे व्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर दे कर न्याय की धारणा को और भी आगे बढ़ाया। रसेल ने भी न्याय की धारणा में सुधार किया। न्याय व कानून की विचारधारा को समाजिक विचारकों ने जितना दृढ़ किया उतना कानूनविदों ने नहीं किया। सभी समाज सुधारकों व दार्शनिकों ने न्याय व दंड की धारणा में परिवर्तन किया। 

बेंथम के बाद टी.एच. ग्रीन ने इस मामले में महत्वपूर्ण कार्य किये। उसने रूसो की सामान्य इच्छा को उजागर किया साथ ही उसने बतलाया राज्य का आधार इच्छा है, बल नहीं। उसने ‘प्रतिरोध के सिद्धांत’, ‘निवारक सिद्धांत’, ‘सुधार का सिद्धांत’ के दंड के सिद्धांतों को नकार कर एक मिली जुली व्यवस्था की बात कही। ‘अपराधी मानसिक रूप से बीमार है। उसमें सुधार करना, उसके दंड को समाज के लिए उपयोगी बनाना व दूसरों को सबक देना कि- अपराध से दंड मिलता है, को ही उसने दंड का आधार माना। राज्य का उद्देश्‍य व्यक्ति की नैतिकता के मार्ग में बाधाओं को दूर करना है इसलिए दंड आवश्‍यक है। राजाओं के जमाने में न्याय, दंड अलग-अलग रहे। 

न्याय के मामले में हमेशा इतिहास में सुधार को लेकर बातें चलती रहीं। दंड, जेल व्यवस्था आदि को लेकर सुधार की बातें चलीं पर मृत्युदंड को हमेशा बनाये रखने दिया गया। उस पर बहुत बहसें हुई नहीं। उल्टा उसे बनाये रखने के लिए हमेशा बात होती रही। पर कुछ समय बाद 1750 से हल्की-हल्की बहस होने लगीं। 1764 में इटैलियन कानूनविद सिजेर बकारिया ने अपना पेपर ‘ऐसे आन क्राइम एण्ड पनिशमेंट’ प्रस्तुत किया जिसमें उसने मृत्युदंड को अमानवीय बतलाया और कहा अगर हमारे समाज को सभ्य होना है तो मृत्यदंड को खत्म करना जरूरी है। वे कहते हैं कि क्या यह मूर्खता नहीं है कि जो कानून इंसान को कत्ल से बचाने के लिए बनाये गये हैं वही कानून इंसान को खुले आम उसका कत्लेआम कर रहे हैं। विकारिया का विचार दो तर्को पर आधारित था- प्रथम सजा के उद्देश्‍य दो हैं, पहला- भविष्य के अपराध को रोकना, जिसे मृत्यदंड रोक नहीं सकता। दूसरा- राज्य की संम्प्रभुता का अधिकार, नागरिक को बचाना, वह इससे प्रभावित होता है। यह राज्य के प्रमुख गुण के खिलाफ है। उनका तर्क था मृत्युदंड की अपेक्षा सामान्य दंड दिया जाय तो यह उन्हें अपराध करने से रोकेगा। जब तक इसकी बहुत आवश्‍यकता न हो जाये यह कर्म तानाशाही कर्म है। दंड में वह शक्ति होनी चाहिए कि इंसान दुबारा अपराध न कर पाये। बिकारिया के तर्क अभी तक बने हुए हैं। 

भारत की आधुनिक न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड का स्रोत 1860 की आइपीसी है। यह सोचा गया कि इससे भविष्य में यह वारदात कम होंगी। समाज में अन्य लोग भी इससे आगे वह अपराध करने का साहस न करें। लार्ड मैकाले ने जिसने यह कोड लिखा था उसने साफ लिखा है कि ऐसा कोई भी तर्क मेरे सामने नहीं आया जो मृत्युदंड से होने वाले लाभ के बारे में संतुष्ट करता। मैकाले खुद मृत्युदंड के खिलाफ थे लेकिन ड्राफ्टिंग कमेटी में उनके इस विचार को विरोधाभासी मान मृत्युदंड को स्थाई रखा गया। 

1982 में सर्वोच्च न्यायालय ने बचन सिंह बनाम पंजाब में कहा कि फांसी, ‘रेयरेस्ट आफ द रेयेरे केस’ में ही दी जायेगी। कोर्ट ने मैकाले का संन्दर्भ देते कहा कि कुछ कुछ लोगों मौका देना चाहिए। पर उसने ‘रेयरेस्ट आफ रैयेरेस्ट’ को परिभाषित नहीं किया। जस्टिस अयर ने ऐडिगाअम्मा बनाम आन्ध्र राज्य में कहा- यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी कोई दंड-संहिता नहीं दी गयी है जिसके अन्तर्गत हमें बताये जा सकें कि दंड कैसे और कब देना है. हम तो फारसेनिक गवाह के मामले में ही उलझ जाते हैं। पी.एन.भगवती ने कहा- इसके पीछे सिद्धांत ही गलत है। अपराधी सवाल कर सकता है कि ये निर्णय आत्मगत है। यह इस पर निर्भर है कि कौन सी बैंच बैठेगी। यह इतना अस्पष्ट है कि एक प्रसिद्ध उपन्यास में एक जज सिफारिश से जज बन गया। उसके पास फांसी का मामला आया। वह इतना जटिल था कि उसकी समझ में कानून की बारीकियां ही नहीं आयीं। इस पर वह सिक्का उछालता है और मृत्युदंड चित्त आने पर दे देता है। 

बहुत से कानूनी मामले सामने आए जिससे लगा हमारी न्याय व्यवस्था हमारे कानून और हमारी समाजाकि स्थिति ऐसी है कि यहां न्याय व्यवस्था विशेषकर फांसी जैसी सजा को जारी रख कर हम मानवीय संभावनाओं को नकारने का एक बहुत बड़ा नकारात्मक कार्य कर रहे हैं। एक समय में रंगाबिल्ला व धनजंय मामले में भी क्रूरतम मामले में फांसी की सजा को अनिवार्य मानने की बात आई। मीडिया ने फांसी की सजा को इस तरह रंग दिया कि दुर्लभतम क्रूर मामले में फांसी की बात मानवतावादी भी करने लगे। पर उसके विपरीत यह मामला भी सामने आया कि फांसी की सजा अमानवीय है। 

दक्षिण अफ्रीकी जज कैलसन ने अपने प्रसिद्ध निर्णय में फांसी को लेकर कहा है-

'....The right to life and dignity are the most important of all human rights….. and this must be demonstrated by the state in everything it does including the way in punishes criminals...' 

मृत्युदंड का दक्षिणपंथी रवैया कैलसन के उपरोक्त कथन के इतर जीवन जीने के अधिकार के प्रश्‍न को महत्वपूर्ण नहीं मानता अपितु इसे शेष समाज के लिए सबक के तौर पर इसे जायज मानता है। मगर यह काूनन और न्याय के दो उदेश्‍यों को ही खत्म करता हे। पहली कि- किसी निर्दोष को सजा न मिले और दूसरी अपराधी में सुधार करना।  न्याय का मतलब दरअसल बर्बर युग की तरह बदला लेना नहीं है। भारत जैसे देश के हालात में पुलिस और न्याय व्यवस्था की जैसी स्थिति है, आदमी की सम्भावना, उसके बैकग्राउड को देखे बगैर फांसी की सजा रेयरैस्ट आॅफ दि रेयर में भी न्याय नहीं, अन्याय ही होगी। 

दरअसल हमारे पास कोई ऐसे अनुभव भी नहीं है जिससे यह साबित होता है कि मृत्युदंड से अपराध कम हुए हैं बल्कि समाज में इसका उल्टा देखा गया है। ऐसे कई देशों में जहाँ फांसी का प्रावधान है वहां अपराध अधिक हैं अपेक्षाकृत उन देशों के जहां फांसी का प्रावधान नहीं हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि मृत्युदंड सजा/न्याय के उद्देश्‍य को पूरा नहीं करता दो समस्याओं का समाधान नहीं होता। दिल्ली रेप के मामले में चार लोगों को हुई फांसी की सजा देने के बावजूद भी रेप के बाद कत्ल के 235 मामले सामने आए हैं। क्या सुधार हुआ है? जघन्य अपराध करने वाला यह सोच कर अपराध नहीं करता कि उसे फांसी लगेगी या नहीं। वह तो एक उन्मादी बीमार इंसान की तरह व्यवहार करता है। मृत्युदंड में अपराधी का कोई सुधार नहीं होता क्योंकि यह तो अपराधी का वह जीवन ही समाप्त हो जाता है जिसमें सुधार की अपेक्षा होनी चाहिए। 

फांसी के खिलाफ सबसे मजबूत तर्क यह है कि मृत्यदंड दे दिए जाने के बाद किसी भी तरह वापस नहीं किया जा सकता। 2009 में संतोष कुमार बरियार बनाम महाराष्ट्र वाले मामले में यही बात सामने आई। जस्टिस सिंन्हा और फिराक जौजफ ने इससे पहले जो 13 मृत्यु दंड दिये थे, वह गलतफहमियों में दिये गये थे। उन 13 में से दो को फांसी हो चुकी है। अब किसी के जीवन को छीन लेने के बाद न्याय व्यवस्था से हुई गलती का उसे क्या मुआवजा दिया जा सकता है?

यह दर्शाता है ऐसा दंड जिसका समाज में असर ही नहीं हो रहा, और वह अमानवीय भी है तो उसका क्या लाभ। भारत में मृत्युदंड का यही दृष्टिकोण है इससे एक सबक स्थापित होगा। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज्य ने यही मांग की। दुर्भाग्य यही है कि इन प्रभावशाली लोगों की तरफ से ऐसी मांग नहीं आती कि अच्छा कानून हो, पुलिस में सुधार हो, उसे विशेष ट्रेनिंग दी जाय। हमारे समाजिक मापदंड बदलें, जेल में सुधार हो। हमारे समाजिक मूल्य जो महिलाओं को सर्वथा एक नारकीय जिंदगी जीने को विवश करते हैं उनमें परिवर्तन किया जाय। दरहसल मृत्युदंड की यह सजा असभ्य और अनैतिक ही नहीं, यह न्याय की हमारी अवधारणा में ही विरोधाभास पैदा करती है। यह दंड के उद्देश्‍यों का ही सर्वनाश कर देती है।

स्पष्ट है आज मृत्युदंड की सार्थकता से ज्यादा जरूरी है इस प्रथा को समाप्त किया जाय इस बात पर जोर डाला जाय कि कानून व्यवस्था, तुरंत न्याय, पुलिस व्यवस्था सुधार, जेलों की बेहतर व्यवस्था बनाने पर व अपराधियों के सुधार पर जोर दिया जाय। हाल ही में टीवी रिर्पोट में दिखाया गया था कि सम्पूर्णानन्द जेल में अपराधियों में जबरदस्त सुधार आया है। कत्ल करने वाला अपराधी गणित पढ़ाता है। यह देखा गया है पैरोल में छूटा कोई भी व्यक्ति विगत् पांच साल से भागा नहीं है। और जो छूट कर गये हैं वह व्यवसाय सीख कर आज समाज में हैं। अच्छा जीवन जी रहे हैं। 

आवश्‍यकता तो यहां की कानून व समाजिक व्यवस्था में सुधार लाने की है, अपराधियों को अपराध से दूर ले जाने की है न कि उनका जीवन छीन लेने की। साथ ही यह भी अनिवार्य रूप से समझा जाना चाहिए कि बिना सामाजिक जागरण और चेतना के रूढि़यों के पक्षघात से पंगु हुआ समाज, बदला लेने की बर्बर मानसिकता से बलात्कार जैसे मामलों से नहीं निपट सकता। 





प्रभात जी कुमांऊ विश्‍वविद्यालय से 
राजनीतिशास्‍त्र के सेवानिवृत्‍त अध्‍यापक हैं.
अभी हल्‍द्वानी में रहते हैं.