प्रहार एनजीओज या असहमति पर?

-सत्येन्द्र रंजन

 "...खुद आईबी की रिपोर्ट यह मानती है कि गैर सरकारी संगठन लोगों से जुड़ी चिंताओं का इस्तेमाल करते हैं। क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह पहले लोगों की इन चिंताओं के निवारण पर ध्यान देएनजीओज कई मौकों पर नीतियों एवं उन पर अमल की उचित आलोचना भी प्रस्तुत करते हैं। उन्हें बेशक कानून के दायरे में रह कर काम करना चाहिए, मगर आलोचना एक मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकार है, इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती।..."

कार्टून साभार- http://www.shanland.org/
बात आगे बढ़ाने से पहले यह साफ कर लें कि गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओज) और उन्होंने गतिविधियों की जैसी संस्कृति बनाई है, मैं उसका समर्थक नहीं हूं। इन संगठनों से मेरी निम्नलिखित आपत्तियां हैं-
-    इन संगठनों ने सामाजिक गतिविधियों और जनसंघर्ष को कारोबार बना दिया है।  
- आम तौर पर इनका अपना कोई स्व-निर्धारित एजेंडा नहीं होता, उनका एजेंडा फंडिंग एजेंसी की प्राथमिकताओं से तय होता है।  
- एनजीओ सार्वजनिक महत्त्व के मुद्दों पर विवेकपूर्ण नजरिया अपनाने के बजाय चरमपंथी दृष्टिकोण अपनाते हैं। उनमें अपना नजरिया सही होने का भाव कट्टरपंथ की सीमा तक भरा होता है। दूसरे पक्ष को ना सुनने या खुद से असहमत पक्ष को बेईमान समझने का भाव लेकर वे चलते हैं।  
- उनकी आंतरिक कार्य-प्रणाली नौकरशाही आधारित है, जिसमें कार्यकर्ता असल में कर्मचारी बन जाते हैं। अंदरूनी निर्णय प्रक्रिया में ऐसे कर्मचारियों की कोई भूमिका नहीं होती।  
-  इन आरोपों में दम है कि ये संगठन जिन कार्यों या उद्देश्यों के लिए अनुदान प्राप्त करते हैं, उसका उपयोग उससे इतर भी करते हैं। परोक्ष रूप से राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़ती गई है।  
- इन संगठनों की समाज में नैराश्य और विवेकहीनता का माहौल बनाने में बड़ी भूमिका रही है, जिसका लाभ धुर दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक ताकतों ने उठाया है।
      
बहरहाल, इन आलोचनाओं का अलग संदर्भ है, जिस पर विस्तार से चर्चा की जरूरत है। एनजीओज को जवाबदेह और उनकी कार्य-प्रणाली को पारदर्शी अवश्य बनाया जाना चाहिए। लेकिन जिस रूप में फिलहाल ये चर्चा सामने लाई गई है, (http://bit.ly/1kRK1L9) उससे इस आशंका को बल मिलता है कि असल निशाना सिर्फ (भटके) एनजीओ नहीं, बल्कि प्रतिरोध और असहमति है।

इसके लिए खुफिया ब्यूरो (आईबी) से रिपोर्ट तैयार कराई गई है। (http://bit.ly/1oc582N). आईबी ने ये रिपोर्ट सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी। गृह मंत्रालय तक को इसकी जानकारी नहीं थी, जिस बात को सीधे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने स्वीकार किया। (http://bit.ly/1vaqi17). आईबी की रिपोर्ट आते ही प्रधानमंत्री कार्यालय ने विभिन्न मंत्रालयों से एनजीओज के बारे में जानकारी मांग कर यह साफ किया कि वह इस मामले में कितनी शीघ्र कार्रवाई करने के मूड में है। (http://bit.ly/UztFCd). फिर खबर आई कि गृह मंत्रालय 10 एनजीओज को कारण बताओ नोटिस जारी कर रहा है और उनमें एक- ग्रीनपीस- को ये नोटिस भेजा भी जा चुका है। (http://bit.ly/1luv5Hy)

आईबी की रिपोर्ट का सार यह है-
- विदेशी धन से चलने वाले कई एनजीओ भारत के आर्थिक विकास पर बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। 
- ये जनता की चिंता से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल कर ऐसा माहौल बना रहे हैं, जिससे विकास परियोजनाएं बाधित हुई हैं। 
- आईबी ने अनुमान लगाया है कि ऐसे अभियानों से सकल घरेलू उत्पाद पर सालाना 2-3 प्रतिशत नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। 
- आईबी ने ऐसे सात क्षेत्रों का जिक्र किया है, जिन्हें एनजीओज ने निशाना बना रखा है। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, यूरेनियम खनन, ताप विद्युत संयंत्रों, कृषि बायोटेक्नोलॉजी, बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं, पनबिजली परियोजनाओं और खनन को ऐसा क्षेत्र बताया गया है। 
- रिपोर्ट के मुताबिक पहले एनजीओ पहले जातीय भेदभाव, मानवाधिकार और विस्थापन का मुद्दा उठा कर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को बदनाम करने की कोशिश करते थे। अब उन्होंने आर्थिक विकास परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया है। 
- इस वर्ष (2014 में) ये संगठन इलेक्ट्रॉनिक कचरे को मुद्दा बना कर भारत की सूचना तकनीक कंपनियों के लिए मुश्किल खड़ा करने वाले हैं। 
- ध्यानार्थ यह है कि आईबी ने हालांकि देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरा बने विदेशी धन प्राप्त एनजीओ पर रिपोर्ट तैयार की, लेकिन उसने उसमें गुजरात के अनेक जन संगठनों को भी शामिल किया है। (http://bit.ly/1xUvcSm). क्या यह महज संयोग है कि गुजरात में भूमि अधिग्रहण आदि मुद्दों पर आंदोलन करने वाले संगठनों के बारे में ऐसी रिपोर्ट आने के तुरंत बाद नर्मदा कंट्रोल ऑथरिटी ने सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 17 मीटर बढ़ाने की इजाजत दे दी, जिससे बड़ी संख्या में लोग- खासकर आदिवासी विस्थापित होंगे। (http://bit.ly/1mRKmyS)
यह फैसला ये दलील देते हुए किया गया कि गुजरात में सिंचाई, बिजली और पेय जल उपलब्ध कराने के लिए बांध की ऊंचाई बढ़ाना जरूरी है। मगर हकीकत यह है कि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने राज्य के कोने-कोने तक पानी पहुंचाने कि लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा बिछाने पर ध्यान नहीं दिया। इसके लिए नहरें बनाई जाने थीं, जो नहीं बनी हैं। (http://bit.ly/1qKrvK9तो क्या यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा, जिस तरह गुजरात मॉडल का मिथ प्रचारित कर वे चुनाव में मतदाताओं को भ्रमित करने में सफल रहे, वैसी ही कोशिश सिंचाई, बिजली और पेय जल की बातें करते हुए की जा रही हैऔर आईबी का इस्तेमाल विरोध की संभावना को खत्म करने के लिए किया जा रहा है? इस क्रम में बांध की ऊंचाई बढ़ने से विस्थापित होने वाले लोगों की चिंता दरकिनार कर दी गई है। (http://bit.ly/1pugIWO)

इस संदर्भ में द इंडियन एक्सप्रेस में छपी ये रिपोर्ट महत्त्वपूर्ण है कि आईबी की रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी के एक पूर्व भाषण के अंशों को उठा कर सीधे शामिल कर लिया गया। (http://bit.ly/1v7mAVU)

डेवलमेंट और सोशल सेक्टर में काम करने वाले संगठनों से भारतीय जनता पार्टी का विरोध पुराना है। अतः आईबी रिपोर्ट की जो पृष्ठभूमि और संदर्भ है, उसमें इस शक का वाजिब आधार बनता है कि नरेंद्र मोदी सरकार राजनीतिक कारणों से ऐसे संगठनों पर नकेल कसने की तैयारी में है।

इस सिलसिले में यह रेखांकित किए जाने की जरूरत है कि एनजीओ अगर कोई कानून तोड़ते हैं, या अपने दायरे से बाहर जाकर काम करते हैं, अथवा वे किसी विदेशी कंपनी या सरकार के इशारे पर अभियान चलाते हैं तो उन अवश्य कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन ऐसा तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। कौन सी गतिविधि देश के आर्थिक हित में है और कौन सी नहीं, इस बारे में अलग-अलग समझ की गुंजाइश है। कम से कम यह आकलन करना आईबी जैसी एजेंसी का काम नहीं है।

एनजीओज की समाज में क्या भूमिका हो, इस सवाल का दायरा बड़ा है। (http://bit.ly/TMlHoo). इस सवाल से निपटने का विवेकपूर्ण तरीका इस मुद्दे से जुड़े सभी पक्षों और पहलुओं पर ध्यान देना है, ना कि सिर्फ अपनी समझ के आधार पर कानून और पुलिस का सहारा लेकर असहमति जताने वाले संगठनों का गला घोंट देना।

खुद आईबी की रिपोर्ट यह मानती है कि गैर सरकारी संगठन लोगों से जुड़ी चिंताओं का इस्तेमाल करते हैं। क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह पहले लोगों की इन चिंताओं के निवारण पर ध्यान देएनजीओज कई मौकों पर नीतियों एवं उन पर अमल की उचित आलोचना भी प्रस्तुत करते हैं। उन्हें बेशक कानून के दायरे में रह कर काम करना चाहिए, मगर आलोचना एक मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकार है, इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती। (http://bit.ly/1prPf8d). इस संदर्भ में पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की टिप्पणी गौरतलब है, जिसमें उन्होंने कहा है कि उन्हें एनजीओज से कोई लगाव नहीं है, लेकिन प्रतिपक्ष के रूप में उनकी उपस्थिति बने रहने का अपना महत्त्व है। (http://bit.ly/1lhv5WG)

इस सिलसिले में खास सवाल यह है कि एनजीओज पर शिकंजा कसने की कोशिश को क्या असहमति पर हो रहे प्रहार से अलग कर देखना संभव है? आलोचनात्मक टिप्पणियों के प्रति पुलिस की कार्रवाई कितनी सख्त हो चुकी है, इसकी मिसाल सोशल मीडिया या दूसरे माध्यमों का इस्तेमाल करने वाले अनेक लोग भुगत रहे हैं। केरल में हाल में सात लोग गिरफ्तार हुए हैं (http://bit.ly/1p0wwio) जबकि 11 छात्रों पर मुकदमा दर्ज हो चुका है। (http://bit.ly/1luvPw5)
जिस सरकार बलात्कार के आरोपी मंत्री हैं, (http://bit.ly/1qKrsOd), एक ऐसे मंत्री हैं जिनके सेनाध्यक्ष रहते हुए उठाए कदमों को खुद वर्तमान सरकार ने गैर-कानूनी, असंगत और पूर्व नियोजित बता चुकी है (http://bit.ly/1veDCl9), वह अपनी छवि सुधारने के लिए आलोचकों पर नियंत्रण करने की कोशिश करे, तो उसके निहितार्थ समझे जा सकते हैं।

http://2.bp.blogspot.com/-BSXbDZIBdB8/UN1e2bactZI/AAAAAAAABK4/TneJOeSw0i4/s1600/satyendra+ranjan.jpg



लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.
स्वतंत्र लेखन के साथ ही 
फिलहाल जामिया मिल्लिया 
यूनिवर्सिटी के एमसीआरसी में 
बतौर गेस्ट फैकल्टी पढ़ाते हैं.