नेहरू और नई चुनौतियां

सत्येन्द्र रंजन 
-सत्येंद्र रंजन

"... पिछले दो-ढाई दशकों में दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों के ज्यादा प्रचलित होने, संपन्न और सवर्ण पृष्ठभूमि से उभरे मध्य वर्ग के मजबूत होने और अमेरिका-परस्त जमातों का दायरा फैलने के साथ सांप्रदायिक ताकतों को नया समर्थन आधार मिल गया है। नेहरू अपने सपने और आर्थिक एवं विदेश नीतियों की वजह से इन सभी ताकतों के स्वाभाविक निशाने के रूप में उभरते हैं। और ये ताकतें जानती हैं कि जब तक नेहरू को एक खलनायक के रूप में स्थापित नहीं कर दिया जाता, उनके विचारों की साख खत्म नहीं कर दी जाती, उनकी अंतिम कामयाबी संदिग्ध है... "



विडंबना ही है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पचासवीं पुण्य तिथि की पूर्व संध्या पर कार्य-भार संभाला। नेहरू के राजनीतिक फलक से विदा होने के पचास वर्ष बाद उनके विचारों के प्रतिवाद (एंटी-थीसीस) की प्रतिनिधि ताकतें देश की राजसत्ता पर संपूर्ण संसदीय बहुमत के साथ काबिज हो गई हैं। नेहरू के नेतृत्व में उदार, आधुनिक, बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष भारत की स्थापना की हुई थी। इस भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा लंबे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अस्तित्व में आई। इसे विकसित करने में अनेक विचारधाराओं से चिंतकों, मनीषियों, नेताओं और कार्यकर्ताओं का योगदान रहा। नेहरू की खास भूमिका थी इसमें प्रगति और विकास की एक विशिष्ट समझ को जोड़ना। इस राष्ट्रवाद के विरुद्ध धर्म आधारित राष्ट्रवाद (जिसने खुद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा) की सोच समानांतर रूप से आगे बढ़ी। आजादी के बाद पहले आम चुनाव में नेहरू के नेतृत्व में उस सोच को पराजित कर दिया गया था। मगर 16वीं लोकसभा के चुनाव नतीजों ने उस विचारधारा को देश की सबसे प्रमुख राजनीतिक शक्ति बना दिया है। स्पष्टतः यहां से भारतीय राजनीति का संदर्भ बिंदु बदल गया है। इसीलिए आज आवश्यक है कि नेहरू के विचारों, उनके योगदान और उनके व्यक्तित्व का अब नए सिरे पुनर्मूल्यांकन हो। आखिर स्वतंत्रता के बाद से अब तक अपने देश को हम नेहरूवादी भारत के रूप में ही जानते रहे हैँ। 



ध्यानार्थ है कि जवाहर लाल नेहरू के दुनिया से विदा होने के बाद से उनकी विरासत गंभीर विचार-विमर्श के साथ-साथ गहरे मतभेदों का भी विषय रही है। अपने जीवन काल में, खासकर आजादी के बाद जब वो भारतीय राजनीति के शिखर पर थे, पंडित नेहरू ने अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की थी। इसके बूते उन्होंने अपनी ऐसी हैसियत बनाई कि कहा जाता है, 1962 के चीन युद्ध में भारत की हार तक राष्ट्रीय मुख्यधारा में उन्हें आलोचना से परे माना जाता था। लेकिन निधन के बाद उनके व्यक्तित्व, उनके योगदान और उनके विचारों पर तीखे मतभेद उभरे। इतने कि यह बात बेहिचक कही जा सकती है कि नेहरू स्वतंत्र भारत में सबसे ज्यादा मत-विभाजन पैदा करने वाली शख्सियत नजर आते हैं। यह बात भी लगभग उतने ही ठोस आधार के साथ कही जा सकती है कि पिछले चार दशकों में नेहरू के विरोधी विचारों को देश में लगातार अधिक स्वीकृति मिलती गई है, और आज जिस कांग्रेस पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार के प्रति वफादारी आगे बढ़ने का सबसे बड़ा पैमाना है, वह भी पंडित नेहरू के रास्ते पर चल रही है, यह कहना मुश्किल है। 


नेहरू के विरोध के कई मोर्चे हैं। एक मोर्चा दक्षिणपंथ का है, जो मानता है कि जवाहर लाल नेहरू ने समाजवाद के प्रति अपने अति उत्साह की वजह से देश की उद्यमशीलता को कुंद कर दिया। एक मोर्चा उग्र वामपंथ का है, जो मानता है कि नेहरू का समाजवाद दरअसल, पूंजीवाद को निर्बाध अपनी जड़ें जमाने का मौका देने का उपक्रम था। एक मोर्चा लोहियावाद का रहा है, जिसकी राय में नेहरू ने व्यक्तिवाद और परिवारवाद को बढ़ावा दिया और पश्चिमी सभ्यता का अंध अनुकरण करते हुए देसी कौशल और जरूरतों की अनदेखी की। लेकिन नेहरू के खिलाफ सबसे तीखा मोर्चा सांप्रदायिक फासीवाद का है, जिसकी राय में देश में आज मौजूद हर बुराई के लिए नेहरू जिम्मेदार हैं। 




नेहरू विरोधी इन तमाम ज़ुमलों को इतनी अधिक बार दोहराया गया है कि आज की पीढ़ी के एक बहुत बड़े हिस्से ने बिना किसी आलोचनात्मक विश्लेषण के इन्हें सहज स्वीकार कर लिया है। संभवतः इसीलिए आजादी के पहले महात्मा गांधी के बाद कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता और देश के पहले प्रधानमंत्री के प्रति आज सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक राय मौजूद है। चूंकि ऐसी राय अक्सर बिना ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखे और वर्तमान के पैमानों को अतीत पर लागू करते हुए बनाई जाती है, इसलिए सामान्य चर्चा में इसे चुनौती देना आसान नहीं होता। 



इस संदर्भ में सबसे अहम पहलू यह समझना है कि आज जिन चीजों और स्थितियों को को हम तयशुदा मानते हैं, वह हमेशा से ऐसी नहीं थीं। मसलन, देश की एकता, लोकतंत्र का मौजूदा स्वरूप, विकास का ढांचा, प्रगति की परिस्थितियां आज जितनी सुनिश्चित-सी लगती हैं, 1947 में वो महज सपना ही थीं। देश बंटवारे के जलजले और बिखराव की आम भविष्यवाणियों के बीच तब के स्वप्नदर्शी नेता राज्य व्यवस्था के आधुनिक सिद्धांतों पर अमल और व्यक्ति की गरिमा एवं स्वतंत्रता के मूलमंत्र को अपनाने का सपना देख पाए, इस बात की अहमियत को सिर्फ यथार्थवादी ऐतिहासिक नजरिए से ही समझा जा सकता है। नेहरू उन स्वप्नदर्शी नेताओं में एक थे, अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया। प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच उन्होंने अपने विचारों पर अमल का जोखिम उठाया, संभवतः इस बात से कोई असहमत नहीं होगा। 


असहमति की शुरुआत अमल के परिणामों को लेकर होती है। यह असहमति एक स्वस्थ बहस का आधार बनी है और निश्चित रूप से आज भी इस बहस को आगे बढ़ाने की जरूरत है। पंडित नेहरू के नेतृत्व में जो विकास नीति अपनाई गई, वह अपने मकसद को कितना हासिल कर पाई, जो नाकामियां उभरीं उसकी कितनी वजह नेहरू के विचारों में मौजूद थी औऱ उनमें कैसे सुधारों की जरूरत है, यह एक सकारात्मक चर्चा है, जो खुद नेहरू के सपने को साकार करने के लिए जरूरी है। लेकिन गौरतलब यह है कि नेहरू का विरोध हमेशा सिर्फ ऐसे ही सवालों की वजह से नहीं होता। नेहरूवाद का एक बड़ा प्रतिवाद सांप्रदायिक फासीवाद है, जिसका मकसद प्रगति और विकास नहीं, बल्कि पुरातन सामाजिक अन्याय और जोर-जबरदस्ती को कायम रखना है। 

देश में मौजूद कई विचारधाराओं का सांप्रदायिक फासीवाद से टकराव रहा है। लेकिन यह एक ऐतिहासिक सच है कि सवर्ण और बहुसंख्यक वर्चस्व की समर्थक इन ताकतों के खिलाफ सबसे मजबूत और कामयाब बुलवर्क पंडित नेहरू साबित हुए। देश विभाजन के बाद बने माहौल में भी ये ताकतें कामयाब नहीं हो सकीं, तो उसकी एक प्रमुख वजह नेहरू की धर्मनिरपेक्षता में अखंड आस्था और इसके लिए अपने को दांव पर लगा देने का उनका दमखम रहा। स्वाभाविक ही है कि ये ताकतें आज भी अपना सबसे तीखा हथियार नेहरू पर हमला करने के लिए सुरक्षित रखती हैं। पिछले दो-ढाई दशकों में दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों के ज्यादा प्रचलित होने, संपन्न और सवर्ण पृष्ठभूमि से उभरे मध्य वर्ग के मजबूत होने और अमेरिका-परस्त जमातों का दायरा फैलने के साथ सांप्रदायिक ताकतों को नया समर्थन आधार मिल गया है। नेहरू अपने सपने और आर्थिक एवं विदेश नीतियों की वजह से इन सभी ताकतों के स्वाभाविक निशाने के रूप में उभरते हैं। और ये ताकतें जानती हैं कि जब तक नेहरू को एक खलनायक के रूप में स्थापित नहीं कर दिया जाता, उनके विचारों की साख खत्म नहीं कर दी जाती, उनकी अंतिम कामयाबी संदिग्ध है।

पिछले डेढ़-दो दशकों में इन ताकतों के बढ़ते खतरे ने बहुत से लोगों को नेहरू की प्रासंगिकता पर नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित किया है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जिस आधुनिक भारत की कल्पना विकसित हुई और जिसे आजादी के बाद पंडित नेहरू के नेतृत्व में ठोस रूप दिया गया, उसके लिए पैदा हुए खतरे के बीच यह सवाल बेहद गंभीरता से उठा है कि आखिर इस भारत की रक्षा कैसे की जाए? यह विचार मंथन हमें उन रणनीतियों और सोच की अहमियत समझने की नई दृष्टि देता है, जो पंडित नेहरू ने प्रतिक्रियावादी, आधुनिकता विरोधी और अनुदार शक्तियों के खिलाफ अपनाई। उन्होंने इन ताकतों के खिलाफ वैचारिक संघर्ष जरूर जारी रखा, लेकिन उनकी खास रणनीति देश को विकास एवं प्रगित का सकारात्मक एजेंडा देने की थी, जिससे तब की पीढ़ी भविष्य की तरफ देख पाई और आर्थिक एवं सांस्कृतिक पिछड़ेपन की व्यापक पृष्ठभूमि के बावजूद एक नए एवं आधुनिक भारत का उदय हो सका।

पंडित नेहरू ने उस वक्त के मानव विकासक्रम की स्थिति, उपलब्ध ज्ञान और संसाधनों के आधार पर उस भारत की नींव रखी, जो धीरे-धीरे दुनिया में एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभरा। लेकिन नेहरू की रणनीतियों की नाकामी यह रही कि नए भारत में गरीबी, असमानता और व्यवस्थागत अन्याय को खत्म नहीं किया जा सका। नतीजतन, आज हम एक ऐसे भारत में हैं जहां संपन्नता और विपन्नता की खाई बढ़ती नजर आ रही है। नेहरू ने समाजवाद के जिन मूल्यों की वकालत की उनका साकार होना कहीं करीब नजर नहीं आता। यह विसंगति निसंदेह पंडित नेहरू की विरासत पर बड़ा सवाल है। लेकिन इस सवाल से उलझते हुए भी आज की पीढ़ी के पास सबसे बेहतरीन विकल्प संभवतः यह नहीं है कि नेहरू की पूरी विरासत को खारिज कर दिया जाए। बल्कि सबको समाहित कर और सबके साथ न्याय की जो बात नेहरू के भारत के सपने के बुनियाद में रही, वह आज भी इस राष्ट्र का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है, जिसकी जड़ें मजबूत किए जाने की जरूरत है। ये दोनों बातें विकास और प्रगति के एक खास स्तर के साथ ही हासिल की जा सकती हैं, नेहरूवाद की यह मूल भावना भी शायद विवाद से परे है। यह जरूर मुमकिन है कि विकास और प्रगति की नई अवधारणाएं पेश की जाएं और उनकी रोशनी में पुरानी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार हो। बहरहाल, विश्व मंच पर भारत अपनी स्वतंत्र पहचान रखे और जिन मूल्यों पर भारतीय राष्ट्र की नींव डाली गई, उनकी इन मंचों पर वह वकालत करे, यह नेहरूवादी विरासत आज भी उतना ही अहम है, जितना जवाहर लाल नेहरू के जीवनकाल में थी। 

दरअसल, बात जब नेहरू की होती है, तब ये विचार ही सबसे अहम हैं। इन पर आज सबसे ज्यादा चर्चा की जरूरत है। नेहरू की नाकामियां जरूर रेखांकित की जानी चाहिए, लेकिन उनके कुल योगदान का विश्लेषण वस्तुगत और तार्किक परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए। वरना, हम उन ताकतों की ही मदद करते दिखेंगे जो नेहरू की छवि एवं विरासत का ध्वंस दरअसल भारत के उस अपेक्षाकृत नए विचार का ध्वंस करने के लिए करती हैं, जो आजादी की लड़ाई के दिनों में पैदा हुआ, आधुनिक समतावादी चितंकों ने जिसे विकसित किया, जो गांधी-नेहरू के नेतृत्व में अस्तित्व में आया और जिसे आज दुनिया भर में सहिष्णुता, सह-अस्तित्व एवं मानव विकास का एक बेहतरीन आदर्श माना जा रहा है। नेहरू इसी भारत के प्रतीक हैं, और इसीलिए उनकी विरासत की आज रक्षा किए जाने की जरूरत है। 

सांप्रदायिक और दक्षिणपंथी ताकतों ने नेहरू की साख खत्म करने के लिए हर तरह के दुष्प्रचार और कुतर्कों का सहारा लिया है। गांधी बनाम नेहरू की बनावटी, निराधार बहस खड़ी करने की कोशिश की गई, ताकि नेहरू को गांधी का विरोधी दिखा कर यह धारणा बनाई जा सके कि प्रथम प्रधानमंत्री देश को गांधी की इच्छा के विपरीत या गलत मार्ग पर ले गए। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यह प्रचार बड़े जन समुदाय में स्वीकृति बनाने में सफल रहा है। बहरहाल, अब नए हालात में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक शक्तियों की यह जिम्मेदारी है कि वे उस भारतीय राष्ट्रवाद की रक्षा के लिए खड़ी हों, जिसका उदय हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हुआ, जिसकी मूर्त व्याख्या हमारे संविधान की प्रस्तावना में हुई, और जिसे अमली या व्यावहारिक रूप देने में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व की सर्व-प्रमुख भूमिका रही। नेहरूजी की पचासवीं पुण्य-तिथि पर आज अपने उसी राष्ट्रवाद की रक्षा के लिए संकल्प लेने का दिन है। 

                                                                                                                                  
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.
स्वतंत्र लेखन के साथ ही फिलहाल 
जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के एमसीआरसी में 
बतौर गेस्ट फैकल्टी पढ़ाते हैं.