विकास का दिवास्वप्न

संजय बिष्ट
-संजय बिष्ट

"...मोदी के प्रचार की कॉर्पोरेटी बमबारी के बाद आम जनता का मन टटोलने से ये साफ नजर आ रहा है कि उसके दिमाग में आने वाले दिनों में एक ऐसे भारत की परिकल्पना है, जहां हर तरफ विकास ही विकास नजर आएगा। जीडीपी आसमान छू रही होगी। पाकिस्तान, चीन को रौंदकर भारत अमेरिका के सीने पर चढ़ा होगा। प्राइवेट कंपनियां नौकरी देने के लिए बेरोजगारों के घर के बाहर कतार में खड़ी होंगी। महंगाई इतनी कम की पचास पैसे के दिन भी वापस आ जाएं। भ्रष्टाचार तो जैसे वर्षों पुरानी बात हो जाएगी। सड़कें जैसे हीरोइनों के गाल और बिजली, पानी तो इतने इफरात में की खर्च करने से खत्म ही न हो..."


प्रत्येक चुनावों में उम्मीद के अलावा जनता के पास दरअसल कोई विकल्प नहीं है. ऐसे में यूपीए और कांग्रेस के खिलाफ १० साल की एंटी इंकम्पेन्सी के असंतुष्ट माहौल के बीच बेतहाशा खर्च कर प्रचार माध्यमों के जरिये जिस तरह मोदी के नाम के अनवरत नगाड़े बजाये गए थे, ऐसे में असल विकल्प की आवाजों को दब ही जाना था और मोदी के पक्ष में यही परिणाम आने थे. लेकिन यह बात इतनी सपाट नहीं है. मोदी की उनकी राजनीति के साथ इस तरह की स्वीकार्यता (चाहे वह किसी भी तरह बन पाई हो) के भारतीय राजनीति में गहरे निहितार्थ हैं. 'इतिहास खुद को दोहराता है' यह बात फिर एक बार साबित हुई है. यहाँ हिटलर के सत्तासीन होने पर बर्तोल्त ब्रेख्त की यह टिप्पणी भारतीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में फिर मौज़ू हो गई है, "चरवाहे से नाराज भेड़ों ने कसाई को मौका दे दिया..."

मोदी के प्रायोजित प्रचार का दिवास्वप्न अभी टूटा नहीं है। सोशल साइट्स, टीवी, अखबार, मीडिया के जरिए बनाए गए एक काल्पनिक माहौल अच्छे दिन आने वाले हैं ने जनता को एक काल्पनिक सोच भी दे दी है। प्रचार को आंदोलन बनाने से मिले मोदित्वका सत्व जनता भोग रही है। मोदीमय  बैच, टोपी टीशर्ट स्कार्फ लपेटे जनता अब भी सुबह की मीठी नींद के खुमार में है। मोदी के प्रचार की कॉर्पोरेटी बमबारी के बाद आम जनता का मन टटोलने से ये साफ नजर आ रहा है कि उसके दिमाग में आने वाले दिनों में एक ऐसे भारत की परिकल्पना है, जहां हर तरफ विकास ही विकास नजर आएगा। जीडीपी आसमान छू रही होगी। पाकिस्तान, चीन को रौंदकर भारत अमेरिका के सीने पर चढ़ा होगा। प्राइवेट कंपनियां नौकरी देने के लिए बेरोजगारों के घर के बाहर कतार में खड़ी होंगी। महंगाई इतनी कम की पचास पैसे के दिन भी वापस आ जाएं। भ्रष्टाचार तो जैसे वर्षों पुरानी बात हो जाएगी। सड़कें जैसे हीरोइनों के गाल और बिजली, पानी तो इतने इफरात में की खर्च करने से खत्म ही न हो।

शायद मंगल दिनों की इसी कामना ने नरेंद्र मोदी का दामन कमलों से भर दिया। जो करिश्मा कभी अटल-आडवाणी नहीं कर सके, पहले झटके में ही मोदी उस करिश्मे के पर्याय बन चुके हैं। इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जनता को जो भी चाहिए बहुत जल्दी चाहिए। आम जनता सरकार को हमेशा से जादू की छड़ी समझती आई है, जिसे चलाकर रातों रात सभी परेशानियों का हल ढूंढा जा सकता है। इसी उम्मीदों के बोझ के तले दबकर आम आदमी पार्टी अपना बेड़ा गर्क कर चुकी है। राष्ट्रीय स्तर पर देश में समस्याएं ज्यादा हैं और उन्हें खत्म करने का सिस्टम बहुत लंबा और दुरुह। शायद इसीलिए पांच साल के अंदर ही अलग-अलग सरकारें इतनी अलोकप्रिय हो जाती हैं कि जनता अगले चुनाव में सत्तारुढ़ दल को अछूत बना डालती है। नरेंद्र मोदी ने जनता को बड़े बड़े सपने दिखाएं हैं, निश्चित तौर पर वो पूरे भी हो सकते हैं लेकिन उन्हें पूरा होने में इतना वक्त लग सकता है कि मोदी सरकार का एक कार्यकाल भी कम पड़ जाए। ऊपर से जब अच्छे दिनों का फितूर लोगों के दिलों में हावी हो तो उम्मीदें और बढ़ जाती हैं।

ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि ये जीत बीजेपी की जीत नहीं है बल्कि नरेंद्र मोदी की जीत है। मोदी बीजेपी में अब लार्जर दैन लाइफ की छवि में हैं। दरअसल मोदी उस दौर में हैं जिस दौर में कभी इंदिरा गांधी हुआ करती थी यानी मोदी इज बीजेपी और बीजेपी इज मोदी। (थोड़े दिनों बाद ये भी संभव है कि इस उक्ति को बदल कर बरुआ जैसे लोग कहने लगें- मोदी इज इंडिया, इंडिया इज मोदी)

पूरे चुनाव प्रचार में लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी और बीजेपी के दूसरे नेता कहीं नजर नहीं आए। बीजेपी का सिर्फ एक चेहरा था और वो चेहरा था नरेंद्र मोदी। राजनीति में व्यक्तिवाद का ये नया दौर है। आखिरकार व्यक्तिवाद ही तानाशाही में तब्दील होता है। भारत की लुंज-पुंज अवस्था को देखकर कई सोचशास्त्री ये कह सकते हैं कि देश को एक ऐसे नेता की जरूरत है जो अनुशासन की चाबुक से लोगों को सीधा कर सके चाहे इसके लिए उसे लोकतांत्रिक मूल्यों को ताक पर ही क्यों न रखना पड़े? लेकिन भिन्नता में एकता रखने वाले इस देश के लोगों की मानसिकता कुछ और है। प्यार के पैगामों से भी इस देश को सीधे रास्ते पर लाया जा सकता है। यहां व्यक्तिवाद की परंपरा नहीं बल्कि समरसता की धारा बहाई जा सकती है। लेकिन इस बात की अपेक्षा मोदी से नहीं की जा सकती क्योंकि वो ऐसे नेता हैं जो अपने सामने किसी को भी टिकने नहीं देते। चाहे सीनियर हो या जूनियर, कोई उनसे आगे बढ़ने की कोशिश करता है तो वो उसे रौंद देते हैं। मोदी की राजनीति को आप यूं भी समझ सकते हैं कि किसी गैर गुजराती राज्य के नागरिक से आप ये पूछेंगे की गुजरात में मोदी के बाद नंबर दो नेता कौन है? तो वो शायद आसमान की तरफ देखता नजर आए। कोई शख्स जिंदगी भर स्थान बदल सकता है लेकिन वो अपनी नियत और नियति कभी नहीं बदल सकता। केंद्र में आकर भी मोदी ऐसा ही करें तो कोई शक नहीं।

खैर अंत में ५६ इंच का सीना मापने सरीखे फूहड़बिम्बों के इतर अच्छे दिनों की कामना तो की ही जानी चाहिए। 

संजय पत्रकार हैं
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में लम्बा अनुभव।
संपर्क - bisht.sanj@gmail.com